मुझसे जुड़ें

Tuesday, August 16, 2016

बेटा पाकिस्तान ज्यादा चें चें ना करो बलूचिस्तान पर वरना आधे रह जाओगे

बलूचिस्तान अलग हुआ तो आधा पाकिस्तान साफ

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बलूचिस्तान का नाम क्या लिया.. पाकिस्तान में हंगामा मच गया... अब पाकिस्तानी नेताओं और सेना को डर लगने लगा है कि कहीं बलूचिस्तान हाथ से न निकल जाए... पिछले कुछ साल में बलूचों ने आज़ादी की अपनी  जंग तेज़ कर दी है.. अगर बलूचिस्तान हटा तो पाकिस्तान आधा रह जाएगा...

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने एक बार किसी समारोह में कहा था एक बार जब उन्हें पता चल जाएगा कि भारत ने अपना गियर रक्षात्मक से आक्रामक कर दिया है तो वो समझ जाएंगे कि अब इसे झेलना उनके लिए नामुमकिन है, अगर आप एक मुंबई करोगे तो बलूचिस्तान को खो दोगे, इसमें कोई परमाणु युद्ध नहीं होगा, अगर आप तरीके जानते हो तो हम आपसे बेहतर तरीके जानते हैं,  ये अजित डोभाल का तब का बयान है जब वो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नहीं हुआ करते थे.. तब उन्होंने पाकिस्तान को बलूचिस्तान की अहमियत बतायी थी.. लेकिन पाकिस्तान को सीधी बात समझने की आदत है हीं नहीं... आखिर बलूचिस्तान पर जबरन कब्ज़े का उसे गुमान जो है..

बलूचिस्तान पर पाकिस्तानी कब्ज़ा गैर-कानूनी 

1948 में पाकिस्तान ने बलूचिस्तान पर जबरदस्ती कब्ज़ा किया... एक आज़ाद मुल्क को हथियारों के दम पर अपना गुलाम बना लिया.. 68 साल बीत गए बलूचों को अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ते... अगर वो ये लड़ाई जीत जाते हैं.. तो पाकिस्तान का नक्शा एक बार फिर बदल जाएगा... बलूचिस्तान अलग हुआ.. तो आधा पाकिस्तान साफ हो जाएगा... पाकिस्तान से अलग होने के लिए जिस तरह बलूचिस्तान ने जंग छेड़ रखी है.. अगर वो उसमें कामयाब हुआ तो 1971 के बाद पाकिस्तान का नक्शा एक बार फिर बदल जाएगा... और इस बार का बदलाव पाकिस्तान के लिए बड़ा ज़ख्म दे जाएगा.. क्योंकि पाकिस्तान के नक्शे से बलूचिस्तान का अलग होने का मतलब है.. आधे पाकिस्तान का साफ हो जाना...

बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर ना-पाक नज़र

दरअसल बलूचिस्तान चार बड़ी रियासतों मकरान.. खरान.. लास बेला और कलात को मिलाकर बनाया गया.. और ये पूरे पाकिस्तान का करीब 47 फीसदी इलाका है.. जाहिर है नक्शे से बलूचिस्तान कटा तो.. पाकिस्तान अपने आधे हिस्से से हाथ धो बैठेगा, पाकिस्तान के लिए बलूचिस्तान को खोने का मतलब सिर्फ ये नहीं है कि उसकी 47 फीसदी ज़मीन चली जाएगी.. बल्कि आर्थिक तौर पर भी उसे बड़ा झटका लगेगा.. क्योंकि बलूचिस्तान कमाई के नज़रिए से भी पाकिस्तान के लिए बेहद अहम है.. पूरे पाकिस्तान का एक तिहाई प्राकृतिक गैस यहीं से निकलता है... तेल के भी बड़े भंडार यहां मौजूद है.. सैकड़ों खानों से यहां सोना निकाला जा रहा है... तांबे के भी बड़े भंडार हैं... यूरेनियम भी यहां की धरती में पाया जाता है..


लेकिन पाकिस्तान अब तक सिर्फ इसको दोहन ही करता आ रहा है.. बलूच लोगों के लिए इससे ज्यादा दुखदायी बात और क्या होगी कि इलाके में गैस मिलने के करीब तीस साल बाद उन्हें गैसा की सप्लाई शुरु की गयी.. जबकि पाकिस्तान ने 1955 से ही उसे बेचना शुरु कर दिया था..

