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Monday, November 07, 2016

25 सालों में कैसे बदला घर का सपना हकीकत में ?


हम सबकी तीन बुनियादी ज़रूरतें होती हैं.. रोटी.. कपड़ा और मकान... कहते हैं कि सिर के ऊपर अपनी छत हो गयी तो आप एक कामयाब इंसान माने जाते हैं.. पिछले 25 सालों में मकान.. या कहें घर की परिभाषा बदल गयी है... 25 साल पहले आम आदमी के लिए घर बनाना एक सपना भर होता था... जिसे पूरा करने में पूरी उमर निकल जाती थी.. लेकिन अब 25 साल बाद घर सपना नहीं रह गया है...

पिछले 25 सालों में घर... सपने से हकीकत में बदल गया... 25 साल पहले घर के बारे में रिटायरमेंट के वक्त सोचा जाता था.. या पैसे जोड़ते-जोड़ते वक्त इतना बीत जाता कि घर का सपना देखना ही 50 की उम्र में शुरु होता.. ऐसा इसलिए होता था.. क्योंकि पैसे आसानी से उपलब्ध नहीं थे... और घर बनाना ज़िंदगी का सबसे मुश्किल काम होता था... सोने के कारोबारी कुमार जैन पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं 

जो सरकारी नौकरी में थे उन्हें बहुत आसानी से लोन मिल जाता था.. लेकिन हमारे जैसा कोई बिजनेसमैन गया तो कम से कम उससे 25-50 पेपर मांगे जाते थे.. उन पेपरों को इंडीविजुअली अप्रूव किया जाता था.. उसके लिए 10-15 फोन कॉल्स आते थे.. उनकी रेफरेंस पूछी जाती थी.. उसके बाद कहीं जाकर अप्रूवल मिलता था


1991 और 2016 के बीच घर को लेकर आम आदमी से लेकर बैंकों तक ने बड़े बदलाव देखे हैं... फिर वो चाहे बात लोन अमाउंट की हो.. उस पर लगने वाले ब्याज़ की.. या फिर उससे होने वाले टैक्स के फायदे की हो...

1991 में बैंकों से होम लोन मिलने की औसत राशि 99 हज़ार रुपए थी... लेकिन 25 साल बाद यानि 2016 में ये बढ़कर 25 लाख हो गयी है... बैंकों से लोन लेने की औसत उम्र करीब 43 साल थी.. जो कि अब 38 साल हो गयी है... उस वक्त औसत ब्याज़ दर 12 फीसदी थी.. जबकि अब होम लोन करीब साढ़े नौ फीसदी में ही मिल जा रहा है... 25 साल पहले होम लोन के प्रिंसपल और इंटरेस्ट को मिलाकर टैक्स में करीब 19 हज़ार की छूट मिलती थी.. जबकि अब ये छूट करीब चार लाख रुपए की हो गयी है...

घर को सपने से निकालकर आम आदमी के हाथों तक पहुंचाने के पीछे दो बड़ी वजहें रहीं... पहली आर्थिक उदारीकरण.. और दूसरी तकनीक... आर्थिक उदारीकरण ने लोगों की आमदनी बढ़ायी और तकनीक ने होम लोन की लेन-देन प्रक्रिया को आसान बनाया...पहले जहां होम लोन मिलने में दर्जनों अड़चने होती थीं... वहीं अब होम लोन देने के लिए बैंकों की लाइन लगी रहती है, एचडीएफसी बैंक की एमडी रेणु सूद बताती हैं 

उन दिनों में जब हम लोग लोन दिया करते थे.. तो समय ज्यादा लगता था.. लोन देने में अगर हम कहते थे.. कि एक महीने में लोन मिल जाएगा तो वो कहते थे अच्छा एक महीने में.. .इतनी जल्दी.. अभी आप मेरे पास आए और मेरे से पूछे होम लोन कितने दिन में आप सैंक्शन दे देंगे.. और मैं बोलूं की चार दिन में.. तो आप बोलेंगे चार दिन में.. मुझे तो वो कंपनी दो दिन में ही दे रही है

कारोबारी भी मानते हैं कि बैंकिंग नियमों में सुधार ने काफी कुछ आसान कर दिया है, व्यापारी वृशांक जैन कहते हैं

जब से मैं आया हूं.. तबसे देखा है कि बहुत इज़ी हो गया है बैंकिंग सिस्टम.. बहुत अपग्रेड हो गए हैं.. जिधर चाहिए उधर लोन बहुत आसानी से मिल जाता है.. और जब से इनकम भी थोड़ी सी बढ़ गयी है.. तो उससे ईएमआई भी काफी आसानी से हो जाता है

लेकिन पहले ये इतना आसान नहीं था... ना ही बैंकों के लिए और ना ही उनके लिए जो घर खरीदना चाहते थे


1991 में बैंक घर की कुल कीमत का औसतन 85 फीसदी ही लोन देते थे... और इस पर ब्याज़ दर फिक्स होती थी... यानि एक बार जो ब्याज़ दर तय हो गयी उसमें फिर बदलाव नहीं होते थे... लेकिन 25 साल बाद यानि 2016 में बैंक घर की कुल कीमत का औसतन 65 फीसदी ही लोन देते हैं... और इस पर दिए जाने वाले ब्याज़ की दर 85 फीसदी तक फ्लोटिंग यानि बदलने वाली हो गयी है

यानि वक्त बदला.. हालात बेहतर हुए... तो घर भी बदल गया...  बैंकों ने तकनीक का सहारा लिया.. साथ ही पिछले पचीस सालों में लोगों की आमदनी भी बढ़ी.. तकनीक और बढ़ी आमदनी के इस मेल ने घर तक लोगों की पहुंच आसान कर दी, एचडीएफसी बैंक की एमडी रेणु सूद कहती हैं 

तकनीक से बड़ा रोल  प्ले किया है.. तकनीक ने दोनों के लिए हमारे लिए भी.. कस्टमर के लिए भी.. कस्टमर के लिए ये सहूलियत है कि ज्यादा जल्दी जल्दी लोन मिल सकते हैं.. हमारे लिए तकनीक का फायदा ये है कि हम चेक बहुत तेज़ कर पाते हैं

लोगों को भी तकनीक का भारी फायदा हुआ है, घर खरीदना या घर बनवाना पहले बहुत बड़ी बात मानी जाती थी क्योंकि ज़ाहिर तौर पर इसमें मुश्किलें बहुत थी, सबसे बड़ी समस्या पैसे की थी, पर अब तकनीक और बैंकों के बदले नियमों ने ये सब बेहद आसान बना दिया है, घर खरीदना अब कोई नामुमकिन काम नहीं रहा, सोने के कारोबारी वृशांक जैन कहते हैं

अगर देखा जाए तो सबसे.. आज की तारीख में कोई भी इतनी कोई बड़ी समस्या है नहीं.. आज घर किधर भी बहुत आसानी से मिल जाता है.. अगर किसी को कीमत की समस्या है तो थोड़ा दूर जाएंगे बांबे से.. पर उसके बजट में आ जाएगा.. अगर जिसको जैसा भी घर चाहिए.. आज मिलना बहुत आसान है

यानि जिसका जैसा बजट.. उसके लिए वैसा ही घर... 25 साल पहले जिस घर को बनाने में पूरी उम्र निकल जाती थी.. अब वो घर जवानी में ही मिल रहे हैं... खासकर युवाओँ में नौकरी के बाद अपना घर लेने की चाहत का बढ़ना भी एक बड़ी वजह हो सकती है, एचडीएफसी बैंक की एमडी रेणु सूद बताती हैं कि घर खरीदने की औसत उम्र घट गयी है

ज्यादातर चालीस.. बयालिस के करीब होती थी उम्र घर लेने की.. आजकल वो उम्र हो गयी है 37-38 साल.. अच्छा उसका कारण है कि सैलरी बढ़ गयी है.. दूसरा तकनीक.. का इस्तेमाल बढ़ा है इमारतों को तेज़ गति से बनाने में

पिछले 25 सालों में दुनिया बदली तो इसमें रहने के ढंग भी बदले... हमारे घरों पर भी इसका असर हुआ... किराए के एक कमरे से निकल कर अब हमारी चाहत कम से कम...टू बीएच के.. यानि दो बेडरूम... एक हॉल और एक किचन तक आ गयी है... मध्यमवर्गीय परिवार कम से कम अब घरों को सपनों तक ही नहीं रहने दे रहे.. बल्कि बदलावों का फायदा उठाकर.. उसे हकीकत में तब्दील कर रहे हैं...

