Thursday, October 22, 2009

माफ क दी हे छठी मइया

हमरा के माफी दे दी छठी मइया... रउरा पर्व में घरे ना आवे खतिरा माफ क दीं... राउर गीत ना गावे खतिरा माफ क दीं... सांझी खान घाट पर ना आवे खातिर माफ क दीं... सबेरे अरघ ना देवे खतिरा माफ क दीं... लिस्ट बहुत लंबा बा हे छठी मइया... हम त इ हे कहेम की सबकुछ खतिरा माफ क दीं... रउरा जान तानी नूं की हम काहे ना अइनी ह... रउरा इ हो जान तानी की घाट पर सफाई करे... केला के थम गाड़े... तिनकोनी रंग बिरंगा पताका लगावे हम काहे ना अइनी ह.. अब का कहीं... अपना देस से हम बाहर काहे बानी... इ हो रउरा जान तानी... सच बताईं हे छठी मइया... हमरा बड़ा मन करेला अपना गांव में आवे के... माटी के उ महक सूंघे के.. जौन हमरा खून में बसल बा... जब भी उदास होनी त माटी के उ सुगंध हम महसूस करेनी... लेकिन का करी हे माई... लोग रउरा नाम पर वोट मांगेला... त केहू रउरा नाम से भी चिढ़ेला... लेकिन रउरा त माई हयीं... सब राउर बच्चा ह लोग... हम जान तानी की माई कबो अपना बच्चा लोग में भेद ना करेला... लेकिन का कहल जाव.. पूत त कपूत होइए जाला... खैर कौनो बात ना... लेकिन हम फेर रउरा से माफी मांगेम... पापी पेट के भूख मिटावे खतिरा... गांव छोड़ही के पड़ल... अपना बाबूजी के सपना पूरा करे खतिरा माटी से दूर होखे के पड़ल... रउरा तो जानते होखेम.. की केतना दुख भइल होई आपन ज़मीन छोड़े के बेरी... लेकिन का करीं... पेट खतिरा दिल के बात ना मननी... आउरी कौनो चारा भी ना रहे हे माई... हम आपन जन्म देवे वाला माई के फाटल साड़ी में कइसे देख ती.. कइसे हम अपना दिल के मनवती की.. माई हमरा राती खान खिया के सुता देवे ले... का जाने उ खइलख हिया की ना... लेकिन कबो हम ओकरा चेहरा पर दुख ना देखनी... बेटा भरपेट खाके सुत गइल.. ओकरा से बढ़ के कौनो खुशी माई खातिर ना होला.. त बोली ना हे छठी माई.. हमार का गलती रहे... गलती त राउर बिगड़ल बच्चा सन के बा.. जौन खाली आपन घर देख तारन सन... ओकरा गांव में... ओकरा जिला में का होता ओसे कौनो मतलब नइखे.. लेकिन एगो बात बा.. पांच साल में एक बार राउर नाकारा बेटा सन गांव में ज़रूर आवेलन सन... हम जानेनी की ओकर हंसी... नकली हटे.. उ त हमनी पर हंस ता.. लेकिन का करी ऐ माई... हम त ओकरा खिलाफ वोट दे देम.. लेकिन जेकरा पढ़े लिखे खतिरा उ कुछू ना कइलख... जे जानते नइखे की बिजली केकर नाम ह... टीवी त ओकरा खतिरा सपना से कम नइखे... उ बेचारा त ओही हंसी पर वोट दे आवेला.. ओकरा खतिरा त इहे बड़ बात बा की... खद्दर के उज्जर कुर्ता पायजामा पहिनले बड़ आदमी ओकरा दुआर पर आ गइल... ऐ माई... अब उ का जाने की जौन बीपीएल कार्ड के पैसा आ राशन ओकरा मिले के चाही... उ तो इहे उज्जर कुर्ता पायजामा वाला हड़प क जाला... अब रउरे बतायीं माई.. हम का करे अपना गांवे आईं... हमार आपने पटीदार.. हमार अपने खून... इ ना सोचे ला की भइया चाहे चाचा के बढ़ोत्तरी हो ता.. त तनी हमूं कुछ अइसन करीं कि उनकरे जइसन हो जायीं... उ त सीधे सोचेला की कइसे हम इनकर नुकसान क दीं... उ फिर से परेशान हो जास.. कइसे उनकर टंगड़ी ध के खींच दिआव की.. उ उल्टे मुंहे गिर जास... ऐहीसे हे छठी मइया... हम रउरा से माफी मांग तानी... कोशिश हम बहुत कइनी की लोग के सोच बदल जाव... लेकिन सब इहे सोचेला लोग की गांव में त ऐतना लोग बा.. केहू बदल जायी.. हम काहे बदलीं... सब लोग चाहे ला की वीर कुंवर सिंह पैदा होखस... लेकिन अपना घर में ना... पड़ोस के चाचा के घर में... ऐ छठी मईया अपना इहो बेटा के नालायक समझ लेम आ जइसे दोसरा लोग माफ कदेवेनी वइसे हमरो के माफी दे देम...