पाकिस्तान का सबसे पिछड़ा राज्य है बलूचिस्तान 

वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के 10 सबसे पिछड़े ज़िलों में से 8 बलूचिस्तान के हैं.. पूरे पाकिस्तान की 47 फीसदी साक्षरता की दर के मुकाबले बलूचों की साक्षरता दर महज़ 22 फीसदी है.. पूरे पाकिस्तान में 86 फीसदी लोगों को मिल रहे पीने का पानी के मुकाबले बलूचिस्तान के सिर्फ 20 फीसदी लोगों को ही पीने का पानी उपलब्ध है..  अंग्रेज़ों ने बलूचिस्तान को भारत और पाकिस्तान से भी पहले आज़ाद देश घोषित कर दिया था.. 11 अगस्त 1947 बलूचिस्तान आज़ाद हो चुका था.... उस समय राजकुमार यार मोहम्मद खान का बलूचिस्तान पर शासन था.. और उनकी राजधानी थी कलाट.. मोहम्मद अली जिन्ना..यार मोहम्मद खान से मिले.. उन्हें कहा कि मज़हब के नाम पर वो पाकिस्तान के साथ मिल जाएं.. जिन्ना के इस प्रस्ताव को बलूचिस्तान की संसद ने एक सिरे से खारिज कर दिया..

27 मार्च को बलूच मनाते हैं ब्लैक डे

वो तारीख थी 27 मार्च 1948... जब पाकिस्तान ने फौज और हथियार के दम पर बलूचिस्तान को अपने में मिला लिया.. पाकिस्तान ने 27 मार्च 1948 को गैर कानूनी तरीके से बलूचिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया.. दुनियाभर में जहां भी बलूच लोग हैं.. वो हर साल 27 मार्च को काले दिन के रूप में मनाते हैं... इस दिन बलूचिस्तान की ज़मीन तो पाकिस्तान ने हड़प ली लेकिन वहां के लोगों को अपने साथ ना कर सका.. आज भी बलूच अपने आप को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं मानते हैं.. बलूच ताकतवर ना हो जाएं इसलिए पाकिस्तानी सेना यहां अत्याचार करती है... सरकार की ओर से सेना को वहां जुल्म करने की छूट मिली हुई है... सेना जो चाहे वो करती है... बलूचों को जान से मारना और उनके घरों को जलाकर राख कर देना यहां आम बात है..

बलूचिस्तान में अल्पसंख्यक हुए बलूच

पाकिस्तान.. बलूचिस्तान पर चौतरफा वार कर रहा है... पाकिस्तानी सेना आए दिन नौजवानों को बिना कुछ कहे उठा ले जाती है... रोज़ाना कहीं ना कहीं सेना बलूचों को मार रही है... अब तो हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं.. बलूच अपने ही प्रदेश में अल्पसंख्यक बन चुके हैं.. पाकिस्तान के कब्ज़े से पहले बलूचिस्तान में बड़ी आबादी शिया मुसलमानों की थी.. लेकिन पिछले दस सालों में पाकिस्तानी सेना करीब 20 हज़ार बलूचों को मार चुकी है... एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब 21 हज़ार बलूच युवक लापता हैं.. पाकिस्तान जानबूझकर यहां पंजाब और दूसरे इलाकों से लाकर लोगों को बसा रहा है... नतीजा ये हुआ कि बलूचिस्तान में बलूच लोग ही अल्पसंख्यक हो गए हैं.. बड़ी आबादी अब सुन्नी मुसलमानों की हो गयी है..

पाकिस्तान का बलूचों पर अत्याचार

ज़ाहिर है पाकिस्तान की ये नापाक चाल बलूच लोगों की भी समझ में आ रही है.. क्योंकि बलूच जानते हैं कि उनकी ये ज़मीन पाकिस्तान के लिए सोने की चिड़िया है... गैस और तेल के बड़े भंडारों के साथ सोने और तांबे जैसी कीमती धातुओं के यहां भंडार हैं.. पाकिस्तान उनकी ज़मीन से अपना खज़ाना भर रहा है.. लेकिन बलूचों को एक चवन्नी भी नहीं दी जा रही.. चीन की मदद से पाकिस्तान यहां के प्राकृतिक संसाधनों को निकाल रहा है.. ज़ाहिर है जो इलाका प्राकृतिक संसाधनों से भरा हुआ हो... गैस और तेल के बड़े भंडार हों... सोने और तांबे जैसी धातुओं की खानें हों.. तो वहां से कितनी कमाई हो रही होगी.. लेकिन विकास के नाम पर यहां कुछ भी नहीं किया गया.. बलूचों की हालत तो उससे भी खराब हो गयी है.. जब वहां अंग्रेज़ों की हूकूमत थी..