Friday, October 14, 2016

आज़ादी की लड़ाई में मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान की अहमियत


मुंबई का अगस्त क्रांति मैदान आज़ादी की लड़ाई का सबसे बड़ा गवाह रहा है, इस मैदान का भारत की आज़ादी की लड़ाई में एक अहम योगदान है.. 74 साल पहले 9 अगस्त 1942 को इसी मैदान से अंग्रेज़ों भारत छोड़ो का शंखनाद हुआ.. इसी शंखनाद का असर हुआ कि देशभर के एक बड़े जनसमूह को अंग्रेज़ों के खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ने की प्रेरणा मिली.. दरअसल दूसरे विश्वयुद्ध के लिए भारतीयों का समर्थन प्राप्त करने के इरादे ने ब्रिटेन ने स्टेफोर्ड क्रिप्स को मार्च 1942 में भारत भेजा.. लेकिन भारतीय प्रतिनिधियों ने क्रिप्स मिशन को खारिज कर दिया.. 8 अगस्त 1942 को भारतीय नेशनल कांग्रेस की बैठक मुंबई में हुई.. और इसमें फैसला लिया गया कि अंग्रेज़ों को हर हाल में भारत छोड़ना ही होगा.. तय किया गया कि अगस्त क्रांति मैदान में इसकी शुरुआत झंडा फहरा कर होगी.. उस आंदोलन में जी जी पारिख भी शामिल थे.. उस वक्त उनकी उम्र 17-18 साल थी.. अब वो 92 साल के हो चुके हैं.. लेकिन आज भी उन्हें अगस्त क्रांति मैदान का वो नज़ारा अच्छी तरह याद है, परीख जी कहते हैं 


"पूरा मैदान भरा हुआ था सुबह.. यानि झंडावंदन के लिए.. 7-8 तारीख की तो मीटिंग थी.. तो थे ही लोग.. और बड़े पैमाने पर पूरे बंबई शहर में.. बंबई शहर छोटा था उस वक्त.. पूरे बंबई शहर से लोग आए थे.. काफी लोग थे.. और महिलाएं भी थीं.. लेकिन युवा लोग ज्यादा थे"


पहले इस का नाम गोवालिया टैंक मैदान था.. गो मतलब गाय और वालिया का मतलब गाय का मालिक... तब ये मैदान गाय-भैंसों को नहलाने के काम आता था.. लेकिन 9 अगस्त 1942 को यहां भारत छोड़ो आंदोलन की नींव पड़ी.. और इसका नया नामकरण हुआ.. अगस्त क्रांति मैदान.. हज़ारों की भीड़ यहां मौजूद थी.. लेकिन गांधी जी.. जवाहर लाल नेहरू.. अबुल कलाम आज़ाद.. वल्लभ भाई पटेल सहित सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, जी जी परीख आगे बताते हैं 


"वो आ नहीं पाए.. क्योंकि सबको पकड़ लिया गया था सुबह पांच बजे.. लेकिन अरुणा आसफ अली जी आयीं.. और झंडा वंदन करके चली गयीं.. हमारे हज़ारों लोग थे उस वक्त मैदान में.. उस वक्त बारिश हो रही थी थोड़ी थोड़ी.. तो उस वक्त उनको रोकने के लिए पहली दफा हिंदुस्तान के अंदर आंसू गैस छोड़ा गया"

इसके ठीक एक दिन पहले जो बैठक हुई थी.. उसमें बापू ने एक नारा दिया था.. और इस नारे ने अंग्रेज़ों के खिलाफ आंदोलन को मज़बूती देने बड़ी अहम भूमिका निभायी, बापू के परपोते तुषार गांधी इस नारे के बारे में बताते हैं


"आखिर में गांधी जी ने माना कि अब आखिरी धक्का देने का वक्त आ गया है.. अंग्रेज़ों को हमने बहुत मनाने की कोशिश की.. कि वो मान के चले जाएं.. अब धक्का देना पड़ेगा.. अब तबतक हम नहीं रुकेंगे जब तक आज़ादी हमे मिल ना जाए"

जी जी परीख को महात्मा गांधी की उस बैठक की याद अभी भी ताज़ा है, वो कहते हैं 


"उन्होंने पहले जो परिस्थिति थी उसका वर्णन किया.. ये आखिरी लड़ाई है ऐसा उन्होंने कहा.. और कहा.. या तो आप मरिए.. आज़ादी के लिए... आप लड़ते रहिए.. करो या मरो.. इस किसम का एक नारा उन्होंने दिया.. उस वक्त काफी लोगों ने उनके नारे को दोहराया.. ये दो दफे हुआ"

करो या मरो के इस नारे यानि बापू के इऩ शब्दों ने भारत की जनता पर जादू जैसा असर डाला.. वो नए जोश.. नए साहस और नए संकल्प के साथ आज़ादी की लडाई में कूद पड़े.. देश के कोने-कोने से करो या मरो की आवाज़ गूंजने लगी, बापू के परपोते तुषार गांधी बताते हैं कि 

"अगस्त क्रांति मैदान में जो किया गया और ऐलान जो किया गया.. करेंगे या मरेंगे उसके दस दिन के अंदर अंग्रेज़ों ने कांग्रेस की जो सारी टॉप लीडरशिप थी.. उसको गिरफ्तार करके जेलों में डाल दिया"


9 अगस्त 1942 को ऑपरेशन ज़ीरो ऑवर के तहत कांग्रेस के सभी महत्वपूर्ण नेता गिरफ्तार कर लिए गए.. गांधी जी को पूना के आगा खां महल और कांग्रेस कार्यकारिणी के बाकी सदस्यों को अहमदनगर के किले में रखा गया... ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस को गैर-कानूनी संस्था घोषित कर दिया और जुलूस निकालने पर प्रतिबंध लगा दिया.. लेकिन आंदोलन की आग तो भड़क चुकी थी.. जिसे नेताओं की गिरफ्तारी ने और हवा दे दी.. सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए जब लाठी और बंदूक का सहारा लिया तो आंदोलन का रुख बदलकर हिंसात्मक हो गया.. कई जगहों पर रेल पटरियां उखाड़ी गयीं.. स्टेशनों में आग लगा दी गयी, जी जी परीख को अब भी याद है कि सरकार की इन कार्रवाईयों से निपटने के लिए किस तरह पहले ही तैयारी कर ली गयी थी

"उसके पहले ही एक मीटिंग हो चुकी थी.. जिसके अंदर ये तय किया गया था कि सोशलिस्ट और कुछ कांग्रेस मैन अंडरग्राउंड जाएंगे और अंडरग्राउंड जाकर जिस तरीके से आंदोलन को ज़िंदा रख सकते हैं.. उस तरह से करने की कोशिश करेंगे.. तो ये निर्णय पहले हो चुका था.. और उसका असर 9 तारीख के बाद पूरे हिंदुस्तान में दिखाई दिया"

अगस्त क्रांति मैदान से शुरु हुआ भारत छोड़ो आंदोलन अब जन आंदोलन के रुप में तब्दील हो चुका था.. भारत का हर जाति वर्ग के लोग इसमें शामिल थे खासकर युवा.. उन्होंने अपने कॉलेज छोड़ दिए.. और जेल का रास्ता अपनाने लगे...


"कुर्बानियां दीं.. और उसका जो टोटल इफेक्ट हुआ.. वो ये हुआ कि अंग्रेज़ समझ गए कि जिस मुल्क का एक भी आदमी नहीं चाहता कि हम रहें.. हां थोड़े बहुत उनके पिट्ठू थे.. लेकिन ज्यादातर लोग उनको नहीं चाहते थे - तुषार गांधी, गांधी जी के परपोते"


भारत छोड़ो आंदोलन भले ही भारत को आज़ाद ना करा पाया.. लेकिन उसके इतने बड़े रूप को देखकर अंग्रेज़ों को ये मानना पड़ा कि उन्होंने भारत पर शासन का अधिकार खो दिया है... आखिरकार लंबे संघर्ष के बाद अंग्रेज़ों ने हार मान ली.. और 15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद हो गया. आज़ादी का जो दिया अगस्त क्रांति मैदान में जलाया गया था.. उसे बुझने नहीं दिया गया.. अंग्रेज़ों के ज़ुल्म के बीच भी ये दिया मैदान में जलता रहा..

"अगस्त क्रांति ग्रुप इन्होंने साइलेंट पोसेशन निकालना शुरु किया.. चौपाटी से निकलते थे और आज़ाद मैदान तक जाते थे.. वहां जाकर कर शहीदों को श्रद्धांजलि देते थे.. तो हम लोगों ने 9 अगस्त को.. याद करने के लिए साइलेंट पोसेशन निकालने की प्रथा शुरु की - जी जी परीख, स्वतंत्रता सेनानी "

लेकिन आजादी के इतने सालों बाद मुंबई का ये ऐतिहासिक मैदान अपनी बदहाली का कहानी खुद बयां कर रहा है... कोई न कोई कार्यक्रम यहां हमेशा होता रहता है.. बड़े मौकों पर नेताओं को इस ऐतिहासिक जगह की याद तो आती है लेकिन इस मैदान की बदहाली को बेहतर करने के बारे में कोई नहीं सोचता, आज़ादी की लड़ाई का गवाह ये अगस्त क्रांति मैदान कई टुकड़ों में बंट चुका है... रोज़ किसी ना किसी समारोह का आयोजन यहां होता रहता है.. लेकिन जिस तरह से आज़ादी की इस धरोहर को संभालना था.. वो जज़्बा शायद कहीं पीछे छूट गया.

"पहले एक ग्राउंड के पांच ग्राउंड हो गए.. पांच ग्राउंड में जो इसकी ओरिजनलिटी है वो चली जा रही है.. यहां पर जो जिम वगैरह बना दिए.. बिना किसी परमिशन के.. ये सारी चीज़ें जो दिख रही है ना सर.. ये सबको पता है.. लेकिन इसमें जो प्रशासन है,. वो सीरियस नहीं है - शरद चिंतनकरस्थानीय निवासी, मुंबई"

उम्मीद है कि अब शायद सरकार और प्रशासन इस धरोहर को सजाने और संवारने के बारे में सोचे.. क्योंकि इस मैदान से हमारी आज़ादी की लड़ाई की अमूल्य यादें जुड़ी हैं.. जिनके बारे में हमारी आने वाली पीढ़ियों को जानने का पूरा हक है... 