Friday, October 2, 2009

क्यों ना बोलें बांबे ?

किसी ने कहा है कि मौन धारण करना ही किसी विवाद से बचने का अच्छा समाधान होता है... इसीलिए अक्सर चुप ही रहता हूं.... लेकिन आज फिर एक खबर ने बोलने पर मजबूर कर दिया... सुबह उठकर किसी न्यूज चैनल को ट्यून किया तो देखा ब्रेकिंग चल रही है... करण जौहर ने माफी मांगी... राज ठाकरे से माफी मांगी... फिल्म से बांबे शब्द हटाया जाएगा... अरे मैं करण जौहर से पूछता हूं कि क्या उनकी गैरत मर गयी है... क्या उन्हें ये लगा कि राज ठाकरे ने फिल्म में बांबे शब्द इस्तेमाल किए जाने पर जो विरोध किया था उससे उनका नुकसान हो जाएगा... अरे कोई करण जौहर को समझाओ की दो टके के नेता राज ठाकरे से लोग डरना छोड़ दें... मराठी मानुष की बात करता है राज ठाकरे.. और उन्हीं मराठी मानुष के कंधे पर रखकर अपने स्वार्थ की बंदूक चलाता है... अरे काहे का मुंबई और काहे का बांबे... जिस शहर को लोगों ने पांच दशकों से भी ज्यादा बांबे कहकर पुकारा उस शहर के लोग क्या इतनी जल्दी उसे भुला देंगे... क्या बांबे उनकी ज़ुबान से उतर जाएगा... अरे राज ठाकरे कभी अपना नाम बदलकर देखें... क्या उनके मां-बाप उनके घरवाले नए नाम को याद रख पाएंगे.. नहीं.. मेरा दावा है कि वो उन्हें तब भी राज कहकर ही बुलाएंगे... अरे इतनी खुरक चढ़ी है राज ठाकरे को तो हाईकोर्ट का नाम क्यों नहीं बदलवा देते... बांबे हाईकोर्ट को करवा दें मुंबई हाईकोर्ट... क्यों नहीं इसके लिए उनकी गली-मोहल्ले की पार्टी महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के लोग आंदोलन करते हैं... पार्टी का नाम रखा है महाराष्ट्र नव निर्माण सेना लेकिन काम हैं बंटवारे का... गुंडई का... डराने का... मराठा शान की झूठी तस्वीर पेश करने का... अरे मराठा छत्रप शिवाजी महाराज क्या सिर्फ मराठों के लिए लड़े... अरे वो तो पूरे देश के लिए लड़े... अभी सुबह सीएनएन-आईबीएन पर राज ठाकरे... राजदीप सरदेसाई के सवालों का जवाब दे रहे थें... देखकर और सुनकर बड़ा दुख हुआ कि राज ठाकरे हिंदी में पूछे गए सवालों का जवाब मराठी में दे रहे थे... अरे राज ठाकरे साहब क्या हिंदुस्तान आपका नहीं है... क्या राष्ट्रभाषा हिंदी आपकी भाषा नहीं है... अरे जब आपने ये प्रण कर ही लिया है कि आप हिंदी में बोलेंगे ही नहीं तो जनाब बंटवारे की राजनीति का ये तो सबसे पहला आधार आपने ही रखा है... आपने ही अपने आपको सबसे अलग कर लिया है... अरे साहब भाषा और क्षेत्र किसी की निजी संपत्ति नहीं होते... और आपने जो हिंदी नहीं बोलने का प्रण लेकर अपने मराठी भाईयों को जो कुछ भी दिखाने की कोशिश की है... वो सिर्फ और सिर्फ आपकी नीचता है... आपका अपना स्वार्थ है... मैं पूछता हूं क्या किया आपने अपने मराठी भाईयों के लिए... मुंबई पर हमला होता है तब तो आप और आपके चंपू नज़र नहीं आते... कहां थे आप उस वक्त... क्या आतंकवादियों ने ये देखकर लोगों को मारा था कि वो मराठी हैं कि बिहारी है कि उत्तर भारतीय हैं... राज ठाकरे साहब ना तो मुंबई आपकी है... ना महाराष्ट्र आपका है और ना ही ये देश आपका है... मुंबई... महाराष्ट्र... हिंदुस्तान हमारा है... और आप जैसे दो टके के नेताओं में इतनी ताकत नहीं कि वो हिंदुस्तानियों को क्षेत्रवाद के नाम पर बांट सके... सुधर जाइए नहीं तो किसी दिन ऐसा ना हो जाए कि आपको ही महाराष्ट्र तो क्या हिंदुस्तान से ही बाहर खदेड़ दिया जाए... चलते-चलते मैं ये भी कह दूं... कि ये ना समझा जाए कि मैं बिहारी हूं तभी राज ठाकरे के खिलाफ इतना बोल रहा हूं... मैं हिंदुस्तानी हूं... हिंदुस्तान हमारा घर है.. और मैं दावे के साथ कहता हूं कि अगर किसी ने हमारे घर को बांटने की कोशिश की तो... यहां रहने वाले उसे उसका जवाब देंगे.. तब वो ये नहीं देखेंगे कि वो मराठी हैं... गुजराती हैं... बिहारी हैं या फिर पंजाबी हैं...