ज़ाहिर है पाकिस्तान के इन्हीं ज़ुल्मों सितम ने बलूचों को इतना नाराज़ कर दिया है कि वो अपनी आज़ादी के लिए जान देने से भी पीछे नहीं हट रहे...बलूचिस्तान का भारत से नाता बेहद पुराना है... आज़ादी के पहले से ही बलूच.. हिंदुस्तान को अपना करीबी मानते रहे हैं.. इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब लाल किले से बलूचिस्तान का नाम लिया.. तो दुनियाभर में मौजूद बलूच नेताओं ने इसके प्रधानमंत्री का शुक्रिया अदा किया

बलूचिस्तान पर इतना बवाल क्यों ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ऑपरेशन बलूचिस्तान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से एक ऐसी बात कही.. जिसे आज से पहले भारत के किसी भी प्रधानमंत्री ने नहीं कहा... उन्होंने भाषण में PoK और गिलगित के साथ बलूचिस्तान का नाम लिया.. विरोधी इसे गलत ठहरा रहे हैं... जबकि बलूचिस्तान के लोग इसका स्वागत कर रहे हैं... मोदी के बयान की वजह से बलूच समस्या एक बार फिर दुनिया के सामने आ गयी है... प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इन बातों ने अब नयी बहस छेड़ दी है.. बहस इस बात की आखिर उन्होंने अपने भाषण में बलूचिस्तान और गिलगित का नाम क्यों लिया.. लेकिन इसका एक पक्ष ये भी है कि... उनकी इन बातों के बाद बलूचिस्तान की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे बलूच लोगों ने उनके बयान का स्वागत किया है...

भारत क्यों पड़ा  बलूचिस्तान विवाद में ?

आखिर बलूचिस्तान और पाकिस्तान के इस विवाद के बीच में आने की ज़रूरत भारत को क्यों पड़ी.. ये बताने से पहले आपको ये समझना पड़ेगा कि पाकिस्तान की बनावट क्या है और वहां बलूचिस्तान क्यों विवाद की वजह बना है... पाकिस्तान के चार मुख्य प्रांत हैं... पंजाब.. सिंध... खैबर पख्तुनवा और बलूचिस्तान... इसके अलावा फाटा का इलाका है.. जिसका प्रशासन सीधे पाकिस्तान की केंद्र सरकार के अधीन है... इसके अलावा गिलगित और बालटिस्तान का इलाका है... जिन्हें स्वायत्त प्रदेश कहा जाता है... बलूचिस्तान पाकिस्तान का पश्चिमी प्रांत है जिसकी राजधानी क्वेटा है... इसकी सीमा एक ओर ईरान से लगती है.. दूसरी ओर अफगानिस्तान से लगती है.. और तीसरी ओर पाकिस्तान से लगती है...


अब सवाल ये है कि आखिर बलूचिस्तान को लेकर इतना विवाद है क्यों... क्यों पाकिस्तान की सरकार और पाकिस्तानी सेना पर बलूचिस्तान को लेकर बड़े आरोप लगते रहते हैं...  और क्यों बलूचिस्तान के लोग पाकिस्तान से आज़ाद होना चाहते हैं... पहले आपको बताते हैं कि पाकिस्तान के लिए बलूचिस्तान इतना अहम क्यों है... दरअसल बलूचिस्तान में यूरेनियम,पेट्रोल,प्राकृतिक गैस,तांबा और कई अन्य धातुओं के भंडार हैं... पाकिस्तान की कुल प्राकृतिक गैस का एक तिहाई यहीं से निकलता है... यही नहीं अरब सागर के किनारे होने की वजह से बलूचिस्तान सामरिक तौर पर भी पाकिस्तान के लिए बेहद अहम है... कतर,ईरान या तुर्कमेनिस्तान से कोई भी गैस या तेल की पाइपलाइन गुजरेगी तो उसे बलूचिस्तान से होकर ही जाना होगा