Tuesday, October 11, 2016

कातिल मच्छरों से चीन की जंग




7.25 लाख लोग दुनिया में हर साल मच्छर से मरते हैं

561 लोग भारत में 2014 में डेंगू से मरे


220 लोग भारत में 2014 में मलेरिया से मरे



एक मच्छर हम सबकी ज़िंदगी पर कितना भारी पड़ सकता है.. इसका अंदाज़ा आपको इन आंकड़ों को देखकर हो जाएगा... लेकिन आपको हैरानी होगी कि हमारे पड़ोसी देश चीन ने मच्छरों का एक तरह से सफाया कर दिया है.. चीन ने नामुमकिन से दिखने वाले काम को कैसे किया आपको बताते हैं...

चीन ने मच्छरों को मच्छरों से मारा

चीन में मौजूद ये है दुनिया की सबसे बड़ी फैक्ट्री... जहां मच्छर पैदा किए जाते हैं.. हर हफ्ते 2 करोड़ मच्छरों को देश के अलग-अलग हिस्सों में छोड़ा जाता है... ये सभी नर मच्छर होते हैं... लैब में इन मच्छरों के जीन में बदलाव कर दिया जाता है... फिर इन्हें उन जगहों पर छोड़ दिया जाता है जहां मच्छर पाए जाते हैं... इन जेनेटिकली मॉडिफाइड नर मच्छर जब मादा से मिलते हैं.. तो इनसे पैदा होने वाले लार्वे अपने आप मर जाते हैं... यानि ना लार्वा होगा.. और ना ही मच्छर पैदा होंगे...


अपने पहले ही ट्रायल में इसने ज़बरदस्त कामयाबी पायी थी... जिस इलाके में इन मच्छरों को छोड़ा गया.. कुछ दिनों बाद वहां 90 फिसदी मच्छर कम हो गए... जिसके बाद चीन ने इसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर करना शुरु कर दिया...भारत में भी ऐसे मच्छरों पर काम शुरु हो चुका है.. मुंबई की एक कंपनी GBIT को ऐसे मच्छरों के ट्रायल की मंजूरी मिल चुकी है.. WHO की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल इलाज के लिए मलेरिया पर 11 हज़ार 640 करोड़ और डेंगू पर करीब 6 हज़ार करोड़ खर्च किए जाते हैं..

घास ने रोकी मच्छरों की जनसंख्या

मच्छरों की संख्या वहां बढ़ती है जहां पानी जमा होता है... गांवों में मच्छरों के पनपने के लिए खेतों से बेहतर कोई और जगह नहीं है... खासकर चावल के खेतों में... इसलिए चीन में मदद ली गयी इस खास घास की... इसका नाम है Azolla microphylla.. इन्हें चावल के खेतों में उगाया दिया जाता है... कुछ ही दिनों में ये पूरे खेत में फैल जाते हैं... जिससे मच्छरों के लार्वे पनप ही नहीं पाते... भारत में भी इनका इस्तेमाल शुरु किया गया है.. तमिलनाडु में किसान चावल के खेतों में इसका इस्तेमाल कर रहे हैं... क्योंकि मच्छरों के प्रजनन को रोकने के अलावा चावल के पौधों को भी इससे फायदा मिलता है...

मच्छरों की वजह से लोगों पर दोहरी मार पड़ती है... एक तो इससे होने वाली बीमारी के इलाज का खर्चा.. दूसरा इससे बचाव का खर्चा... मच्छरों से होने वाली बीमारियों से निपटने के लिए सरकार ने पिछले साल 43484 करोड़ रुपए के बजट को मंज़ूरी दी... जबकि पिछले साल देशभर के लोगों ने 4400 करोड़ रुपए मच्छरों को भगाने वाले उत्पादों को खरीदने पर खर्च किए

Tuesday, August 16, 2016

बेटा पाकिस्तान ज्यादा चें चें ना करो बलूचिस्तान पर वरना आधे रह जाओगे

बलूचिस्तान अलग हुआ तो आधा पाकिस्तान साफ

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बलूचिस्तान का नाम क्या लिया.. पाकिस्तान में हंगामा मच गया... अब पाकिस्तानी नेताओं और सेना को डर लगने लगा है कि कहीं बलूचिस्तान हाथ से न निकल जाए... पिछले कुछ साल में बलूचों ने आज़ादी की अपनी  जंग तेज़ कर दी है.. अगर बलूचिस्तान हटा तो पाकिस्तान आधा रह जाएगा...

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने एक बार किसी समारोह में कहा था एक बार जब उन्हें पता चल जाएगा कि भारत ने अपना गियर रक्षात्मक से आक्रामक कर दिया है तो वो समझ जाएंगे कि अब इसे झेलना उनके लिए नामुमकिन है, अगर आप एक मुंबई करोगे तो बलूचिस्तान को खो दोगे, इसमें कोई परमाणु युद्ध नहीं होगा, अगर आप तरीके जानते हो तो हम आपसे बेहतर तरीके जानते हैं,  ये अजित डोभाल का तब का बयान है जब वो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नहीं हुआ करते थे.. तब उन्होंने पाकिस्तान को बलूचिस्तान की अहमियत बतायी थी.. लेकिन पाकिस्तान को सीधी बात समझने की आदत है हीं नहीं... आखिर बलूचिस्तान पर जबरन कब्ज़े का उसे गुमान जो है..

बलूचिस्तान पर पाकिस्तानी कब्ज़ा गैर-कानूनी 

1948 में पाकिस्तान ने बलूचिस्तान पर जबरदस्ती कब्ज़ा किया... एक आज़ाद मुल्क को हथियारों के दम पर अपना गुलाम बना लिया.. 68 साल बीत गए बलूचों को अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ते... अगर वो ये लड़ाई जीत जाते हैं.. तो पाकिस्तान का नक्शा एक बार फिर बदल जाएगा... बलूचिस्तान अलग हुआ.. तो आधा पाकिस्तान साफ हो जाएगा... पाकिस्तान से अलग होने के लिए जिस तरह बलूचिस्तान ने जंग छेड़ रखी है.. अगर वो उसमें कामयाब हुआ तो 1971 के बाद पाकिस्तान का नक्शा एक बार फिर बदल जाएगा... और इस बार का बदलाव पाकिस्तान के लिए बड़ा ज़ख्म दे जाएगा.. क्योंकि पाकिस्तान के नक्शे से बलूचिस्तान का अलग होने का मतलब है.. आधे पाकिस्तान का साफ हो जाना...

बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर ना-पाक नज़र

दरअसल बलूचिस्तान चार बड़ी रियासतों मकरान.. खरान.. लास बेला और कलात को मिलाकर बनाया गया.. और ये पूरे पाकिस्तान का करीब 47 फीसदी इलाका है.. जाहिर है नक्शे से बलूचिस्तान कटा तो.. पाकिस्तान अपने आधे हिस्से से हाथ धो बैठेगा, पाकिस्तान के लिए बलूचिस्तान को खोने का मतलब सिर्फ ये नहीं है कि उसकी 47 फीसदी ज़मीन चली जाएगी.. बल्कि आर्थिक तौर पर भी उसे बड़ा झटका लगेगा.. क्योंकि बलूचिस्तान कमाई के नज़रिए से भी पाकिस्तान के लिए बेहद अहम है.. पूरे पाकिस्तान का एक तिहाई प्राकृतिक गैस यहीं से निकलता है... तेल के भी बड़े भंडार यहां मौजूद है.. सैकड़ों खानों से यहां सोना निकाला जा रहा है... तांबे के भी बड़े भंडार हैं... यूरेनियम भी यहां की धरती में पाया जाता है..


लेकिन पाकिस्तान अब तक सिर्फ इसको दोहन ही करता आ रहा है.. बलूच लोगों के लिए इससे ज्यादा दुखदायी बात और क्या होगी कि इलाके में गैस मिलने के करीब तीस साल बाद उन्हें गैसा की सप्लाई शुरु की गयी.. जबकि पाकिस्तान ने 1955 से ही उसे बेचना शुरु कर दिया था..

पाकिस्तान का सबसे पिछड़ा राज्य है बलूचिस्तान 

वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के 10 सबसे पिछड़े ज़िलों में से 8 बलूचिस्तान के हैं.. पूरे पाकिस्तान की 47 फीसदी साक्षरता की दर के मुकाबले बलूचों की साक्षरता दर महज़ 22 फीसदी है.. पूरे पाकिस्तान में 86 फीसदी लोगों को मिल रहे पीने का पानी के मुकाबले बलूचिस्तान के सिर्फ 20 फीसदी लोगों को ही पीने का पानी उपलब्ध है..  अंग्रेज़ों ने बलूचिस्तान को भारत और पाकिस्तान से भी पहले आज़ाद देश घोषित कर दिया था.. 11 अगस्त 1947 बलूचिस्तान आज़ाद हो चुका था.... उस समय राजकुमार यार मोहम्मद खान का बलूचिस्तान पर शासन था.. और उनकी राजधानी थी कलाट.. मोहम्मद अली जिन्ना..यार मोहम्मद खान से मिले.. उन्हें कहा कि मज़हब के नाम पर वो पाकिस्तान के साथ मिल जाएं.. जिन्ना के इस प्रस्ताव को बलूचिस्तान की संसद ने एक सिरे से खारिज कर दिया..

