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Tuesday, January 12, 2016

नॉन रेज़ीडेंट बिहारी [NRB]


[हमारे पुराने मित्र और बिहारी भाई शशिकांत मिश्रा ने एक किताब लिख डाली है. पेशे से पत्रकार हैं लेकिन किताब किसी मंझे हुए कहानीकार/उपन्यासकार की भांति लिखा है. कमी की कोई गुंजाइश कहीं नज़र नहीं आती]

शशिकांत मिश्रा भाई माफ कीजिएगा की किताब एक बैठकी में नहीं दो बैठकी में पढ़ पाया.. लेकिन यकीन मानिए लगा नहीं की एक बार में नहीं पढ़ा है. खैर सीधे मुद्दे पर आते हैं. कोई माई का लाल नहीं कह सकता कि ये आपका पहला उपन्यास है. जैसे-जैसे पन्ने आगे बढ़ते गए.. कहानी के किरदार हवा में तैरने लगे... किताब के बाहर निकल कर संजय, राहुल, शालू, श्याम भैया सब एक चेहरा अख्तियार करने लगे. ऐसा लगा कि यार ये तो अपने कई दोस्तों की अपनी कहानी है जिन्हें मैं बेहद करीब से जानता हूं. हो सकता है ऐसा बिहारी होने की वजह से लग रहा हो. क्योंकि हर दूसरा बिहार आईएएस या आईपीएस बनने का ही सपना ढोता रहता है जबतक उसका चांस खत्म ना हो जाए. कहानी का क्लाइमैक्स बिल्कुल किसी बॉलीवुड की कहानी की तरह बेहद तेज़ गति से भागता हुआ पूरा हुआ. पूरी कहानी ने कहीं भी सांस लेने का मौका दिया. कहीं से भी नहीं लगा कि यार ये चार लाइनें फालतू की लिखी हैं या फिर ये वाला वाक्या ज़बरदस्ती शशि भाई ने घुसा दिया है. मेरा तो मानना है कि भइया इतने पर आपकी लेखनी रुकने नहीं वाली है. तो भाइयों जल्दी से खरीदीए नॉन रेज़ीडेंट बिहारी और मज़ा लीजिए एक शानदार कहानी का. अगर आप बिहारी नहीं भी हैं तो भी कोई बात नहीं कहानी का मज़ा आपको उतना ही मिलेगा जितना की किसी बिहारी को

Tuesday, January 05, 2016

पठानकोट एयरबेस के भीतर आतंकियों का 'अपना' कौन था ?

एयरबेस में किसने की आतंकियों की मदद ?

सवाल सुनकर आप चौक सकते हैं. चौकना वाज़िब भी है लेकिन ये सवाल है बेहद गहरा क्योंकि जिन आर्मी कैंप्स/एयरबेसेज़/नेवल बेसेज़ में घुसना तो छोड़िए पास फटकना तक आम आदमी के लिए मुश्किल होता है, वहां आतंकी ना सिर्फ पहुंचे हैं, ना सिर्फ घुसपैठ की है बल्कि हमारे जवानों को मार भी दिया. ऐसे में ये सवाल उठना लाज़मी है कि कहीं ऐसा तो नहीं की एयरबेस के भीतर आतंकियों की मदद के लिए कोई मौजूद था. रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने आज कहा कि आतंकियों ने जिन सामानों का इस्तेमाल किया उनमें से कई पाकिस्तान मेड थे. तो क्या बाकी का सामान मेड इन इंडिया था. अगर ऐसा था तो ज़ाहिर है कोई ना कोई था जिसने आतंकियों के लिए ना सिर्फ उनकी ज़रूरत का सामान मुहैया कराया बल्कि उन्हें एयरबेस के भीतर घुसने में भी मदद की

50 किलो गोली, भारी मात्रा में हैंडग्रेनेड और बाकी सामान लेकर आतंकी कैसे घुसे ?

अब ज़रा आप सोचिए कि भले ही किसी को कितनी भी ट्रेनिंग दी गयी हो. भले ही वो कितना भी भारी वज़न उठा सकता हो लेकिन वो इतनी आसानी से एयरबेस तो छोड़िए किसी रिहायशी इलाके में भी नहीं घुस सकता जहां पर सुरक्षा के इंतज़ाम बिल्कुल नहीं हों. ऐसे में इतना गोला बारूद, एके 47 राइफल, ग्रेनेड लॉन्चर, पचास किलो गोली, 100 से ज्यादा हैंडग्रेनेड और साथ में खाने पीने का सामान लेकर वो एयरबेस जैसी बेहद सुरक्षित जगह पर घुस कैसे गए. ऐसा तभी हो सकता है जब आतंकियों का कोई अपना एयरबेस के भीतर मौजूद हो. बिना विभीषण के तो राम भी लंका में नहीं घुस पाए थे तो ज़ाहिर है आतंकियों का कोई ना कोई मददगार एयरबेस के भीतर था जिसने इतनी बड़ी आतंकी कार्रवाई में मदद की

