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Thursday, July 13, 2017

अमीर- गरीब



बहुत व्यस्त रहीं दिन भर, बात करने तक की फुरसत नहीं थी तुम्हारे पास
हां थी तो, गरीबों के लिए मंदिर में भंडारा कराना कोई छोटा-मोटा काम है क्या - मिसेज शर्मा ने पति की तरफ आंखें तरेरते हुए कहा
अरे ताना नहीं दे रहा था, तुम भी खामखां ही, मैंने तो इसलिए कहा क्योंकि खन्ना कह रहा था कि पत्नी हो तो तुम्हारे जैसी हो, गरीबों की मदद के लिए हर महीने कुछ ना कुछ करती रहती हैं - मुस्कुराते हुए शर्मा जी ने पत्नी की तरफ देखकर कहा
क्या, खन्ना जी ने ऐसा कहा
हां भई, चाहो तो फोन करके पूछ लो उससे
मैं क्यों पूछूं, मुझे तुम पर पूरा भरोसा है, वैसे और क्या कहा खन्ना जी ने ?
वो कह रहा था कि अगर भाभी ऐसा ही करती रहीं तो आने वाले आरडब्लूए के चुनाव में खड़ी हो सकती हैं, गरीबों के लिए किया जा रहा उनका काम जिता देगा उन्हें
अरे, मेरे मन की बात उन्होंने कैसे जान ली, अच्छा चलो सो जाओ, वैसे भी बहुत थकी हुई हूं, गुडनाइट
गुडनाइट बोलकर शर्मा जी ने लाइट ऑफ कर दी
अरे घंटी बज रही है, दरवाजा क्यों नहीं खोलते, महारानी जी आयी होंगी - मिसेज शर्मा ने बाथरूम से चिल्लाते हुए कहा
नमस्ते, भैया, चंदा ने घर के भीतर आते हुए कहा
नमस्ते.... भाभी तुम्हारी भड़की हुई हैं, देर से क्यों आती हो
भैया, जो पैसे देंगे वो काम तो कराएंगे ही ना, यहां तो.... चंदा ने बात अधूरी छोड़ दी
ऐ चंदा, ऐसा नहीं चलेगा, तेरे नखरे बढ़ते जा रहे हैं, तेरा सोसायटी में घुसना बंद करवा दूंगी
भाभी, थोड़ी देर ही तो हुई है, और आप पैसे भी तो कम देती हैं, इतने ही काम के लिए बाकी जगहों पर 12 सौ रूपए लेती हूं, और आपने पिछले साल 100 रूपए बढ़ाकर 8 सौ रूपए महीना किया है
तुम लोग लुटेरे हो गए हो, काम करने के बहाने लूटते हो, दूसरे कितना देते हैं मुझे मतलब नहीं है, खैरातखाना नहीं खोल रखा है मैंने यहां
शर्मा जी बेचारे दुविधा में फंसे थे, बीवी का भंडारे वाला रूप सही है या फिर कामवाली पर दो सौ रूपए महीने के लिए चिल्लाने वाला

Saturday, April 01, 2017

इंसान


सब कुछ समझते हुए भी नासमझ रह कर
शातिर और स्वार्थी दुनिया के बीच इंसान बनना अच्छा है

झूठ, लालच और फरेब से बचकर 
ज़ालिम दुनिया में बेवकूफ बनकर रहना अच्छा है

किस्मत की लकीरों पर मत कर भरोसा
मेहनतकश हथेलियों पर नयी लकीरें बनाना अच्छा है

गैरत मार कर क्यों मिलाएं किसी की हां में हां
अपनी काबिलियत से कच्ची सीढ़ियां बनाना अच्छा है

© Alok Ranjan

Thursday, February 23, 2017

नौकरी


मेट्रो के दरवाज़े से सरकते हुए उसकी आंखे इंसानों को नहीं सीटों को ढूंढती हैं 
लू के थपेड़ों में, गर्मी के प्रहारो और सूखे हुए हलक से वो बुदबुदाता है 
हटटट साला आज भी पैरों को आराम नहीं मिलेगा 
कमर साली वैसी ही अकड़ती रहेगी 
रात की नींद अधूरी है जो काटी बगैर बिजली है 
रही सही कसर मेट्रो के एयर कंडीशन ने पूरी कर दी है 
कमबख्त आंखें बंद हो रही हैं 
नींद का नशा फिर चढ़ने लगा है 
अबे बंद मत हो बे 
खुली रह 
बस घर पहुंचने ही वाले हैं 
फिर चाहे जबतक चाहे बंद हो जाना 
तभी धम्म की आवाज़ आती है 
आंखे बंद हैं 
पर दिमाग बताता है वो फर्श पर गिरा पड़ा है 
भीड़ फुसफुसाने लगती है 
कहीं से कानों में गर्म शीशे सी पिघलती आवाज़ आती है 
साला पक्का पी के आया है तभी नशे में है 
देखो आंखें भी तो नहीं खुल रहीं 
फर्श पर गिरे-गिरे वो चाहता है जवाब दे 
वो चाहता है बताना कि नशा दारू का नहीं नींद का है 
पर भीड़ को अपनी आंखों देखी पर ज्यादा यकीन है 
वो धीरे से मुस्कुराता है 
हिम्मत करके खड़ा होता है 
ज़ोर से बोलता है 
हाँं हाँं मैं नशे में हूं 
देश के वो तमाम नौजवान नशे में हैं 
जो इंसान नहीं मशीनों की तरह पिसते हैं 
कभी बॉस के  
तो कभी कंपनी के 
कभी मालिक के  
तो कभी अपनी किस्मत के लिए 

© Alok Ranjan

भारत में चुनाव का होना



चुनाव का ज़ोर है
नेताओं में होड़ है
ज़बान पर ना कंट्रोल है
ना भौंकने पर कोई रोक है
तू हिंदू है, तू मुसलमान है
दलित है, सवर्ण है
नेता साले चालू हैं
जनता साली भालू है
नेता डमरू बजाते हैं
मदारी का खेल जारी है
फिर अगले चुनाव की बारी है
© Alok Ranjan