27 मार्च को बलूच मनाते हैं ब्लैक डे

वो तारीख थी 27 मार्च 1948... जब पाकिस्तान ने फौज और हथियार के दम पर बलूचिस्तान को अपने में मिला लिया.. पाकिस्तान ने 27 मार्च 1948 को गैर कानूनी तरीके से बलूचिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया.. दुनियाभर में जहां भी बलूच लोग हैं.. वो हर साल 27 मार्च को काले दिन के रूप में मनाते हैं... इस दिन बलूचिस्तान की ज़मीन तो पाकिस्तान ने हड़प ली लेकिन वहां के लोगों को अपने साथ ना कर सका.. आज भी बलूच अपने आप को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं मानते हैं.. बलूच ताकतवर ना हो जाएं इसलिए पाकिस्तानी सेना यहां अत्याचार करती है... सरकार की ओर से सेना को वहां जुल्म करने की छूट मिली हुई है... सेना जो चाहे वो करती है... बलूचों को जान से मारना और उनके घरों को जलाकर राख कर देना यहां आम बात है..

बलूचिस्तान में अल्पसंख्यक हुए बलूच

पाकिस्तान.. बलूचिस्तान पर चौतरफा वार कर रहा है... पाकिस्तानी सेना आए दिन नौजवानों को बिना कुछ कहे उठा ले जाती है... रोज़ाना कहीं ना कहीं सेना बलूचों को मार रही है... अब तो हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं.. बलूच अपने ही प्रदेश में अल्पसंख्यक बन चुके हैं.. पाकिस्तान के कब्ज़े से पहले बलूचिस्तान में बड़ी आबादी शिया मुसलमानों की थी.. लेकिन पिछले दस सालों में पाकिस्तानी सेना करीब 20 हज़ार बलूचों को मार चुकी है... एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब 21 हज़ार बलूच युवक लापता हैं.. पाकिस्तान जानबूझकर यहां पंजाब और दूसरे इलाकों से लाकर लोगों को बसा रहा है... नतीजा ये हुआ कि बलूचिस्तान में बलूच लोग ही अल्पसंख्यक हो गए हैं.. बड़ी आबादी अब सुन्नी मुसलमानों की हो गयी है..

पाकिस्तान का बलूचों पर अत्याचार

ज़ाहिर है पाकिस्तान की ये नापाक चाल बलूच लोगों की भी समझ में आ रही है.. क्योंकि बलूच जानते हैं कि उनकी ये ज़मीन पाकिस्तान के लिए सोने की चिड़िया है... गैस और तेल के बड़े भंडारों के साथ सोने और तांबे जैसी कीमती धातुओं के यहां भंडार हैं.. पाकिस्तान उनकी ज़मीन से अपना खज़ाना भर रहा है.. लेकिन बलूचों को एक चवन्नी भी नहीं दी जा रही.. चीन की मदद से पाकिस्तान यहां के प्राकृतिक संसाधनों को निकाल रहा है.. ज़ाहिर है जो इलाका प्राकृतिक संसाधनों से भरा हुआ हो... गैस और तेल के बड़े भंडार हों... सोने और तांबे जैसी धातुओं की खानें हों.. तो वहां से कितनी कमाई हो रही होगी.. लेकिन विकास के नाम पर यहां कुछ भी नहीं किया गया.. बलूचों की हालत तो उससे भी खराब हो गयी है.. जब वहां अंग्रेज़ों की हूकूमत थी..

ज़ाहिर है पाकिस्तान के इन्हीं ज़ुल्मों सितम ने बलूचों को इतना नाराज़ कर दिया है कि वो अपनी आज़ादी के लिए जान देने से भी पीछे नहीं हट रहे...बलूचिस्तान का भारत से नाता बेहद पुराना है... आज़ादी के पहले से ही बलूच.. हिंदुस्तान को अपना करीबी मानते रहे हैं.. इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब लाल किले से बलूचिस्तान का नाम लिया.. तो दुनियाभर में मौजूद बलूच नेताओं ने इसके प्रधानमंत्री का शुक्रिया अदा किया

बलूचिस्तान पर इतना बवाल क्यों ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ऑपरेशन बलूचिस्तान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से एक ऐसी बात कही.. जिसे आज से पहले भारत के किसी भी प्रधानमंत्री ने नहीं कहा... उन्होंने भाषण में PoK और गिलगित के साथ बलूचिस्तान का नाम लिया.. विरोधी इसे गलत ठहरा रहे हैं... जबकि बलूचिस्तान के लोग इसका स्वागत कर रहे हैं... मोदी के बयान की वजह से बलूच समस्या एक बार फिर दुनिया के सामने आ गयी है... प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इन बातों ने अब नयी बहस छेड़ दी है.. बहस इस बात की आखिर उन्होंने अपने भाषण में बलूचिस्तान और गिलगित का नाम क्यों लिया.. लेकिन इसका एक पक्ष ये भी है कि... उनकी इन बातों के बाद बलूचिस्तान की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे बलूच लोगों ने उनके बयान का स्वागत किया है...

भारत क्यों पड़ा  बलूचिस्तान विवाद में ?

आखिर बलूचिस्तान और पाकिस्तान के इस विवाद के बीच में आने की ज़रूरत भारत को क्यों पड़ी.. ये बताने से पहले आपको ये समझना पड़ेगा कि पाकिस्तान की बनावट क्या है और वहां बलूचिस्तान क्यों विवाद की वजह बना है... पाकिस्तान के चार मुख्य प्रांत हैं... पंजाब.. सिंध... खैबर पख्तुनवा और बलूचिस्तान... इसके अलावा फाटा का इलाका है.. जिसका प्रशासन सीधे पाकिस्तान की केंद्र सरकार के अधीन है... इसके अलावा गिलगित और बालटिस्तान का इलाका है... जिन्हें स्वायत्त प्रदेश कहा जाता है... बलूचिस्तान पाकिस्तान का पश्चिमी प्रांत है जिसकी राजधानी क्वेटा है... इसकी सीमा एक ओर ईरान से लगती है.. दूसरी ओर अफगानिस्तान से लगती है.. और तीसरी ओर पाकिस्तान से लगती है...


अब सवाल ये है कि आखिर बलूचिस्तान को लेकर इतना विवाद है क्यों... क्यों पाकिस्तान की सरकार और पाकिस्तानी सेना पर बलूचिस्तान को लेकर बड़े आरोप लगते रहते हैं...  और क्यों बलूचिस्तान के लोग पाकिस्तान से आज़ाद होना चाहते हैं... पहले आपको बताते हैं कि पाकिस्तान के लिए बलूचिस्तान इतना अहम क्यों है... दरअसल बलूचिस्तान में यूरेनियम,पेट्रोल,प्राकृतिक गैस,तांबा और कई अन्य धातुओं के भंडार हैं... पाकिस्तान की कुल प्राकृतिक गैस का एक तिहाई यहीं से निकलता है... यही नहीं अरब सागर के किनारे होने की वजह से बलूचिस्तान सामरिक तौर पर भी पाकिस्तान के लिए बेहद अहम है... कतर,ईरान या तुर्कमेनिस्तान से कोई भी गैस या तेल की पाइपलाइन गुजरेगी तो उसे बलूचिस्तान से होकर ही जाना होगा

बलूचिस्तान में पाकिस्तान और चीन का गठबंधन

पाकिस्तान. चीन की मदद से बलूचिस्तान में कई बड़े प्रोजेक्ट्स चला रहा है... जिससे पाकिस्तान और चीन के खज़ाने तो भर रहे हैं.. लेकिन बलूचिस्तान के लोगों को कुछ भी नहीं मिल रहा...
वक्त के साथ बलोच अपने हक के के लिए आवाज़ उठाते रहे... लेकिन पाकिस्तानी सेना हर बार उन्हें अपनी ताकत के दम पर कुचलती आ रही है... हर बीते वक्त के साथ पाकिस्तान में सरकारें बदलती रहीं... अगर कुछ नहीं बदला तो वो था बलूचिस्तान के लिए उसका रवैया... इस बार जब नवाज़ शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने.. तब बलूच लोगों को एक उम्मीद सी जगी.. लेकिन उनकी ये उम्मीद भी झूठी निकली...

11 अगस्त 1947 को ही बलूचिस्तान आज़ाद हुआ... 1948 में पाकिस्तान ने जबरन बलूचिस्तान पर कब्ज़ा किया.. .तब से लेकर आज तक उसने अपने आप को कभी भी पाकिस्तान का हिस्सा नहीं माना... और यही बात पाकिस्तान को नागवार गुज़रती है.. जिसका खामियाज़ा बलूची लोग.. पाकिस्तानी सेना के ज़ुल्मों के ज़रिए भुगतते हैं... पाकिस्तान के इन जुल्मों सितम के खिलाफ आज भी लड़ाई जारी है... और यही वजह है कि बलूचिस्तान पर पाकिस्तान का ज़ुल्म कम होने की बजाए बढ़ता ही जा रहा है... और इसकी शुरुआत हुई 1948 में जब उसने अपनी सैन्य ताकत के दम पर बलूचिस्तान पर कब्ज़ा किया...


बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना का दमन

उसके बाद 1958, 1962 और 1973 में पाकिस्तान ने बड़ा सैन्य अभियान चलाया.. ताकि विद्रोहियों को दबाया जा सके,  1973 के सैन्य अभियान में पाकिस्तानी सेना के करीब 400 जवानों और करीब 8 हजार बलूच लड़ाकों की मौत हुई, 2004 से अब तक हुए पाकिस्तानी मिलिट्री ऑपरेशनों में बलूचिस्तान के करीब 19,000 लोग मारे जा चुके हैं, पाकिस्तान लगातार लोकतांत्रिक बलूच नेताओं की हत्या और कट्टरपंथियों की आर्थिक मदद करता आ रहा है.. किसी भी बलूच को सेना और सरकारी नौकरियों ने नहीं आने दिया जाता... पाकिस्तान सेना पर बलूच महिलाओं के शोषण के आरोप भी लगातार लगते आ रहे हैं

2005 में बलूचिस्तानी नेताओं नवाब अकबर खां बुग्ती और मीर बालच मर्री ने पाकिस्तान सरकार के सामने 15 सूत्रीय एजेंडा रखा. एजेंडे में बलूच प्रांत के लिए ज्यादा अधिकारों की मांग की गई. लेकिन मांगों के बदले अगस्त 2006 में पाकिस्तानी सेना ने बुग्ती को मार गिराया... बुग्ती पर पाक के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ पर हमले का आरोप लगाया गया. नतीजा ये हुआ.. कि पाकिस्तान के खिलाफ विद्रोह की चिंगारियां भड़कती रहीं... बलूच विद्रोहियों की मांग है कि पाकिस्तान बलूचिस्तान को स्वतंत्र देश घोषित करे... पाकिस्तानी सेना के अभियानों को रोका जाए... प्राकृतिक गैस और तेल भंडारों से होने वाली कमाई में बलूचिस्तान को हिस्सा दिया जाए... साथ ही कमाई का कुछ हिस्सा इलाके के विकास पर खर्च किया जाए..

बलूचिस्तान में भारत की दखल का आरोप

बलूचिस्तान के विद्रोह में पाकिस्तान भारत का हाथ बताता है... जबकि भारत हमेशा से कहता आ रहा है कि ये पाकिस्तान का अंदरूनी मामला है... इस पर विवाद 2009 में ज्यादा बढ़ा.. जब इजिप्ट के शर्म अल शेख में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गिलानी की मुलाकात हुई... भारत और पाकिस्तान का जो साझा बयान जारी किया गया.. उस पर गिलानी ने कहा था कि इस बयान में पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में भारत की दखअंदाज़ी का ज़िक्र किया है.. जिसके बाद भारत में विवाद पैदा हुआ.. और मनमोहन सिंह को संसद में इस पर सफाई देनी पड़ी..

बलूचिस्तान पर भारत का रूख सिर्फ इतना है कि पाकिस्तान को पहले अपने घर में मचे घमासान को संभालना चाहिए.. ना कि उसे भारत के अभिन्न अंग कश्मीर की चिंता करनी चाहिए... 

Wednesday, August 10, 2016

संजना पार्ट - 1


अरे मां तुम तो बेकार में ही परेशान हो रही हो..

नहीं नहीं.. यहां पर अब सब ठीक है... 

मां... लड़कियों के लिए दिल्ली अब सेफ है.. शेफाली ने सबकुछ बताया है मुझे... उसे भी साल होने को आ गया दिल्ली में... कोई खतरा नहीं है यहां पर... 

क्या मां...एक बार दिल्ली में इतना बड़ा हादसा हो गया तो हर बार होगा क्या... और तुम टेंशन मत लो मैं और शेफाली रह लेंगे यहां पर... हज़ारों लड़कियां रहती हैं दिल्ली में मां.. 

चलो अब बाद में बात करती हूं.. ज़रा सामान तो सेट कर लूं... 

संजना... 21 साल उम्र... खुशमिजाज़... होशियार... आज के ज़माने की लड़की... रुढ़ीवादी बंधनों में उसने शुरु से ही बंधना नहीं सीखा... इसीलिए तो एमबीए करने दिल्ली गयी... आखों में हज़ारों सपने हैं...एमबीए के बाद अच्छी सी नौकरी... नौकरी में अपनी मेहनत से तरक्की... उसके बाद शादी... फिर घर परिवार.. सबकुछ सोच रखा है उसने... और अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए वो दिल्ली आ गयी... 

दिल्ली... कहते हैं कि दिल्ली दिलवालों की है... लेकिन 16 दिसंबर 2012 को जो कुछ भी दिल्ली में हुआ... उसने पूरी दुनिया को दहला दिया... इसलिए संजना की मां ज्यादा फिक्रमंद हो रहीं थी.. अकेली बच्ची... जिसने अभी-अभी जवानी में कदम रखा है... इतना बड़ा शहर... कुछ गड़बड़ हो गयी तो... लेकिन संजना की ज़िद के आगे तो सब बेकार है... 

संजना अपनी दोस्त शेफाली के साथ साउथ एक्सटेंशन के एक पीजी में शिफ्ट हो गयी है... पीजी के अपने नियम कायदे हैं जिनका पालन करना ज़रूरी है... और पीजी की केयरटेकर मैडम तो बेहद कड़क स्वभाव की हैं... संजना को पहली बार घर से आज़ाद होना बहुत अच्छा लग रहा था... घर में कई बंदिशें.. ये मत पहनो... यहां मत जाओ... वहां मत जाओ... उपर से पापा और भैया का पूरे शहर भर में पहचान होना.. छोटा सा शहर था उनका... इसलिए उसके पापा और भैया को हर छोटा बड़ा जानता था.. लेकिन दिल्ली की बात ही अलग है... आज़ाद पंछी हो गयी है वो... कल एडमिशन लेने जाना है.. इसलिए संजना जल्दी सो गयी.. 

दिल्ली की सुबह वैसे ही अलसायी होती है... और यहां पर ना तो पापा की आवाज़ आयी... और ना ही भैया ने उसे ज़बरदस्ती उठाया... खैर जल्दी से उठ कर तैयार हुई... और फौरन कॉलेज के लिए भागी..संजना बस स्टॉप पहुंची तो भीड़ देखकर उसकी हिम्मत नहीं हुई... कॉलेज जल्दी भी पहुंचना था.. इसलिए उसने ऑटोवाले को हाथ दिया... 

भइया... धौला कुआं चलोगे.. 

हां मैडम.. बैठो... 

कितने पैसे लोगे... 

100 रुपए मैडम...

100 रुपए.. बहुत ज्यादा है... 

अच्छा चलो आप 90 रुपए ही दे देना... ऑटो वाले ने बेहद भद्दे तरीके से घूरते हुए कहा... 

संजना को ऑटो वाले का यूं घूरना और बात करना ज़रा भी पसंद नहीं आया... उसे फौरन उसके शहर के ऑटोवाले याद आ गए... हम उम्र हुआ तो बहन जी बुलाते.. उम्रदराज़ हुए.. तो बेटी ही कहते थे.. शहर के छोटे होने के अपने फायदे और नुकसान दोनों ही हैं... रास्ते भर ऑटो में सिकुड़ी हुई बैठी रही.. बैक मिरर से ऑटोवाला लगातार उसे देख रहा था.. 

भइया सीधे देख कर चलो... वरना किसी गाड़ी से भिड़ा दोगे... 

ऑटो वाले ने अपने गंदे दांत दिखाते हुए बोला... अरे मैडम... 15 साल का था तब से ऑटो चला रहा हूं... टेंशन ना लो... देखता कहीं भी रहूं... टक्कर नहीं होगी... और आप हैं ही ऐसी की नज़रें चली ही जाती हैं... 

संजना को काटो तो खून नहीं... खैर किसी तरह संजना कॉलेज पहुंची... दिमाग में हज़ारों बातें चल रही थी... मम्मी की नसीहतें... पापा के सलाह.. और भैया का हौसला देना... छोटे शहर की लड़की थी ना.. इतने बड़े शहर में डर तो लगना ही था... खैर दिनभर एडमिशन के चक्कर में ही लग गए... शाम को थकी-हार निहारिका पीजी पहुंची... अब उसे पता चला कि.. लोग बड़े शहर में आकर छोटे शहर वालों को भूल क्यों जाते हैं... अपनी हालत ठीक रहे तब तो कुछ और भी याद आए.. 

और संजना कैसा रहा दिल्ली में पहला दिन... शेफाली ने पूछा... 

मत पूछ यार... कैसी ज़िंदगी है यहां पर... सब भागते रहते हैं... या फिर घूरते रहते हैं... सुंदर हो या बदसूरत बस उसका लड़की होना गुनाह हो गया है... जाने कैसे लोग हैं यहां पर... 

अरे तू इतने से घबरा गयी... दिल्ली है मैडम दिल्ली... यहां पर बहुत कुछ देखना पड़ता है मैडम... आप तो अभी स्टूडेंट हैं... ज़रा हम कॉल सेंटर वालों की हालत तो जान लीजिए... ना घर के हैं... ना घाट के... सारी रात जाग कर काम करते रहो.. और दिन भर उल्लुओं की तरह सोते रहो...

तो कोई ऐसी नौकरी कर ले... जो इंसानों के लिए है.. क्यों उल्लू बनी हुई है... 

यहां आदमियों की कमी है मैडम... नौकरियों की नहीं... जो भी यहां आता है.. उसके लिए कुछ ना कुछ तो दिल्ली में है हीं...और एक बार जहां फंस गए...तो समझ ले.. निकलना बेहद मुश्किल होता है... कभी दूसरी नौकरी मन मुताबिक नहीं मिलती.. तो कहीं पर बॉस की निगाहें नौकरी करने नहीं देतीं...चल छोड़ ना यार... तू मस्त रह... 

एमबीए करने के बाद कहां जाने का इरादा है... विदेश तो नहीं जाएगी ना... 

अरे नहीं यार... यहीं दिल्ली में ही कोई अच्छी नौकरी मिल जाए.. बैंक में हो जाए.. तो उससे बेहतर कुछ भी नहीं हो सकता... 

हां ये भी ठीक है... यार मेरे लिए कुछ बना दे..ज़रा मैं अपने ब्वॉयफ्रेंड से बात कर लूं... 

क्या... तेरा ब्वॉयफ्रेंड भी है... 

हां.. और क्या... 

अरे बाप रे... घरवालों को पता है.. उसके बारे में... 