वैसे कहना तो बहुत कुछ था.. लेकिन अपनी मर्यादाओं का ख्याल है मुझे... इसलिए एक बार फिर चुप हो जाता हूं... लेकिन याद रखिएगा.. जब भी बोलने का मौका आएगा चुप नहीं रहूंगा...


Tuesday, September 8, 2009

एक चैनल की मौत


काफी दिनों से मैं चुप था... कुछ नौकरी की व्यस्तता तो कुछ परिवार की.. लेकिन आज जब एक मौत देखी तो चुप ना रहा गया... मौत वॉयस ऑफ इंडिया न्यूज चैनल की... चैनल जब खुला था बेहद शोर था... आज जब मर भी रहा है तो उसी शोर के बीच... सवाल ये नहीं है कि दो लोगों की आपसी लड़ाई में वॉयस ऑफ इंडिया की मौत हो गयी.. सवाल ये है कि इस पूरे वाकये के बाद टीवी जर्नालिज्म की जो किरकिरी हुई है.. उसकी भरपाई कौन करेगा... पांच सौ लोग जो बेरोज़गार हुए हैं उनकी रोज़ी रोटी कैसे चलेगी... जो लोग अपना घर छोड़कर इस अपनी कही जाने वाली परायी दिल्ली में आए वो अब किधर जाएंगे... अमित सिन्हा और मधुर मित्तल के अकाउंट में तो पैसे हैं उन्हें अपनी ईएमआई भरने के लिए सैलेरी का इंतज़ार नहीं करना पड़ता... चैनल नहीं चला तो कोई और धंधा सही... लेकिन कोई ये तो बताए की उन लोगों का क्या होगा जो सिन्हा और मित्तल के मज़ाक का शिकार हुए.. जी हां हम तो इसे मज़ाक ही कहेंगे.. मज़ाक पांच सौ लोगों की ज़िंदगी और उनके सपनों के साथ खिलवाड़ करने का... बेचारे उन त्रिवेणी मीडिया इंस्टीट्यूट के बच्चों के सपनों का क्या होगा जो देखते ही बिखर गए... कहां जाएंगे वो... पत्रकारिता की नई खेप है ये जो लाखों रूपए लेकर तैयार की गयी... लेकिन अब उनके सामने अंधेरे के सिवा कुछ भी नहीं है... अमित सिन्हा कहते हैं कि उन्हें मधुर मित्तल ने धोखा दिया.. इधर मधुर मित्तल राग अलाप रहे हैं कि धोखा तो उन्हें अमित सिन्हा ने दिया है... लेकिन मैं कहता हूं इन दोनों ने ही मिलकर सबको धोखा दिया है... मुझे तो लगता है कि दोनों के बीच नूरा कुश्ती चल रही थी... जो आज खत्म हो गयी... चैनल भी बंद हो गया.. बिना किसी ज़ोरदार हंगामे के सबकुछ निपट भी गया... मधुर मित्तल के खिलाफ 300 केस चल ही रहे हैं 301 वां और सही... उनकी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला... और जिनकी