बलूचिस्तान में पाकिस्तान और चीन का गठबंधन

पाकिस्तान. चीन की मदद से बलूचिस्तान में कई बड़े प्रोजेक्ट्स चला रहा है... जिससे पाकिस्तान और चीन के खज़ाने तो भर रहे हैं.. लेकिन बलूचिस्तान के लोगों को कुछ भी नहीं मिल रहा...
वक्त के साथ बलोच अपने हक के के लिए आवाज़ उठाते रहे... लेकिन पाकिस्तानी सेना हर बार उन्हें अपनी ताकत के दम पर कुचलती आ रही है... हर बीते वक्त के साथ पाकिस्तान में सरकारें बदलती रहीं... अगर कुछ नहीं बदला तो वो था बलूचिस्तान के लिए उसका रवैया... इस बार जब नवाज़ शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने.. तब बलूच लोगों को एक उम्मीद सी जगी.. लेकिन उनकी ये उम्मीद भी झूठी निकली...

11 अगस्त 1947 को ही बलूचिस्तान आज़ाद हुआ... 1948 में पाकिस्तान ने जबरन बलूचिस्तान पर कब्ज़ा किया.. .तब से लेकर आज तक उसने अपने आप को कभी भी पाकिस्तान का हिस्सा नहीं माना... और यही बात पाकिस्तान को नागवार गुज़रती है.. जिसका खामियाज़ा बलूची लोग.. पाकिस्तानी सेना के ज़ुल्मों के ज़रिए भुगतते हैं... पाकिस्तान के इन जुल्मों सितम के खिलाफ आज भी लड़ाई जारी है... और यही वजह है कि बलूचिस्तान पर पाकिस्तान का ज़ुल्म कम होने की बजाए बढ़ता ही जा रहा है... और इसकी शुरुआत हुई 1948 में जब उसने अपनी सैन्य ताकत के दम पर बलूचिस्तान पर कब्ज़ा किया...


बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना का दमन

उसके बाद 1958, 1962 और 1973 में पाकिस्तान ने बड़ा सैन्य अभियान चलाया.. ताकि विद्रोहियों को दबाया जा सके,  1973 के सैन्य अभियान में पाकिस्तानी सेना के करीब 400 जवानों और करीब 8 हजार बलूच लड़ाकों की मौत हुई, 2004 से अब तक हुए पाकिस्तानी मिलिट्री ऑपरेशनों में बलूचिस्तान के करीब 19,000 लोग मारे जा चुके हैं, पाकिस्तान लगातार लोकतांत्रिक बलूच नेताओं की हत्या और कट्टरपंथियों की आर्थिक मदद करता आ रहा है.. किसी भी बलूच को सेना और सरकारी नौकरियों ने नहीं आने दिया जाता... पाकिस्तान सेना पर बलूच महिलाओं के शोषण के आरोप भी लगातार लगते आ रहे हैं

2005 में बलूचिस्तानी नेताओं नवाब अकबर खां बुग्ती और मीर बालच मर्री ने पाकिस्तान सरकार के सामने 15 सूत्रीय एजेंडा रखा. एजेंडे में बलूच प्रांत के लिए ज्यादा अधिकारों की मांग की गई. लेकिन मांगों के बदले अगस्त 2006 में पाकिस्तानी सेना ने बुग्ती को मार गिराया... बुग्ती पर पाक के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ पर हमले का आरोप लगाया गया. नतीजा ये हुआ.. कि पाकिस्तान के खिलाफ विद्रोह की चिंगारियां भड़कती रहीं... बलूच विद्रोहियों की मांग है कि पाकिस्तान बलूचिस्तान को स्वतंत्र देश घोषित करे... पाकिस्तानी सेना के अभियानों को रोका जाए... प्राकृतिक गैस और तेल भंडारों से होने वाली कमाई में बलूचिस्तान को हिस्सा दिया जाए... साथ ही कमाई का कुछ हिस्सा इलाके के विकास पर खर्च किया जाए..

बलूचिस्तान में भारत की दखल का आरोप

बलूचिस्तान के विद्रोह में पाकिस्तान भारत का हाथ बताता है... जबकि भारत हमेशा से कहता आ रहा है कि ये पाकिस्तान का अंदरूनी मामला है... इस पर विवाद 2009 में ज्यादा बढ़ा.. जब इजिप्ट के शर्म अल शेख में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गिलानी की मुलाकात हुई... भारत और पाकिस्तान का जो साझा बयान जारी किया गया.. उस पर गिलानी ने कहा था कि इस बयान में पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में भारत की दखअंदाज़ी का ज़िक्र किया है.. जिसके बाद भारत में विवाद पैदा हुआ.. और मनमोहन सिंह को संसद में इस पर सफाई देनी पड़ी..