पागल है क्या... ब्वॉयफ्रेंड का पता घरवालों को चल गया..तो मेरा बोरिया बिस्तर बंध जाएगा यहां से... जो आज़ादी मिली है.. वो छिन जाएगी... फिर किसी लड़के के साथ शादी कर दी जाएगी.. और मेरे सारे सपने अपना दम तोड़ देंगे... 

क्यों तो शादी नहीं करेगी... या फिर ब्वॉयफ्रेंड से ही शादी का इरादा है...

ओए... सारी बातें अभी ही जान लेगी... या कुछ कल के लिए छोड़ेगी... फिलहाल तो ब्वॉयफ्रेंड बनाने में भलाई है... शादी-वादी तो बाद में देखेंगे... 

शेफाली का जवाब सुनकर हैरान परेशान और चेहरे पर असमंजस का भाव लिए संजना किचन में घुस गयी.. 

Saturday, July 16, 2016

ज़िंदगी




अरे तू तो वही है
जो अक्सर गरीबों की नींदों में दिखती है
जो इच्छाओं के हर नुक्कड़ पर खड़ी मिलती है
जो बच्चों की ज़िदों की छतों पर घूमती है
अरे कहीं तू ख्वाब तो नहीं

अरे तू तो वही है
जो हरदम भागती-दौ़ड़ती रहती है
जो सबको अपने पीछे रखती है
जो गरीबों के लिए ख्वाब है
जो अमीरों के लिए हैसियत है
अरे कहीं तू हसरत तो नहीं

अरे तू तो वही है
जिसने हर पल तड़पाना सीखा है
जिसने हर मोड़ पर गिराना सीखा है
जो ख्वाबों का गला घोंट देती है
जो हसरतों को सूली पर चढ़ा देती है
अरे कहीं तू ज़िंदगी तो नहीं

ज़िंदगी...चल तू बेवफा ही सही
भले ही घोंट दे तू हसरतों का गला
डूबो दे तू ख्वाबों को समंदर में
पर इतना तो समझ ही ले
तूझे हम जी के दिखाएंगे
तूफानों में लौ को जला कर दिखाएंगे
मौत से दोस्ती करने से पहले ऐ ज़िंदगी
तेरे हर पल को अपना बना कर दिखाएंगे


©Alok Ranjan

Sunday, July 03, 2016

MTCR में शामिल होने से भारत को क्या मिलेगा ?

भारत MTCR यानी मिसाइल टेक्नॉल्जी कंट्रोल रिजीम का सदस्य बन गया... अब अत्याधुनिक मिसाइल तकनीक पाने में उसे कोई मुश्किल नहीं होगी.. अब इससे चीन परेशान है.. क्योंकि वो इस ग्रुप का हिस्सा नहीं है.. भारत के विदेश सचिव एस जयशंकर की मौजूदगी में भारत को औपचारिक तौर पर MTCR यानि मिसाइल टेक्नॉल्जी कंट्रोल रिजीम का 35 वां सदस्य देश बनाया गया... यानि हथियारों के बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्था में भारत पहली बार एंट्री करेगा... MTCR में शामिल होने के चार बड़े फायदे हैं...

पहला फायदा 
अब भारत सदस्य देशों से अत्याधुनिक मिसाइल तकनीक आसानी से हासिल कर सकेगा..

दूसरा फायदा 
भारत अपनी मिसाइलें दूसरे देशों को बेच भी सकता है, यानि पहली बार हथियारों का निर्यातक देश बन सकेगा..

तीसरा फायदा
आतंरिक सुरक्षा के लिए अमेरिका से प्रीडेटर ड्रोन खरीद सकता है, जिनका इस्तेमाल आतंकवादियों पर हमले और नक्सली हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में किया जा सकेगा..

चौथा फायदा
न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप यानि एनएसजी की सदस्यता की दावेदारी मज़बूत होगी, 48 देशों के इस ग्रुप में प्रवेश का रास्ता एक बार फिर खुल सकेगा

MTCR का सदस्य बनने पर भारत को कुछ नियमों का पालन करना पड़ेगा जैसे अधिकतम 300 किलोमीटर से कम रेंज वाली मिसाइल बनाना, ताकि हथियारों की होड़ को रोका जा सके... 1987 में अमेरिका,  फ्रांस, जर्मनी, कनाडा, जापान, इटली और ब्रिटेन ने मिलकर MTCR का गठन किया.. भारत को मिलाकर अब इसमें 35 देश हो गए हैं... इसका मकसद केमिकल, बायलोजिकल और न्यूक्लियर मिसाइलों के इस्तेमाल को सीमित करना है...

MTCR में शामिल होने के बाद भारत सरकार के सूत्र इस बात का दावा कर रहे हैं कि एनएसजी में शामिल होने के लिए भारत का दरवाज़ा एक बार फिर से खुल सकता है.. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि विरोध कर रहे देशों के साथ चीन को आखिर भारत कैसे राज़ी करेगा.. वो चीन जो लगातार भारत का ये कहकर विरोध कर रहा है कि भारत पहले एनपीटी पर हस्ताक्षर करे और उसके बाद ही उसे एनएसजी में सदस्यता दी जाए

Tuesday, June 28, 2016

अगर भारत NSG में शामिल हुआ

NSG में शामिल होने के चार फायदे 



न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में शामिल होने का रास्ता भारत के लिए उस वक्त खुला जब 2008 में अमेरिका से न्यूक्लियर डील हुई... सवाल ये है कि भारत के लिए NSG में शामिल होना इतना ज़रूरी क्यों है... दरअसल एनएसजी में शामिल होने से देश को चार बड़े फायदे होंगे

पहला फायदा
परमाणु तकनीक आसानी से मिलेगी
 भारत एनएसजी में शामिल हुआ तो उसे दवाई से लेकर न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाने तक की तकनीक बेहद आसानी से उपलब्ध होगी... भारत के पास अपनी स्वदेशी तकनीक भी है.. लेकिन एनएसजी के सदस्य के तौर पर दूसरे देशों के पास मौजूद अत्याधुनिक तकनीक हासिल करने में किसी तरह की कोई मुश्किल नहीं आएगी. भारत का लक्ष्य है कि वो उर्जा की अपनी 40 फीसदी जरूरत रीन्यूवेबल और क्लीन एनर्जी से पूरा करेगा... और ये तभी मुमकिन हो पाएगा जब परमाणु उर्जा के उत्पादन को बढ़ाया जाए...

दूसरा फायदा
यूरेनियम आसानी से मिलेगा
एनएसजी का सदस्य बनते ही परमाणु उर्जा उत्पादन भारत के लिए आसान हो जाएगा.. क्योंकि रिएक्टर्स में इस्तेमाल होने वाला यूरेनियम उसे सदस्य देशों से आसानी से मिल जाएगा

तीसरा फायदा
मेक इन इंडिया को बढ़ावा
 यही नहीं भारत इसके ज़रिए मेक इन इंडिया प्रोग्राम को बढ़ावा दे सकता है... सदस्यता मिलने के बाद भारत न्यूक्लियर पावर प्लांट के उपकरणों का उत्पादन बड़े पैमाने पर अपने यहां कर सकेगा... जिसका इस्तेमाल आर्थिक और रणनीतिक फायदे के लिए किया जा सकता है.

चौथा फायदा
मेड इन इंडिया पावर प्लांट
 भारत के पास वो काबिलियत आ जाएगी कि वो दुनिया के दूसरे देशों को अपने पावर प्लांट बेच सके... इसका मतलब ये हुआ कि पूरी न्यूक्लियर इंडस्ट्री और इससे संबंधित तकनीक के विकास के बाज़ार में भारत की अपनी मज़बूत जगह बन जाएगी...
  
चौथा फायदा
उर्जा जरूरतें पूरी होंगी 
एक ओर चीन जहां भारत को एऩएसजी में शामिल होने से रोकना चाहता है.. वहीं दूसरी ओर वो 2020 तक अपनी परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता को तीन गुना करना चाहता है.. चीन की तरह ही भारत को भी उर्जा की बड़ी जरूरत है...


भारत के पास फिलहाल 21 परमाणु संयत्र हैं... जिनसे 5800 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा रहा है... 6 नए रिएक्टर्स अभी बनाए जा रहे हैं... अपनी ऊर्जा संबंधी जरूरतों को देखते हुए भारत ने 2032 तक 63 हज़ार मेगावाट परमाणु ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य बनाया हैवैसे एनएसजी में शामिल होने का एक रास्ता ये है कि भारत एनपीटी पर साइन कर दे और एनएसजी में शामिल हो जाए... पर इसका मतलब ये हुआ कि हमें अपने सारे परमाणु हथियारों को नष्ट करना होगा.. जो कि पाकिस्तान जैसे अस्थिर पड़ोसी के मौजूद रहते करना ठीक नहीं होगा..

Thursday, May 19, 2016

तमिलनाडु में अम्मा रिटर्न्स


तमिलनाडु में अम्मा ने सत्ता पर दोबारा कब्ज़ा कर रिकॉर्ड बना दिया है... पिछले 27 साल में ऐसा पहली बार हुआ है कि कोई पार्टी सत्ता में लौटी है... जयललिता ने डीएमके और कांग्रेस के गंठबंधन को ध्वस्त कर रिकॉर्ड बना दिया है... तमाम अटकलों को दरकिनार करते हुए जयललिता ने आखिरकार वो कर दिखाया जिसके होने की उम्मीद कम लग रही थी... लगातार दूसरी बार जयललिता ने चुनाव जीतकर इतिहास को बदल दिया है...अब सवाल ये है कि आखिर अम्मा ने ये करिश्मा किया कैसे... कैसे उन्होंने तमिलनाडु के इतिहास में वो कर दिखाया जो पिछले 27 साल में नहीं हुआ था... दरअसल इसकी कई वजहें हैं...