सेहत पर असर पड़ने वाला है उनकी इतनी औकात नहीं वो कुछ कर भी सके... दूसरों के हक की आवाज़ उठाने वाला पत्रकार आज खुद की आवाज़ नहीं उठा सकता.. वो खामोश है... चुप है.. दर्द को अपने अंदर ही अंदर पी रहा है... जो वरिष्ठ हैं उनका करियर तो आखिरी ढलान पर है लेकिन ज़रा सोचिए उनका क्या जो पिछले 5-6 साल से इस फील्ड में हैं.. नए लोगों के पास तो उम्र भी है और फील्ड बदलने का मौका भी.. लेकिन इनका क्या करें.. ये तो कहीं जा भी नहीं सकते... मशरूम की तरह उगते चैनलों ने तालाब में एक नहीं दर्जनों सड़ी मछलियां पैदा कर दी हैं... कहावत तो यही है कि एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है... यहां तो ना जाने कितनी मछलियां तालाब में मौजूद हैं और कितनी गोते लगाने की तैयारी में... सूचना और प्रसारण मंत्रालय भी कम नहीं है... और हो भी क्यों ना उसे तो लाइसेंस बेचने हैं अपना धंधा करना है.. चैनल चले या ना चले इससे कोई मतलब नहीं है... क्या कोई ऐसा सिस्टम नहीं बन सकता जो चैनलों की इस तरह की मनमानी करने वालों पर लगाम लगा सके... मैं यहां पर बता सिर्फ इसकी नहीं कर रहा कि चैनल पर क्या दिखाया जान चाहिए और क्या नहीं... बल्कि चैनल को जिस तरह चलाया जा रहा है... जब मर्जी आए लोगों को भर्ती कर लिया और जब मर्जी आए लोगों को निकाल दिया... अरे भई जब औकात नहीं है लोगों को रखने की तो भर्ती क्यों करते हो.. बाद में हवाला दिया जाता है कि फलाने का आउटपुट ठीक नहीं आ रहा था इसे लिए उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया... मैं पूछता हूं जब उनकी भर्ती हो रही थी तब आपने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी.. गलती तो आपकी है कि इंटरव्यू लेकर आपने उसे नौकरी दी... खैर मेरे इतना कुछ कहने का मतलब ये है कि कुछ ना कुछ तो होना चाहिए ताकि मीडिया का गलत इस्तेमाल होने से बचे... अपने फायदे और पावर के लिए जो टूंटपूजिए लोग चैनल खोल लेते हैं उनपर बैन लगा देना चाहिए.. नहीं तो जिस तरह वॉयस ऑफ इंडिया की मौत हुई है... वैसी मौत आम हो जाएगी...

Tuesday, December 16, 2008

काश बॉक्सिंग गल्वस पहनकर क्रिकेट खेली जाती !