बलूचिस्तान पर भारत का रूख सिर्फ इतना है कि पाकिस्तान को पहले अपने घर में मचे घमासान को संभालना चाहिए.. ना कि उसे भारत के अभिन्न अंग कश्मीर की चिंता करनी चाहिए... 

Wednesday, August 10, 2016

संजना पार्ट - 1


अरे मां तुम तो बेकार में ही परेशान हो रही हो..

नहीं नहीं.. यहां पर अब सब ठीक है... 

मां... लड़कियों के लिए दिल्ली अब सेफ है.. शेफाली ने सबकुछ बताया है मुझे... उसे भी साल होने को आ गया दिल्ली में... कोई खतरा नहीं है यहां पर... 

क्या मां...एक बार दिल्ली में इतना बड़ा हादसा हो गया तो हर बार होगा क्या... और तुम टेंशन मत लो मैं और शेफाली रह लेंगे यहां पर... हज़ारों लड़कियां रहती हैं दिल्ली में मां.. 

चलो अब बाद में बात करती हूं.. ज़रा सामान तो सेट कर लूं... 

संजना... 21 साल उम्र... खुशमिजाज़... होशियार... आज के ज़माने की लड़की... रुढ़ीवादी बंधनों में उसने शुरु से ही बंधना नहीं सीखा... इसीलिए तो एमबीए करने दिल्ली गयी... आखों में हज़ारों सपने हैं...एमबीए के बाद अच्छी सी नौकरी... नौकरी में अपनी मेहनत से तरक्की... उसके बाद शादी... फिर घर परिवार.. सबकुछ सोच रखा है उसने... और अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए वो दिल्ली आ गयी... 

दिल्ली... कहते हैं कि दिल्ली दिलवालों की है... लेकिन 16 दिसंबर 2012 को जो कुछ भी दिल्ली में हुआ... उसने पूरी दुनिया को दहला दिया... इसलिए संजना की मां ज्यादा फिक्रमंद हो रहीं थी.. अकेली बच्ची... जिसने अभी-अभी जवानी में कदम रखा है... इतना बड़ा शहर... कुछ गड़बड़ हो गयी तो... लेकिन संजना की ज़िद के आगे तो सब बेकार है... 

संजना अपनी दोस्त शेफाली के साथ साउथ एक्सटेंशन के एक पीजी में शिफ्ट हो गयी है... पीजी के अपने नियम कायदे हैं जिनका पालन करना ज़रूरी है... और पीजी की केयरटेकर मैडम तो बेहद कड़क स्वभाव की हैं... संजना को पहली बार घर से आज़ाद होना बहुत अच्छा लग रहा था... घर में कई बंदिशें.. ये मत पहनो... यहां मत जाओ... वहां मत जाओ... उपर से पापा और भैया का पूरे शहर भर में पहचान होना.. छोटा सा शहर था उनका... इसलिए उसके पापा और भैया को हर छोटा बड़ा जानता था.. लेकिन दिल्ली की बात ही अलग है... आज़ाद पंछी हो गयी है वो... कल एडमिशन लेने जाना है.. इसलिए संजना जल्दी सो गयी.. 

दिल्ली की सुबह वैसे ही अलसायी होती है... और यहां पर ना तो पापा की आवाज़ आयी... और ना ही भैया ने उसे ज़बरदस्ती उठाया... खैर जल्दी से उठ कर तैयार हुई... और फौरन कॉलेज के लिए भागी..संजना बस स्टॉप पहुंची तो भीड़ देखकर उसकी हिम्मत नहीं हुई... कॉलेज जल्दी भी पहुंचना था.. इसलिए उसने ऑटोवाले को हाथ दिया... 

भइया... धौला कुआं चलोगे.. 

हां मैडम.. बैठो... 

कितने पैसे लोगे... 

100 रुपए मैडम...

100 रुपए.. बहुत ज्यादा है... 

अच्छा चलो आप 90 रुपए ही दे देना... ऑटो वाले ने बेहद भद्दे तरीके से घूरते हुए कहा... 

