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Tuesday, December 16, 2008

काश बॉक्सिंग गल्वस पहनकर क्रिकेट खेली जाती !


आज ऑफिस से घर आया तो मन बड़ा भारी था... सोचा शायद दिनभर काम किया है उसकी थकान है... रात को सोते वक्त मुझे ध्यान आया कि जितना काम मैं रोज़ करता हूं आज भी उससे ज्यादा काम तो नहीं किया... फिर सोच में डूब गया... तभी दिमाग की बत्ती जली (हालांकि मेन्टॉस नहीं खाया था) दिन में किसी से बहस हो गयी कि देश में लोग क्रिकेट ही क्यों देखते हैं... क्रिकेटर ही क्यों बनना चाहते हैं बच्चे... तभी ध्यान आया किसी न्यूज चैनल ने छोटी सी खबर चलायी... वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भारत को चार कांस्य पदक मिले हैं... मुक्केबाज़ों की वतन वापसी हो गयी है... एयरपोर्ट पर उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा... कोई भी अधिकारी उन्हें रिसीव करने के लिए मौजूद नहीं था... खिलाड़ी काफी देर तक इंतज़ार करते रहे... फिर जिसे जो मिला टैक्सी या फिर ऑटो किराए पर लेकर घर पहुंचा... कमाल है ये वही न्यूज़ चैनल्स हैं जिनके प्रोग्राम्स के नाम देख-देख कर ही मैं उत्साहित हो गया... चेन्नई में हुआ चमत्कार.. चेपॉक के चैंपियन्स... जीत लिया चेन्नई... चेपॉक में चटाई धूल... दिन भर क्या सुबह तक इसी लंब दंड गोल पिंड धर पकड़ प्रतियोगिता (घबराएं नहीं क्रिकेट का हिन्दी में नाम है) का खुमार सारे चैनल्स पर छाया रहा... और जिन लोगों ने भारत को चार-चार मेडल दिलाएं... एक देश नहीं कई देशों के बॉक्सर्स को हराया... उनपर एक छोटी सी खबर... नहीं तो डेढ़ मिनट का पैकेज बना कर चला दिया... किसी ने भी ज़हमत नहीं उठायी की खेल मंत्रालय और बॉक्सिंग फेडेरेशन ऑफ इंडिया से इसका जवाब मांगा जाए... बस फिर क्या था मैं उन क्रिकेट सपोर्टर साहब से भिड़ गया (पर ये न समझें कि मुझे क्रिकेट पसंद नहीं... मैं भी बहुत बड़ा फैन हूं) पर वो ना मानें... सही भी है माने भी तो कैसे... जब उपर बैठे लोगों की नसों में भी क्रिकेटिया खून ही बह रहा है तो भला जनता थोड़े ही ना किसी की सुनती है... हां एक बात तो बताना ही भूल गया... बात आज संसद में उठी... लेकिन सिर्फ दो मिनट के लिए.. लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने इसके लिए जिम्मेदार लोगों को सुनाया भी... लेकिन इससे उन बेचारे बॉक्सर्स का कुछ भला तो होने से रहा... एक खिलाड़ी तो मीडिया को वहां पर देखकर ही खुश था... उसने कहा " चलो कोई तो हमारा इंतज़ार कर रहा है... देखकर खुशी हुई... " अब बताइए भला इस तरह का रवैया रहा सरकार और अधिकारियों का तो कैसे मिलेंगे ओलंपिक में मेडल... लेकिन इन्हीं टीवी चैनल्स या अखबार में से कोई ये दिखाने या छापने से परहेज़ नहीं करेगा कि क्रिकेट के अलावा जिन दूसरे खेलों के खिलाड़ी हैं वो सिर्फ नाम के लिए चैंपियनशिप्स में भाग लेने के लिए जाते हैं.. और खाली हाथ वापस लौट जाते हैं...
अब मैं भी कितना बोलूं... हर बार सोचता हूं कम बोला करूं... लेकिन बोले बिना तो रहा ही नहीं जाता ना...