आज ऑफिस से घर आया तो मन बड़ा भारी था... सोचा शायद दिनभर काम किया है उसकी थकान है... रात को सोते वक्त मुझे ध्यान आया कि जितना काम मैं रोज़ करता हूं आज भी उससे ज्यादा काम तो नहीं किया... फिर सोच में डूब गया... तभी दिमाग की बत्ती जली (हालांकि मेन्टॉस नहीं खाया था) दिन में किसी से बहस हो गयी कि देश में लोग क्रिकेट ही क्यों देखते हैं... क्रिकेटर ही क्यों बनना चाहते हैं बच्चे... तभी ध्यान आया किसी न्यूज चैनल ने छोटी सी खबर चलायी... वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भारत को चार कांस्य पदक मिले हैं... मुक्केबाज़ों की वतन वापसी हो गयी है... एयरपोर्ट पर उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा... कोई भी अधिकारी उन्हें रिसीव करने के लिए मौजूद नहीं था... खिलाड़ी काफी देर तक इंतज़ार करते रहे... फिर जिसे जो मिला टैक्सी या फिर ऑटो किराए पर लेकर घर पहुंचा... कमाल है ये वही न्यूज़ चैनल्स हैं जिनके प्रोग्राम्स के नाम देख-देख कर ही मैं उत्साहित हो गया... चेन्नई में हुआ चमत्कार.. चेपॉक के चैंपियन्स... जीत लिया चेन्नई... चेपॉक में चटाई धूल... दिन भर क्या सुबह तक इसी लंब दंड गोल पिंड धर पकड़ प्रतियोगिता (घबराएं नहीं क्रिकेट का हिन्दी में नाम है) का खुमार सारे चैनल्स पर छाया रहा... और जिन लोगों ने भारत को चार-चार मेडल दिलाएं... एक देश नहीं कई देशों के बॉक्सर्स को हराया... उनपर एक छोटी सी खबर... नहीं तो डेढ़ मिनट का पैकेज बना कर चला दिया... किसी ने भी ज़हमत नहीं उठायी की खेल मंत्रालय और बॉक्सिंग फेडेरेशन ऑफ इंडिया से इसका जवाब मांगा जाए... बस फिर क्या था मैं उन क्रिकेट सपोर्टर साहब से भिड़ गया (पर ये न समझें कि मुझे क्रिकेट पसंद नहीं... मैं भी बहुत बड़ा फैन हूं) पर वो ना मानें... सही भी है माने भी तो कैसे... जब उपर बैठे लोगों की नसों में भी क्रिकेटिया खून ही बह रहा है तो भला जनता थोड़े ही ना किसी की सुनती है... हां एक बात तो बताना ही भूल गया... बात आज संसद में उठी... लेकिन सिर्फ दो मिनट के लिए.. लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने इसके लिए जिम्मेदार लोगों को सुनाया भी... लेकिन इससे उन बेचारे बॉक्सर्स का कुछ भला तो होने से रहा... एक खिलाड़ी तो मीडिया को वहां पर देखकर ही खुश था... उसने कहा " चलो कोई तो हमारा इंतज़ार कर रहा है... देखकर खुशी हुई... " अब बताइए भला इस तरह का रवैया रहा सरकार और अधिकारियों का तो कैसे मिलेंगे ओलंपिक में मेडल... लेकिन इन्हीं टीवी चैनल्स या अखबार में से कोई ये दिखाने या छापने से परहेज़ नहीं करेगा कि क्रिकेट के अलावा जिन दूसरे खेलों के खिलाड़ी हैं वो सिर्फ नाम के लिए चैंपियनशिप्स में भाग लेने के लिए जाते हैं.. और खाली हाथ वापस लौट जाते हैं...
अब मैं भी कितना बोलूं... हर बार सोचता हूं कम बोला करूं... लेकिन बोले बिना तो रहा ही नहीं जाता ना...

Sunday, December 14, 2008

कोई तो सुनो मेरी !