रक्षा मंत्री ने भी मानी सुरक्षा में है भारी कमी

पठानकोट एयरबेस का दौरा करके रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर जब मीडिया से मुखातिब हुए तो उन्होंने माना की सुरक्षा में गैप्स हैं यानि सुरक्षा कमियां हैं. यहां पर सवाल ये भी है कि अगर रक्षा मंत्री जो की एक सिविलियन हैं उन्हें सिर्फ दौरा करके लग गया कि एयरबेस की सुरक्षा में कमियां हैं तो वहां पर मौजूद सेना के अधिकारियों को ये बात क्यों नहीं समझ में आयी. जिन लोगों के सिर पर एयरबेस की सुरक्षा की ज़िम्मेदारियां हैं क्या उन्हें लूप होल्स नज़र नहीं आए. अगर ऐसा है तो फिर ऐसे नकारा अफसरों को इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी कैसे दी गयी. इसकी जांच की जानी चाहिए और अगर ऐसी लापरवाही या चूक पायी जाती है तो उन्हें कोर्ट मार्शल कर देना चाहिए. क्योंकि इनकी वजह से ही हमारे 7 जवान शहीद हो गए. नकारा अधिकारियों की कमी का खामियाज़ा हमारे उन बहादुर सैनिकों को भुगतना पड़ा जो आतंकियों के मंसूबों को नाकाम करने में सबसे आगे थे

क्या गुरदासपुर एसपी उस वक्त पार्टी मनाने गए थे ?

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने पंजाब पुलिस की भूमिका पर बोलने से मना कर दिया लेकिन इससे पंजाब पुलिस की नाकबलियत छुप नहीं सकती. पहला बड़ा सवाल उठता है गुरदासपुर के एसपी सलविंदर सिंह पर. क्या एसपी जैसे स्तर के अधिकारी इतने सक्षम नहीं हैं कि जब वो गश्त पर हों या फिर कहीं जा रहे हों तो उन्हें कोई भी हथियारबंद शख्स रोक ले.. पिटाई करे... मोबाइल छीन ले... ड्राइवर की हत्या कर दे और वो बच जाएं. बात हज़म नहीं होती.. बकौल एसपी आतंकी आर्मी के यूनिफॉर्म में थे. इसीलिए उन्होंने अपनी गाड़ी रोक दी. यहां पर कई सवाल उठते हैं..

सवाल नंबर 1 - अगर एसपी पठानकोट के गांव कठुआ पहुंचे थे, वो भी अपनी निजी गाड़ी पर तो उन्होंने अपने साथ जवानों को साथ लेकर जाना मुनासिब क्यों नहीं समझा वो भी तब जब इंटेलीजेंस इनपुट पहले ही मिल चुका था कि आतंकी पठानकोट में घुस चुके हैं

सवाल नंबर 2 - एसपी जैसा अधिकारी बिना किसी हथियार के उस जगह पर क्यों जाता है जो पाकिस्तान बॉर्डर के बेहद करीब है.

सवाल नंबर 3 - 31 दिसंबर की शाम थी, एसपी साहेब के साथ कुक था और उनका एक दोस्त था. मतलब साफ झलकता है कि वो पार्टी करने गए थे. कहीं ऐसा तो नहीं था कि एसपी साहब नशे में थे

पंजाब पुलिस ने एसपी की चेतावनी को गंभीरता से क्यों नहीं लिया ?

नकारापन की हद तो तब नज़र आती है जब एसपी अपने से बड़े अधिकारियों को आपबीती सुनाता है. पूरी घटना बताता है लेकिन पंजाब पुलिस के वो बड़े अधिकारी उसकी बातों को गंभीरता से लेते ही नहीं हैं. अगर पंजाब पुलिस ने अपने एसपी की बात को मानकर फौरन एक्शन लिया होता तो शायद इतनी बड़ी आतंकी घटना नहीं हो पाती. शायद जिन सात बहादुर जवानों को हमने खो दिया वो आज अपने परिवार के साथ होते ना कि उनकी माला लटकी हुई फोटो.

Saturday, January 02, 2016

पठानकोट आतंकी हमले में कैसे हुई कार्रवाई और कहां हुई चूक ?