संजना को ऑटो वाले का यूं घूरना और बात करना ज़रा भी पसंद नहीं आया... उसे फौरन उसके शहर के ऑटोवाले याद आ गए... हम उम्र हुआ तो बहन जी बुलाते.. उम्रदराज़ हुए.. तो बेटी ही कहते थे.. शहर के छोटे होने के अपने फायदे और नुकसान दोनों ही हैं... रास्ते भर ऑटो में सिकुड़ी हुई बैठी रही.. बैक मिरर से ऑटोवाला लगातार उसे देख रहा था.. 

भइया सीधे देख कर चलो... वरना किसी गाड़ी से भिड़ा दोगे... 

ऑटो वाले ने अपने गंदे दांत दिखाते हुए बोला... अरे मैडम... 15 साल का था तब से ऑटो चला रहा हूं... टेंशन ना लो... देखता कहीं भी रहूं... टक्कर नहीं होगी... और आप हैं ही ऐसी की नज़रें चली ही जाती हैं... 

संजना को काटो तो खून नहीं... खैर किसी तरह संजना कॉलेज पहुंची... दिमाग में हज़ारों बातें चल रही थी... मम्मी की नसीहतें... पापा के सलाह.. और भैया का हौसला देना... छोटे शहर की लड़की थी ना.. इतने बड़े शहर में डर तो लगना ही था... खैर दिनभर एडमिशन के चक्कर में ही लग गए... शाम को थकी-हार निहारिका पीजी पहुंची... अब उसे पता चला कि.. लोग बड़े शहर में आकर छोटे शहर वालों को भूल क्यों जाते हैं... अपनी हालत ठीक रहे तब तो कुछ और भी याद आए.. 

और संजना कैसा रहा दिल्ली में पहला दिन... शेफाली ने पूछा... 

मत पूछ यार... कैसी ज़िंदगी है यहां पर... सब भागते रहते हैं... या फिर घूरते रहते हैं... सुंदर हो या बदसूरत बस उसका लड़की होना गुनाह हो गया है... जाने कैसे लोग हैं यहां पर... 

अरे तू इतने से घबरा गयी... दिल्ली है मैडम दिल्ली... यहां पर बहुत कुछ देखना पड़ता है मैडम... आप तो अभी स्टूडेंट हैं... ज़रा हम कॉल सेंटर वालों की हालत तो जान लीजिए... ना घर के हैं... ना घाट के... सारी रात जाग कर काम करते रहो.. और दिन भर उल्लुओं की तरह सोते रहो...

तो कोई ऐसी नौकरी कर ले... जो इंसानों के लिए है.. क्यों उल्लू बनी हुई है... 

यहां आदमियों की कमी है मैडम... नौकरियों की नहीं... जो भी यहां आता है.. उसके लिए कुछ ना कुछ तो दिल्ली में है हीं...और एक बार जहां फंस गए...तो समझ ले.. निकलना बेहद मुश्किल होता है... कभी दूसरी नौकरी मन मुताबिक नहीं मिलती.. तो कहीं पर बॉस की निगाहें नौकरी करने नहीं देतीं...चल छोड़ ना यार... तू मस्त रह... 

एमबीए करने के बाद कहां जाने का इरादा है... विदेश तो नहीं जाएगी ना... 

अरे नहीं यार... यहीं दिल्ली में ही कोई अच्छी नौकरी मिल जाए.. बैंक में हो जाए.. तो उससे बेहतर कुछ भी नहीं हो सकता... 

हां ये भी ठीक है... यार मेरे लिए कुछ बना दे..ज़रा मैं अपने ब्वॉयफ्रेंड से बात कर लूं... 

क्या... तेरा ब्वॉयफ्रेंड भी है... 

हां.. और क्या... 

अरे बाप रे... घरवालों को पता है.. उसके बारे में... 

पागल है क्या... ब्वॉयफ्रेंड का पता घरवालों को चल गया..तो मेरा बोरिया बिस्तर बंध जाएगा यहां से... जो आज़ादी मिली है.. वो छिन जाएगी... फिर किसी लड़के के साथ शादी कर दी जाएगी.. और मेरे सारे सपने अपना दम तोड़ देंगे... 

क्यों तो शादी नहीं करेगी... या फिर ब्वॉयफ्रेंड से ही शादी का इरादा है...

ओए... सारी बातें अभी ही जान लेगी... या कुछ कल के लिए छोड़ेगी... फिलहाल तो ब्वॉयफ्रेंड बनाने में भलाई है... शादी-वादी तो बाद में देखेंगे... 