मोड़ पे देखा है वह बूढ़ा-सा इक पेड़ कभी?
मेरा वाकिफ है, बहुत सालों से मैं उसे जानता हूं
जब मैं छोटा था तो इक आम उड़ाने के लिए
परली दीवार से कंधे पर चढ़ा था उसके
जाने दुखती हुई किसा शाख से जा पांव लगा
धाड़ से फेंक दिया था मुझे नीचे उसने
मैंने खुन्नस में बहुत फेंके थे पत्थर उस पर
मेरी शादी पे मुझे याद है शाखें देकर
मेरी वेदी का हवन गर्म किया था उसने
और जब हामला थी 'बीबा' तो दोपहर में हर दिन
मेरी बीवी की तरफ कैरियां फेंकी थीं इसी ने
वक्त के साथ सभी फूल, सभी पत्ते गए
तब भी जल जाता था जब मुन्ने से कहती 'बीबा'
'हां उसी पेड़ से आया है तू , पेड़ का फल है'
अब भी जल जाता हूं, जब मोड़ गुजरते में कभी
खांसकर कहता है, 'क्यों सर के सभी बाल गए?'
सुबह से काट रहे हैं वह कमेटी वाले
मोड़ तक जाने की हिम्मत नहीं होती मुझको
" ये कविता मेरी लिखी हुई नहीं है... मेरे किसी मित्र ने मेल भेजा था... जिस आम के पेड़ की चर्चा यहां पर की गयी है वो सिर्फ एक प्रतिबिंब है हमारे समाज का... आम के इस पेड़ के जैसी हज़ारों ऐसी ज़िंदगियां हैं जो रोज़ घुटती हैं... कटती हैं ... खत्म हो जाती हैं... जीवन की एक बहुत बड़ी सच्चाई इन चंद लाइनों में छिपी हुई है"

Thursday, December 11, 2008

ये खबर एक्सक्लूसिव है !


बहुत दिनों तक चुप बैठ रहा... सोच रहा था कि ना बोलना ही ज्यादा अच्छा है... पर क्या करूं रहा ही नहीं जाता... बिहारी हूं ना... चुप रहा ही नहीं जाता... किसी खबिरया चैनल ने ब्रेकिंग न्यूज़ चलायी... मुंबई धमाकों में जिन हैंडग्रेनेड्स का इस्तेमाल हुआ था वो उसी कंपनी का था... जिसका इस्तेमाल 93 के मुंबई ब्लास्ट में किया गया था.. यानि की इन धमाकों में भी दाउद इब्राहिम का हाथ हैं... मैं यहां पर ना तो दाउद का पक्ष ले रहा हूं और ना ही जांच एजेंसियों को गुमराह करने की कोशिश कर रहा हूं... बात यहां पर न्यूज़ चैनल्स की खासकर हिंदी के चैनल्स की हो रही है... अपने आप को सबसे तेज़ और देश का सर्वश्रेष्ठ कहने वाला चैनल तो हर तीसरे दिन दाउद इब्राहिम से जुड़ी सनसनीखेज और एक्सक्लूसिव जानकारी देने की बात कह कर आधे घंटे का (कभी-कभी एक घंटे का भी) स्पेशल प्रोग्राम बना देता है... तस्वीरें ले देकर वहीं रहती हैं जो स्टॉक में पड़ीं हैं... उनकी एडिंटिंग भी कमोबेश एक सी ही रहती है... बस स्क्रिप्ट बदल जाती है... कहने का मेरा मतलब ये है कि आप दर्शकों को कुछ भी दिखा दो... ना तो वो पूछने जाता है... ना ही दाउद इब्राहिम या उसका कोई गुर्गा ये सफाई देने आता है कि जो कुछ भी दिखाया जा रहा है वो गलत है या सही है... और ना ही जांच एजेंसियां इसे गंभीरता से लेती हैं... अब इसे चैनल चलाने की कवायद कह लें या फिर आज की पत्रकारिता (शायद मैंने गलत शब्द का इस्तेमाल किया) मुंबई में आतंकी हमला हुआ... पत्रकारों की एक पूरी फौज ताज होटल, ओबेरॉय और नरीमन हाउस के बाहर कई दिनों तक डटे रहे... समाचार वाचक लगातार दर्शकों को बताते रहे कि हमारे रिपोर्टर जान पर खेलकर आपतक खबरें पहुंचा रहे हैं... ना किसी को खाने की फिक्र है और ना ही सोने की... चलिए बहुत अच्छी बात है... दर्शकों ने भी खूब सराहा.. वाह क्या जज्बा है... लेकिन हकीकत में जज्बा ये था कि कहीं वो टीआरपी की रेस में पिछड़ ना जाएं... किसी दूसरे चैनल से उनका चैनल पीछे ना रह जाए इसलिए हेड ऑफिस से हर मिनट फोन खड़काएं जा रहें थें... रिपोर्टर बेचारा अपनी जान बचाए... दूसरे रिपोर्टर क्या कर रहें हैं उस पर नज़र रखे... साथ ही एक्सक्लूसिव जानकारी भी पता करें... और उसके बाद एसी ऑफिस में बैठे बॉस की गालियां भी सुने... यानि कुल मिलाकर टीआरपी के लिए कुछ भी करने से परहेज़ नहीं है... खैर ज्यादा बोलूंगा तो पता नहीं कितनी बातें सामने आ जाएंगी... थोड़ा बहुत अगली बार के लिए छोड़ देता हूं...