आतंकी ने मां को बोला कुर्बानी देने जा रहा हूं

सुरक्षा एजेंसियों ने शुक्रवार की रात कुछ फोन कॉल्स इंटरसेप्ट किए जिनसे पाकिस्तान बात की गयी. इन फोन कॉल्स से पता चला कि आतंकवादियों का एक ग्रुप पंजाब के पठानकोट में हमले की तैयारी कर रहा है. कुल चार फोन कॉल किए गए जिनमें से तीन पाकिस्तान में बैठे उन हैंडलर्स को किए गए जो इस आतंकी हमले की कमान संभाले बैठे थे. आतंकियों ने अपने आकाओं को बताया कि उन्होंने पंजाब के सीनियर पुलिस ऑफिसर पर हमला किया है. चौथी कॉल एक आतंकी ने अपनी मां को किया जिसमें उसने कहां कि वो कुर्बानी देने जा रहा है, इस पर उसकी मां ने कहा कि पहले वो खाना खा ले फिर जो काम उसे करने के लिए भेजा गया है वो करे.

आतंकियों ने पठानकोट के एसपी पर हमला किया, गाड़ी-मोबाइल छीना

गुरुवार को आतंकियों ने एसपी पर हमला किया था. आतंकी आर्मी की यूनिफॉर्म में थे. उन्होंने एसपी पर हमला किया, आधिकारिक गाड़ी से धक्का देकर गिरा दिया, मोबाइल छीन लिया. इसी मोबाइल से बाद में उन्होंने पाकिस्तान फोन किया था. आतंकियों के आका ने उन्हें एसपी को छोड़ देने पर डांटा भी कि उन्होंने एसीपी को क्यों जाने दिया.

आतंकियों की मोबाइल बातचीत को भारतीय एजेंसियों ने इंटरसेप्ट किया

मोबाइल इंटरसेप्ट्स ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी. फौरन अलर्ट जारी किया गया. नेशनल सिक्योरिटी एडवाइज़र अजित डोभाल को बताया गया. एनएसए ने फौरन सुरक्षा अधिकारियों के साथ मीटिंग की. पीएमओ को भी इस बारे में बताया गया और फिर वहां से आदेश लिए गए. एनएसजी और आर्मी की स्पेशल फोर्सेज़ को फौरन पठानकोट के अलग-अलग इलाकों में भेजा गया.

एयरफोर्स के गरुड़ कमांडो, एनएसजी और आर्मी की स्पेशल फोर्स तैनात की गयी

सुबह के करीब 3.30 बजे आतंकियों ने एयरबेस पर हमला किया. एयरफोर्स के दो जवान और एक गरुण कमांडो उनके हमले में शहीद हो गए. चूंकि आतंकियों की मूवमेंट की जानकारी पहले ही मिल चुकी थी इसलिए उन्हें एयरबेस के एक इलाके में घेर लिया गया. लेकिन घुप्प अंधेरा होने की वजह से दिक्कत आ रही थी.

थर्मल इमेजिंग की मदद से घुप्प अंधेरे में खोजे गए आतंकी

फौरन एयरफोर्स ने MI 35 हेलीकॉप्टर्स और इज़रायल से मिले UAV हेरोन को उड़ाया. दोनों में ही बेहद ताकतवर थर्मल इमेजिंग सेंसर्स लगे हुए हैं. इन दोनों की मदद से घुप्प अंधेरे में भी चार आतंकियों को खोज निकाला गया और फिर सुरक्षाबलों ने उन्हें मार गिराया. पांचवां आतंकी किसी तरह भागने में कामयाब हो गया लेकिन बाद में उसे भी ढूंढ कर मार गिराया गया. जिसेक बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने ये ट्वीट करके कि सभी पांच आतंकियों को मार गिराया गया, ऑपरेशन के खत्म होने की घोषणा की

24 घंटे पहले आतंकियों की जानकारी थी तो हमला रोका क्यों नहीं गया ?

लेकिन यहां पर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं कि अगर सुरक्षाबलों को पहले से जानकारी मिल चुकी थी आतंकी पठानकोट में घुस चुके हैं और हमला करने वाले हैं तो फिर हमले को रोका क्यों नहीं गया. अगर सुरक्षा एजेंसियों को इस बात की जानकारी मिल चुकी थी कि आतंकियों ने एसपी के मोबाइल के ज़रिए अपने आकाओं से क्या बात की. तो फिर उनकी लोकेशन क्यों नहीं ट्रैक की गयी. क्यों नहीं हमले के पहले ही उन्हें मार गिराया गया. क्या जानकारी के बावजूद सुरक्षाबल उनके हमले के इंतज़ार में बैठे रहे. और सबसे बड़ा सवाल कि अगर तैयारी पूरी थी आतंकियों से निपटने की तो फिर हमारे तीन जवानों की जान क्यों गयी.

[ये सारी बातें जो इनपुट्स मिली हैं उनके हिसाब से लिखी गयी हैं, हो सकता इसमें कुछ तथ्यात्मक सुधार बाद में किए जाएं]