शेफाली का जवाब सुनकर हैरान परेशान और चेहरे पर असमंजस का भाव लिए संजना किचन में घुस गयी.. 

Saturday, July 16, 2016

ज़िंदगी




अरे तू तो वही है
जो अक्सर गरीबों की नींदों में दिखती है
जो इच्छाओं के हर नुक्कड़ पर खड़ी मिलती है
जो बच्चों की ज़िदों की छतों पर घूमती है
अरे कहीं तू ख्वाब तो नहीं

अरे तू तो वही है
जो हरदम भागती-दौ़ड़ती रहती है
जो सबको अपने पीछे रखती है
जो गरीबों के लिए ख्वाब है
जो अमीरों के लिए हैसियत है
अरे कहीं तू हसरत तो नहीं

अरे तू तो वही है
जिसने हर पल तड़पाना सीखा है
जिसने हर मोड़ पर गिराना सीखा है
जो ख्वाबों का गला घोंट देती है
जो हसरतों को सूली पर चढ़ा देती है
अरे कहीं तू ज़िंदगी तो नहीं

ज़िंदगी...चल तू बेवफा ही सही
भले ही घोंट दे तू हसरतों का गला
डूबो दे तू ख्वाबों को समंदर में
पर इतना तो समझ ही ले
तूझे हम जी के दिखाएंगे
तूफानों में लौ को जला कर दिखाएंगे
मौत से दोस्ती करने से पहले ऐ ज़िंदगी
तेरे हर पल को अपना बना कर दिखाएंगे


©Alok Ranjan

Sunday, July 03, 2016

MTCR में शामिल होने से भारत को क्या मिलेगा ?

भारत MTCR यानी मिसाइल टेक्नॉल्जी कंट्रोल रिजीम का सदस्य बन गया... अब अत्याधुनिक मिसाइल तकनीक पाने में उसे कोई मुश्किल नहीं होगी.. अब इससे चीन परेशान है.. क्योंकि वो इस ग्रुप का हिस्सा नहीं है.. भारत के विदेश सचिव एस जयशंकर की मौजूदगी में भारत को औपचारिक तौर पर MTCR यानि मिसाइल टेक्नॉल्जी कंट्रोल रिजीम का 35 वां सदस्य देश बनाया गया... यानि हथियारों के बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्था में भारत पहली बार एंट्री करेगा... MTCR में शामिल होने के चार बड़े फायदे हैं...

पहला फायदा 
अब भारत सदस्य देशों से अत्याधुनिक मिसाइल तकनीक आसानी से हासिल कर सकेगा..

दूसरा फायदा 
भारत अपनी मिसाइलें दूसरे देशों को बेच भी सकता है, यानि पहली बार हथियारों का निर्यातक देश बन सकेगा..

तीसरा फायदा
आतंरिक सुरक्षा के लिए अमेरिका से प्रीडेटर ड्रोन खरीद सकता है, जिनका इस्तेमाल आतंकवादियों पर हमले और नक्सली हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में किया जा सकेगा..

चौथा फायदा
न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप यानि एनएसजी की सदस्यता की दावेदारी मज़बूत होगी, 48 देशों के इस ग्रुप में प्रवेश का रास्ता एक बार फिर खुल सकेगा

MTCR का सदस्य बनने पर भारत को कुछ नियमों का पालन करना पड़ेगा जैसे अधिकतम 300 किलोमीटर से कम रेंज वाली मिसाइल बनाना, ताकि हथियारों की होड़ को रोका जा सके... 1987 में अमेरिका,  फ्रांस, जर्मनी, कनाडा, जापान, इटली और ब्रिटेन ने मिलकर MTCR का गठन किया.. भारत को मिलाकर अब इसमें 35 देश हो गए हैं... इसका मकसद केमिकल, बायलोजिकल और न्यूक्लियर मिसाइलों के इस्तेमाल को सीमित करना है...

MTCR में शामिल होने के बाद भारत सरकार के सूत्र इस बात का दावा कर रहे हैं कि एनएसजी में शामिल होने के लिए भारत का दरवाज़ा एक बार फिर से खुल सकता है.. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि विरोध कर रहे देशों के साथ चीन को आखिर भारत कैसे राज़ी करेगा.. वो चीन जो लगातार भारत का ये कहकर विरोध कर रहा है कि भारत पहले एनपीटी पर हस्ताक्षर करे और उसके बाद ही उसे एनएसजी में सदस्यता दी जाए