Sunday, September 14, 2008

शिवराज जी ड्रेस की नहीं देश की चिंता करो !


देखिए जी हमने तो सोचा था कि कुछ ना बोलेंगे.. लेकिन अब करें भी तो क्या करें... देख कर चुप भी तो नहीं बैठा जाता... आखिर हम भी इसी देश के रहने वाले हैं जहां पर मुफ्त में सलाह हर गली मोहल्ले में मिल जाती है.. चलिए मेरे पहले ब्लॉग की शुरूआत इस दुखभरी खबर से ही करता हूं..


इसे हमारे देश का दुर्भाग्य कहें या कुछ और... हालात बेहद खराब हैं... देश की किसी को फिक्र नहीं है... राजधानी दिल्ली में बम ब्लास्ट होते हैं... और हमारे देश के गृहमंत्री एक घंटे के अंदर तीन बार ड्रेस बदलते हैं... मीडिया वाले खड़े थे इस बात के इंतज़ार में कि गृहमंत्री जी धमाकों के बारे में कोई नयी जानकारी देंगे... इसमे शामिल आतंकवादियों के बारे में कुछ बताएंगे.. .लेकिन हाय रे फूटी किस्मत... शिवराज जी के ड्रेस तो नए थे लेकिन बयान वही पुराना रटा रटाया... बस जगह.. नाम और आंकड़े बदल गए थे... अब बताइए भला हम चुप कैसै बैठें... जहां पर धमाकों ने पच्चीस की जान ले ली... वहां के गृहमंत्री को अपनी ड्रेस की पड़ी है... बाकी जाएं भाड़ में... शायद यही सोचा होगा शिवराज जी ने... उनकी सोच भी जायज़ (?) है... हर महीने तो कहीं ना कहीं ब्लास्ट हो जाता है... और सारा दोष गृह मंत्रालय पर थोप दिया जाता है... अरे भई वहां भी तो आदमी ही काम करते हैं... गलतियां तो हो ही जाती हैं.. क्या हुआ अगर खुफिया एजेंसियों को इस बात की ज़रा भी भनक नहीं मिलती कि कहां पर ब्लास्ट होने वाला है... क्या हुआ अगर सुरक्षा एजेंसियां इधर उधर खाक छानती फिरती है... सुरक्षा के पूरे दावे करती है... ये बात और है कि धमाके फिर भी हो ही जाते हैं... पुलिस की बात ना ही करें तो ज्यादा अच्छा है... उसे तो उगाही से पैसे बनाने से ही फुर्सत नहीं है... वो भला क्या खाक पता लगाएगी.. आतंकवादियों का... अरे भई जिस देश के गृहमंत्री को मरनेवालों के परिवार वालों और घायलों से ज्यादा अपने ड्रेस की फिक्र हो.. वहां की पुलिस क्यों फजूल में अपना दिमाग लगाए..


लगता है अब कुछ ज्यादा ही हो गया... फिलहाल मेरी भलाई इसी में है कि अब चुप हो जाउं... लोग खामखां बोलने पर मजबूर कर देते हैं... मैं तो अब भी यही कहता हू... मैं तो जी चुप ही रहता हूं....