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Thursday, December 24, 2015

क्या मुसलमान वाकई असहिष्णु हैं ?

सहिष्णु मुसलमान, असहिष्णु मुसलमान

ब्रुनेई के सुल्तान ने मुसलमानों को क्रिसमस ना मनाने का आदेश दिया, दूसरे धर्मों के लोगों को अगर यहां क्रिसमस मनाना है तो उन्हें सरकार से मंज़ूरी लेनी होगी... सोमालिया में भी सरकार ने क्रिसमस मनाने पर बैन कर दिया है और कहा है कि क्रिसमस का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है.. इसलिए यहां पर ये नहीं मनाया जाएगा...

अब इस पर भी लोग यही कहेंगे कि इन आदेशों का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है... अरे भई नहीं है तो इस तरह का बैन क्यों... अगर ऐसा ही कुछ उन देशों में कर दिया जाए जहां मुसलमान अल्पसंख्यक हैं... तो वहां दंगे होने लगेंगे... मानवाधिकार वाले जूलुस निकालने लगेंगे... सेकुलर लोग अपना अवॉर्ड वापस करने लगेंगे.. देश असहिष्णु हो जाएगा...

सवाल यहां पर ये पैदा होता है कि ऐसा क्यों है, क्यों मुसलमानों पर ये लेबल चस्पा होता जा रहा है कि वो चरमपंथी हैं, असहिष्णु हैं. पूरी दुनिया में इस्लाम की छवि एक ऐसे धर्म के तौर पर बन गयी है जिसे मार-काट करने, आधुनिकता के साथ ना चलने, अपनी ज़िद पर रहने की आदत सी हो गयी है. और ये सब इसलिए हो रहा है कि क्योंकि कई जगहों पर ऐसे वाक्ये हुए हैं जिनसे लोगों के ज़ेहन में ये धारणा और मज़बूत होती जा रही है.

अब ब्रुनेई और सोमालिया इस्लामिक बहुल देश हैं. ब्रुनेई में ईसाई 10 फीसदी और बौद्ध करीब 13 फीसदी हैं, ज़ाहिर है 10 फीसदी ही सही लेकिन ब्रुनेई में ईसाईयों की आबादी ठीक-ठाक है, बावजूद इसके ऐसा फैसला लिया गया है. और वजह बतायी गयी है कि ये देश के मुस्लिम समुदाय के विश्वास के लिए खतरा है, यही नहीं किसी भी तरह के धार्मिक चिन्हों के पहनने, प्रदर्शन और सेलिब्रेशन पर भी बैन है. सोमालिया में दूसरे धर्मों के लोगों की संख्या ना के बराबर है फिर भी यहां क्रिसमस और नए साल के जश्न पर बैन लगा दिया गया है

तो इसका मतलब ये हुआ कि जहां पर मुसलमान बहुसंख्यक हैं वहां पर उनके हिसाब से देश चलता है, लेकिन जहां पर अल्पसंख्यक हैं वहां पर वो दूसरे धर्म के बहुसंख्यक को अपने हिसाब से देश को चलाने नहीं देते. तर्क ये है कि उनकी बातें भी मानी  जाएंगी और ऐसा ना होने पर हिंसा आम बात है. मसलन अगर हिंदुस्तान की बात करें तो क्या यहां पर ऐसा कोई आदेश दिया जा सकता है. जवाब है  नहीं.. कभी नहीं..

अभी कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र में मीट पर बैन लगाया गया था, सिर्फ दो या तीन दिनों की बात थी लेकिन इतना हंगामा हुआ कि पूछिए मत. मुसलमानों को किसी धार्मिक त्योहार को बैन तो छोड़िए उसमें कोई छोटे-मोटे बदलाव आप नहीं कर सकते भले ही आप बहुसंख्यक हैं और मुसलमान अल्पसंख्यक. जहां पर मुसलमान बहुसंख्यक हैं वहां पर वो जो मर्ज़ी आए वो कर सकते हैं.

असहिष्णुता की मात्रा मुसलमानों में थोड़ी ज्यादा है ये तो मैं मानता हूं. लेकिन ब्रुनेई और सोमालिया में जो हुआ वो कुछ ज्यादा ही है. लेकिन परेशानी ये है कि जैसे ही इस पर बहस शुरु होगी, हमारे मुसलामान  बुद्धिजीवी इसे गलत ठहराते हुए इस्लाम को किनारे कर देंगे और कहेंगे कि ये उन देशों की दिक्कत है ना कि इस्लाम की. ये ठीक वैसा ही है कि इस्लामिक संगठन ISIS के लिए कहते हैं कि उनका इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है

मेरा मानना है कि ऐसा होना भी नहीं चाहिए. बहुसंख्यक होने का मतलब ये नहीं है कि आपके मन में जो आएगा आप करेंगे. एक धर्म को दूसरे धर्म की इज्ज़त करनी चाहिए ना कि उसका अपमान. हिंदुस्तान में जितने धूम-धाम से दीवाली मनायी जाती है उतने ही धूम-धाम से ईद भी. सही तरीका भी यही है साथ रहने का.