अम्मा की जीत की पहली बड़ी वजह
रोज़गार, शिक्षा और महिला सुरक्षा पर ज़ोर 

जयललिता ने कहा था कि अगर वो सत्ता में आयी तो डीएमके की तरह मिक्सर या ग्राइंडर नहीं बल्कि लैपटॉप बांटेंगी.. शहरों को आईटी सिटी बनाएंगी.. महिलाओं की सुरक्षा पर खास ध्यान देंगी.. जिस पर मतदाताओँ ने पूरा भरोसा किया..

अम्मा की जीत की दूसरी बड़ी वजह
भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाना

भ्रष्टाचार के छींटें तो जयललिता के दामन पर भी लगें हैं.. लेकिन 2जी केस से लेकर चुनाव में पैसों के इस्तेमाल के मुद्दे को उन्होंने जमकर भुनाया... लोगों ने वादाय किया कि अगर वो सत्ता में दोबारा लौंटी तो करप्शऩ को पूरी तरह से खत्म कर देंगी.. और इसका भी बड़ा असर वोटर्स पर हुआ.. 

अम्मा की जीत की तीसरी बड़ी वजह
डीएमके की पारिवारिक कलह 

जयललिता की जीत की एक बड़ी वजह डीएमके की पारिवारिक कलह भी रही.... सुप्रीमों करुणानिधि का स्वास्थ्य ठीक नहीं था... स्टालिन को उन्होने अपना राजनीतिक वारिस घोषित कर दिया... बड़े बेटे अलागिरी ... की स्टालिन से नहीं पट रही... कनिमोझी.. दयानिधि मारन... और कलानिधि मारन ने अलग मोर्चा खोला हुआ था... मतदाताओं को लगा कि अगर डीएमके सत्ता में आयी तो सत्ता में पावर की लिए परिवार में ही जंग छिड़ जाएगी.. ऐसे में राज्य हाशिए पर चला जाएगा.. और यही बात मतदाताओं को नागवार गुज़री...

अम्मा की जीत की चौथी बड़ी वजह
अम्मा ने जनता से नज़दीकीयां बढ़ाईं
चुनाव प्रचार के दौरान लोगों से दूर रहने वाली जया लोगों के पास गयीं... बात की.. दुख दर्द जाना... इससे लोगों को एक मैसेज देने में वो कामयाब हुईं... कि वो अब लोगों के करीब आना चाहती हैं... लोगो को एक बदली हुई अम्मा नज़र आयीं और यही बात जनता को बेहद पसंद आयी़


1996 में जयललिता की पार्टी चुनावों में हार गयी... खुद भी चुनाव हारीं... करप्शन और सरकार विरोधी जनभावना ने उनकी लुटिया डूबो दी... हालांकि पांच साल बाद ही 2001 में एक बार वो फिर से सीएम की कुर्सी पर काबिज़ हुईं...  यही नहीं करप्शन के मामलों और कोर्ट से सजा मिलने के बावजूद उन्होंने अपनी पार्टी को चुनावों में जीत दिलवायी...

जयललिता ने गैर निर्वाचित मुख्यमंत्री के तौर पर कुर्सी तो संभाल ली लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नियुक्ति को रद्द कर दिया... जिसके बाद उन्हें अपनी कुर्सी पनीरसेल्वम को देनी पड़ी.. हालांकि पनीरसेल्वम सिर्फ नाम के मुख्यमंत्री थे क्योंकि कुर्सी पर तो जयललिता का खड़ाउं (कृपया इसे सैंडिल समझा जाए) ही विराजमान था... हालांकि जब उन्हें मद्रास हाईकोर्ट से थोड़ी राहत मिली तो मार्च 2002 में अपने खड़ाउं (यहां पर भावना पनीरसेल्वम से है) को हटाकर कुर्सी पर काबिज़ हो गयीं...

यानि कुल मिलाकर तो यही कहा जा सकता है कि विपरीत हालातों में भी अम्मा अपने रथ से डिगीं नहीं... ऐसे में उन्हें आयरन लेडी भी कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी... 

Wednesday, April 06, 2016

बिहार की शराबबंदी और नीतीश कुमार जी का तर्क

आओ कुछ अच्छा करते हैं

आओ कुछ अच्छा करते हैं

रूठों को मनाते हैं
रोतों को हंसाते हैं
यारों दोस्तों के साथ महफिलें सजाते हैं
आओ कुछ अच्छा करते हैं

बुरे के साथ अच्छा बन जाते हैं
दुखों को दहलीज़ के बाहर छोड़ आते हैं
अपनों की खुशी की वजह बन जाते हैं
आओ कुछ अच्छा करते हैं

फेसबुकिए नहीं हाड़-मांस वाले दोस्त बनाते हैं
मोबाइल छोड़ घरवालों के साथ कुछ वक्त बिताते हैं
वर्चुअल नहीं अपनी वाली दुनिया में जीते हैं
आओ कुछ अच्छा करते हैं

©Alok Ranjan

Tuesday, January 12, 2016

नॉन रेज़ीडेंट बिहारी [NRB]


[हमारे पुराने मित्र और बिहारी भाई शशिकांत मिश्रा ने एक किताब लिख डाली है. पेशे से पत्रकार हैं लेकिन किताब किसी मंझे हुए कहानीकार/उपन्यासकार की भांति लिखा है. कमी की कोई गुंजाइश कहीं नज़र नहीं आती]

शशिकांत मिश्रा भाई माफ कीजिएगा की किताब एक बैठकी में नहीं दो बैठकी में पढ़ पाया.. लेकिन यकीन मानिए लगा नहीं की एक बार में नहीं पढ़ा है. खैर सीधे मुद्दे पर आते हैं. कोई माई का लाल नहीं कह सकता कि ये आपका पहला उपन्यास है. जैसे-जैसे पन्ने आगे बढ़ते गए.. कहानी के किरदार हवा में तैरने लगे... किताब के बाहर निकल कर संजय, राहुल, शालू, श्याम भैया सब एक चेहरा अख्तियार करने लगे. ऐसा लगा कि यार ये तो अपने कई दोस्तों की अपनी कहानी है जिन्हें मैं बेहद करीब से जानता हूं. हो सकता है ऐसा बिहारी होने की वजह से लग रहा हो. क्योंकि हर दूसरा बिहार आईएएस या आईपीएस बनने का ही सपना ढोता रहता है जबतक उसका चांस खत्म ना हो जाए. कहानी का क्लाइमैक्स बिल्कुल किसी बॉलीवुड की कहानी की तरह बेहद तेज़ गति से भागता हुआ पूरा हुआ. पूरी कहानी ने कहीं भी सांस लेने का मौका दिया. कहीं से भी नहीं लगा कि यार ये चार लाइनें फालतू की लिखी हैं या फिर ये वाला वाक्या ज़बरदस्ती शशि भाई ने घुसा दिया है. मेरा तो मानना है कि भइया इतने पर आपकी लेखनी रुकने नहीं वाली है. तो भाइयों जल्दी से खरीदीए नॉन रेज़ीडेंट बिहारी और मज़ा लीजिए एक शानदार कहानी का. अगर आप बिहारी नहीं भी हैं तो भी कोई बात नहीं कहानी का मज़ा आपको उतना ही मिलेगा जितना की किसी बिहारी को

Tuesday, January 05, 2016

पठानकोट एयरबेस के भीतर आतंकियों का 'अपना' कौन था ?

एयरबेस में किसने की आतंकियों की मदद ?

सवाल सुनकर आप चौक सकते हैं. चौकना वाज़िब भी है लेकिन ये सवाल है बेहद गहरा क्योंकि जिन आर्मी कैंप्स/एयरबेसेज़/नेवल बेसेज़ में घुसना तो छोड़िए पास फटकना तक आम आदमी के लिए मुश्किल होता है, वहां आतंकी ना सिर्फ पहुंचे हैं, ना सिर्फ घुसपैठ की है बल्कि हमारे जवानों को मार भी दिया. ऐसे में ये सवाल उठना लाज़मी है कि कहीं ऐसा तो नहीं की एयरबेस के भीतर आतंकियों की मदद के लिए कोई मौजूद था. रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने आज कहा कि आतंकियों ने जिन सामानों का इस्तेमाल किया उनमें से कई पाकिस्तान मेड थे. तो क्या बाकी का सामान मेड इन इंडिया था. अगर ऐसा था तो ज़ाहिर है कोई ना कोई था जिसने आतंकियों के लिए ना सिर्फ उनकी ज़रूरत का सामान मुहैया कराया बल्कि उन्हें एयरबेस के भीतर घुसने में भी मदद की

50 किलो गोली, भारी मात्रा में हैंडग्रेनेड और बाकी सामान लेकर आतंकी कैसे घुसे ?

