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Tuesday, August 07, 2012

रिश्ते

करीब 3 साल पहले जब चीनी प्रधानमंत्री भारत के दौरे पर आए थे.. तब ये कहानी लिखी थी... आज अपने पुराने ईमेल चेक कर रहा था.. तो किसी मेल में ये दिख गई.. सोचा आप लोगों से शेयर कर लूं... ज़रूर पढ़ें और अपने विचारों से मुझे ज़रूर अवगत कराएं... आपलोगों के कमेंट्स से ही आगे और लिखने की ताकत मिलती है.. 




रिश्ते भी बड़े अजीब होते हैं... ज़रा सी चूक हो जाए.. उंच-नीच हो जाए तो फिर कोई भी सफाई... कोई भी जवाब... कुछ भी काम नहीं करता.. उसके बाद शुरु होती है रिश्तों को फिर से ठीक करने की कवायद... हम सोचते हैं कि अपनी इस कोशिश से सब कुछ ठीक कर लेंगे... सबकुछ पहले जैसा हो जाएगा... लेकिन ये कवायद ज़िंदगी भर चलती है... और नतीजा वही होता है जहां से इन सबकी शुरुआत होती है... कभी-कभी तो जी करता है छोड़ो यार... जिसको जो करना है वो करेगा ही... अगर समझ नहीं आ रहा तो मैं अपना खून क्यों जला रहा हूं.... लेकिन क्या करें.. दिमाग में कंप्यूटर की तरह शटडाउन बटन तो होता नहीं कि बटन दबाया और दिमाग बंद... पता नहीं संजय के दिमाग में और क्या-क्या चल रहा था... तभी उसे लगा कि कहीं से कोई उसे बुला रहा है... दिमाग फौरन वहां पहुंचा जहां वो काम कर रहा था... देखा तो उसके बॉस बुला रहे हैं... 

हां सर...

अरे संजय... वो पीएम का क्या हुआ...

पीएम... क्या हुआ सर...

अरे चीन के प्रधानमंत्री भारत दौरे पर हैं ना... आज भारतीय प्रधानमंत्री से मुलाकात होनी थी.. कोई खबर आई क्या... 

अरे हां सर.. दिमाग से निकल ही गया था... मैं देखता हूं...

इन्हें भी कोई और नहीं मिलता.. जब देखो तो मैं ही नज़र आता हूं.. एक तो छुट्टी नहीं देते... मांगने पर कहते हैं कि इतने सारे बिहारी मीडिया में हैं... सबको छठ पर घर जाना होता है... छुट्टी दे दूं तो चैनल चलेगा कैसे... चलो छुट्टी ना दी.. तो कम से कम थोड़ी देर आज के दिन छोड़ तो दो कि छठ के विजुअल ही देख कर संतोष कर लूं... लेकिन नहीं... आपको तो बर्दाश्त ही नहीं होता कि कोई दफ्तर में दो मिनट भी खाली कैसे बैठा है...

संजय भुनभुनाता हुआ अपनी डेस्क पर पहुंचा... साला चैनल की नौकरी ही बेकार है... दिमाग फिर गया था कि मीडिया में नौकरी करने चला आया... थोड़ी देर तक छठ की तस्वीरें देखता रहा... साथ ही अपने बचपन को भी याद करता रहा... उसके बाद पीएमओ (प्राइम मिनिस्टर्स ऑफिस) कवर करने वाले रिपोर्टर को फोन किया... 

अरे सर क्या निकला बातचीत में... चीनी प्रधानमंत्री ने कुछ बोला क्या ?

दूसरी ओर से आवाज़ आई

अरे नहीं कुछ नहीं बोला यार.. दोनों ने एक-दूसरे से हाथ मिलाया और चीनी प्रधानमंत्री ने पता नहीं चाइनीज़ में बुदबुदा कर क्या बोला... अभी-अभी प्रेस स्टेटमेंट हाथ में आई है.. देखता हूं इसमें क्या लिखा है... 

संजय का दिमाग एक बार फिर छठ घाट पर पहुंच गया... उसे याद आया की छठ के दिन गांव के सारे लोग अपने-अपने गिले-शिकवे.. अपनी-अपनी लड़ाईयां भूल कर एक दूसरे के साथ खड़े रहते हैं... बातचीत करते हैं.. परिवार का हाल-चाल पूछते हैं... कुछ ऐसा ही तो सुदर्शन चाचा और उसके पिता जी भी करते हैं... छठ के दिन घाट पर दोनों मिलते हैं... साथ-साथ काम करते हैं... सफाई से लेकर साज सजावट सबमें दोनों एक साथ ही रहते हैं... लेकिन उसके बाद तो जैसे तलवारें खिंच जाती हैं... 20 साल से उपर हो गए दोनों भाइयों के बीच दुश्मनी को.. घर में आना-जाना तो छोड़िए बोल-चाल भी बंद है.... लेकिन छठ घाट पर दोनों दुश्मनी भूल जाते हैं... दोनों के हंसते हुए चेहरे संजय को याद आ रहे थे... तभी फिर आवाज़ आई... 

"अरे भइया सुन रहे हो कि नहीं... पीएम ने कहा है कि अरुणाचल और दलाई लामा के मुद्दे पर कोई बात नहीं हुई.. लेकिन दोनों ही देश एक दूसरे से बेहतर संबंध चाहते हैं... और इसके लिए छोटी मोटी बाधाएं नहीं आने दी जाएंगी... "

रिपोर्टर की बातों सुनकर संजय का मन खीझ उठा.. 