अब ज़रा आप सोचिए कि भले ही किसी को कितनी भी ट्रेनिंग दी गयी हो. भले ही वो कितना भी भारी वज़न उठा सकता हो लेकिन वो इतनी आसानी से एयरबेस तो छोड़िए किसी रिहायशी इलाके में भी नहीं घुस सकता जहां पर सुरक्षा के इंतज़ाम बिल्कुल नहीं हों. ऐसे में इतना गोला बारूद, एके 47 राइफल, ग्रेनेड लॉन्चर, पचास किलो गोली, 100 से ज्यादा हैंडग्रेनेड और साथ में खाने पीने का सामान लेकर वो एयरबेस जैसी बेहद सुरक्षित जगह पर घुस कैसे गए. ऐसा तभी हो सकता है जब आतंकियों का कोई अपना एयरबेस के भीतर मौजूद हो. बिना विभीषण के तो राम भी लंका में नहीं घुस पाए थे तो ज़ाहिर है आतंकियों का कोई ना कोई मददगार एयरबेस के भीतर था जिसने इतनी बड़ी आतंकी कार्रवाई में मदद की

रक्षा मंत्री ने भी मानी सुरक्षा में है भारी कमी

पठानकोट एयरबेस का दौरा करके रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर जब मीडिया से मुखातिब हुए तो उन्होंने माना की सुरक्षा में गैप्स हैं यानि सुरक्षा कमियां हैं. यहां पर सवाल ये भी है कि अगर रक्षा मंत्री जो की एक सिविलियन हैं उन्हें सिर्फ दौरा करके लग गया कि एयरबेस की सुरक्षा में कमियां हैं तो वहां पर मौजूद सेना के अधिकारियों को ये बात क्यों नहीं समझ में आयी. जिन लोगों के सिर पर एयरबेस की सुरक्षा की ज़िम्मेदारियां हैं क्या उन्हें लूप होल्स नज़र नहीं आए. अगर ऐसा है तो फिर ऐसे नकारा अफसरों को इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी कैसे दी गयी. इसकी जांच की जानी चाहिए और अगर ऐसी लापरवाही या चूक पायी जाती है तो उन्हें कोर्ट मार्शल कर देना चाहिए. क्योंकि इनकी वजह से ही हमारे 7 जवान शहीद हो गए. नकारा अधिकारियों की कमी का खामियाज़ा हमारे उन बहादुर सैनिकों को भुगतना पड़ा जो आतंकियों के मंसूबों को नाकाम करने में सबसे आगे थे

क्या गुरदासपुर एसपी उस वक्त पार्टी मनाने गए थे ?

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने पंजाब पुलिस की भूमिका पर बोलने से मना कर दिया लेकिन इससे पंजाब पुलिस की नाकबलियत छुप नहीं सकती. पहला बड़ा सवाल उठता है गुरदासपुर के एसपी सलविंदर सिंह पर. क्या एसपी जैसे स्तर के अधिकारी इतने सक्षम नहीं हैं कि जब वो गश्त पर हों या फिर कहीं जा रहे हों तो उन्हें कोई भी हथियारबंद शख्स रोक ले.. पिटाई करे... मोबाइल छीन ले... ड्राइवर की हत्या कर दे और वो बच जाएं. बात हज़म नहीं होती.. बकौल एसपी आतंकी आर्मी के यूनिफॉर्म में थे. इसीलिए उन्होंने अपनी गाड़ी रोक दी. यहां पर कई सवाल उठते हैं..

सवाल नंबर 1 - अगर एसपी पठानकोट के गांव कठुआ पहुंचे थे, वो भी अपनी निजी गाड़ी पर तो उन्होंने अपने साथ जवानों को साथ लेकर जाना मुनासिब क्यों नहीं समझा वो भी तब जब इंटेलीजेंस इनपुट पहले ही मिल चुका था कि आतंकी पठानकोट में घुस चुके हैं

सवाल नंबर 2 - एसपी जैसा अधिकारी बिना किसी हथियार के उस जगह पर क्यों जाता है जो पाकिस्तान बॉर्डर के बेहद करीब है.

सवाल नंबर 3 - 31 दिसंबर की शाम थी, एसपी साहेब के साथ कुक था और उनका एक दोस्त था. मतलब साफ झलकता है कि वो पार्टी करने गए थे. कहीं ऐसा तो नहीं था कि एसपी साहब नशे में थे

पंजाब पुलिस ने एसपी की चेतावनी को गंभीरता से क्यों नहीं लिया ?

नकारापन की हद तो तब नज़र आती है जब एसपी अपने से बड़े अधिकारियों को आपबीती सुनाता है. पूरी घटना बताता है लेकिन पंजाब पुलिस के वो बड़े अधिकारी उसकी बातों को गंभीरता से लेते ही नहीं हैं. अगर पंजाब पुलिस ने अपने एसपी की बात को मानकर फौरन एक्शन लिया होता तो शायद इतनी बड़ी आतंकी घटना नहीं हो पाती. शायद जिन सात बहादुर जवानों को हमने खो दिया वो आज अपने परिवार के साथ होते ना कि उनकी माला लटकी हुई फोटो.

Saturday, January 02, 2016

पठानकोट आतंकी हमले में कैसे हुई कार्रवाई और कहां हुई चूक ?



आतंकी ने मां को बोला कुर्बानी देने जा रहा हूं

सुरक्षा एजेंसियों ने शुक्रवार की रात कुछ फोन कॉल्स इंटरसेप्ट किए जिनसे पाकिस्तान बात की गयी. इन फोन कॉल्स से पता चला कि आतंकवादियों का एक ग्रुप पंजाब के पठानकोट में हमले की तैयारी कर रहा है. कुल चार फोन कॉल किए गए जिनमें से तीन पाकिस्तान में बैठे उन हैंडलर्स को किए गए जो इस आतंकी हमले की कमान संभाले बैठे थे. आतंकियों ने अपने आकाओं को बताया कि उन्होंने पंजाब के सीनियर पुलिस ऑफिसर पर हमला किया है. चौथी कॉल एक आतंकी ने अपनी मां को किया जिसमें उसने कहां कि वो कुर्बानी देने जा रहा है, इस पर उसकी मां ने कहा कि पहले वो खाना खा ले फिर जो काम उसे करने के लिए भेजा गया है वो करे.

आतंकियों ने पठानकोट के एसपी पर हमला किया, गाड़ी-मोबाइल छीना

गुरुवार को आतंकियों ने एसपी पर हमला किया था. आतंकी आर्मी की यूनिफॉर्म में थे. उन्होंने एसपी पर हमला किया, आधिकारिक गाड़ी से धक्का देकर गिरा दिया, मोबाइल छीन लिया. इसी मोबाइल से बाद में उन्होंने पाकिस्तान फोन किया था. आतंकियों के आका ने उन्हें एसपी को छोड़ देने पर डांटा भी कि उन्होंने एसीपी को क्यों जाने दिया.

आतंकियों की मोबाइल बातचीत को भारतीय एजेंसियों ने इंटरसेप्ट किया

मोबाइल इंटरसेप्ट्स ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी. फौरन अलर्ट जारी किया गया. नेशनल सिक्योरिटी एडवाइज़र अजित डोभाल को बताया गया. एनएसए ने फौरन सुरक्षा अधिकारियों के साथ मीटिंग की. पीएमओ को भी इस बारे में बताया गया और फिर वहां से आदेश लिए गए. एनएसजी और आर्मी की स्पेशल फोर्सेज़ को फौरन पठानकोट के अलग-अलग इलाकों में भेजा गया.

एयरफोर्स के गरुड़ कमांडो, एनएसजी और आर्मी की स्पेशल फोर्स तैनात की गयी

सुबह के करीब 3.30 बजे आतंकियों ने एयरबेस पर हमला किया. एयरफोर्स के दो जवान और एक गरुण कमांडो उनके हमले में शहीद हो गए. चूंकि आतंकियों की मूवमेंट की जानकारी पहले ही मिल चुकी थी इसलिए उन्हें एयरबेस के एक इलाके में घेर लिया गया. लेकिन घुप्प अंधेरा होने की वजह से दिक्कत आ रही थी.

थर्मल इमेजिंग की मदद से घुप्प अंधेरे में खोजे गए आतंकी

फौरन एयरफोर्स ने MI 35 हेलीकॉप्टर्स और इज़रायल से मिले UAV हेरोन को उड़ाया. दोनों में ही बेहद ताकतवर थर्मल इमेजिंग सेंसर्स लगे हुए हैं. इन दोनों की मदद से घुप्प अंधेरे में भी चार आतंकियों को खोज निकाला गया और फिर सुरक्षाबलों ने उन्हें मार गिराया. पांचवां आतंकी किसी तरह भागने में कामयाब हो गया लेकिन बाद में उसे भी ढूंढ कर मार गिराया गया. जिसेक बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने ये ट्वीट करके कि सभी पांच आतंकियों को मार गिराया गया, ऑपरेशन के खत्म होने की घोषणा की

24 घंटे पहले आतंकियों की जानकारी थी तो हमला रोका क्यों नहीं गया ?

लेकिन यहां पर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं कि अगर सुरक्षाबलों को पहले से जानकारी मिल चुकी थी आतंकी पठानकोट में घुस चुके हैं और हमला करने वाले हैं तो फिर हमले को रोका क्यों नहीं गया. अगर सुरक्षा एजेंसियों को इस बात की जानकारी मिल चुकी थी कि आतंकियों ने एसपी के मोबाइल के ज़रिए अपने आकाओं से क्या बात की. तो फिर उनकी लोकेशन क्यों नहीं ट्रैक की गयी. क्यों नहीं हमले के पहले ही उन्हें मार गिराया गया. क्या जानकारी के बावजूद सुरक्षाबल उनके हमले के इंतज़ार में बैठे रहे. और सबसे बड़ा सवाल कि अगर तैयारी पूरी थी आतंकियों से निपटने की तो फिर हमारे तीन जवानों की जान क्यों गयी.

[ये सारी बातें जो इनपुट्स मिली हैं उनके हिसाब से लिखी गयी हैं, हो सकता इसमें कुछ तथ्यात्मक सुधार बाद में किए जाएं]