अरे यार जिस पर विवाद है... उसी पर बात नहीं हुई... और बावजूद इसके कहा ये जाता है कि दोनों ही देश बेहतर संबंध चाहते हैं... हद है यार... 

लेकिन संजय का दिमाग थोड़ा ठिठका... और वो खुद ब खुद बोल उठा..

हां  यार.. इसमें गलत ही क्या है... जब पर्व त्योहार पर पिताजी और चाचाजी मिल सकते हैं... बातचीत कर सकते हैं... एक-दूसरे के परिवारों का हालचाल पूछ सकते हैं.. लेकिन जब बात झगड़े को सुलझाने की आती है तो दोनों में से कोई भी ना तो पहल करता है.. और ना ही इसपर बातचीत ही करता है... तो फिर जब एक परिवार अपना झगड़ा नहीं सुलझा सकता तो बेचारे दो देशों के प्रधानमंत्री दोनों देशों के झगड़े को कैसे निपटाएंगे... कैसे सुलझाएंगे.. 

संजय का मन एक बार फिर पीएमओ से उठकर अपने गांव के छठ घाट पर पहुंच गया... उसे याद आ रहा था कि किस तरह बचपन में वो अपने भाई के साथ पटाखों के लिए लड़ने पर उतारू हो जाता था... उसे ज़रा भी बर्दाश्त नहीं होता कि वो अपने पटाखे में भाई को हिस्सा दे... वो सारे के सारे पटाखों को खुद ही उड़ाना चाहता था... लेकिन पिताजी के कहने पर मजबूरी में उसे अपने भाई को पटाखे देने ही पड़ते थे... संजय की सोच अपनी उड़ान भरती ही जा रही थी... कि तभी कानों में फिर से बॉस के ऑडियो की एंट्री हुई.. 

संजय बताओ यार चीनी प्रधानमंत्री के साथ बैठक भी हो गयी और निकला कुछ नहीं... अरे साले सब बेकार हैं.. बहुत दब्बू पीएम है या अपना... बताओ कुछ बोला ही नहीं.... अरे जो समस्याएं हैं... जिन पर विवाद हैं उन पर तो बात करनी ही चाहिए... विवादित मुद्दों पर बात नहीं करेंगे तो वो सुलझेंगे कैसे... साला कुछ नहीं हो सकता.. ये  चीनी फिर वहीं भाई-भाई का नारा देंगे... और फिर वही करेंगे जो 62 में किया था... यार क्या होगा इस देश का... समझ में नहीं आता... संजय तुम्हारा शो तो रेडी है ना.. यार छठ से बुलेटिन ओपन करना... दिल्ली और मुंबई में बिहारी हैं उनसे टीआरपी तो मिल जाएगी... "

संजय को लगा कि बॉस का मूड आज ठीक है... क्यों ना उन्हें अपनी मन की बात बता दी जाए... तो फौरन संजय ने बात छेड़ी... 

हां सर बिल्कुल सही कहा आपने... कि जबतक विवादों पर बात नहीं होगी.. परेशानियां बताईं नहीं जाएंगी.. तबतक विवाद सुलझेंगे नहीं... वैसे सर एक बात बताइए... ऑफिस में भी तो इतनी सारी प्रॉबलम्स हैं... ये बात मैनेजमेंट से लेकर आप भी जानते हैं...आप इतनी बड़ी बड़ी मीटिंग्स में जाते हैं... तो सर कभी हमारी समस्याओं को भी उठा दिया कीजिए...

इतना सुनना था की बॉस की बोली एकदम पलट गई... 

अरे यार संजय.. तुम भी क्या बात करते हो... अपनी नौकरी प्यारी नहीं है क्या मुझे... पागल हूं मैं जो ये सब बात मीटिंग में कहूंगा...

इतना कहकर बॉस तो चले गए.. लेकिन संजय हैरान सा खड़ा था... कि अभी-अभी तो बॉस अपने ही देश के पीएम को दब्बू करार दे रहे थे... देश के भविष्य के बारे में सोच रहे थे... लेकिन जब बात अपने ऑफिस के भविष्य की दूसरी समस्याओं पर गई.. तो बंदा एकदम से पलट पड़ा... संजय के दिमाग में गांव के छठ घाट पर अपने चाचा और पिताजी की मुलाकात से लेकर... दिल्ली के प्रधानमंत्री ऑफिस में भारत और चीन के प्रधानमंत्रियों की मुलाकात की बातें घूम गईं.. संजय के मुंह से बरबस ही निकल पड़ा.. 

हां भई.. बात तो सोलह आने सच है.. अपनी नौकरी जो बचानी है... चाहे बाकी लोग भांड़ में जाएं... हर किसी को अपनी ही बचानी होती है... दूसरे से उसे क्या मतलब है...  बेचारे चीन और हमारे देश के प्रधानमंत्री भी यही सोचते होंगे कि .. अरे नौकरी बचा ली जाए... समस्याएं और परेशानियां तो वहीं रहेंगी जहां हैं... सालों पहले से चले आ रहे झगड़ों के चक्कर में अपना वर्तमान क्यों बर्बाद किया जाए... 

संजय चुपचाप पीसीआर (प्रोडक्शन कंट्रोल रूम) की ओर बढ़ चला... शो के ऑन एयर जाने का टाइम हो गया था.... आखिर उसे भी तो अपनी नौकरी बचानी थी...