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Wednesday, December 30, 2015

ऐ साला कौन बोला रे.. बिहार में जंगलराज

बिहार में रिटर्न ऑफ जंगलराज

वैसे ये कहना अभी जल्दबाज़ी है, लेकिन भविष्य के बारे में बात करना तो जल्दबाज़ी नहीं ही है. बिहार चुनाव में बड़ा ज़बरदस्त नारा चला था एक बार फिर से नीतीशे... नीतीश जी आएं... मुख्यमंत्री बनें... बिहार के लोगों ने जनादेश दिया है उसका सम्मान किया जाना चाहिए. लेकिन सम्मान उन्हें भी करना चाहिए जिनके हाथों में इस वक्त सत्ता की बागडोर है. 

दरअसल बिहार में इस बार रिटर्न ऑफ नीतीश कुमार नहीं हुआ है बल्कि रिटर्न ऑफ लालू यादव हुआ है. और लालू यादव के शासन काल को यही नीतीश कुमार जी अपने मुखारविंदु से एक दो बार नहीं हज़ार बार जंगलराज कह चुके हैं. खैर ये तो बीते वक्त की बात हो गयी. नए निज़ाम में नीतीश जी थोड़े असहाय नज़र आ रहे हैं. क्राइम के ग्राफ में एकाएक इज़ाफा होने लगा है. जिन सड़कों पर लोग रात में किसी भी वक्त सफर करने में हिचकते नहीं थे अब शाम सात-आठ बजते ही घरों में दुबक जाते हैं. 

अब सवाल ये है कि आखिर लोगों के दिलों में वो पुराना डर एक बार क्यों हावी होता चला जा रहा है. क्यों लॉ एंड ऑर्डर पर लोगों को भरोसा एक बार फिर वही पुराने वक्त जैसा हो गया है जिसे जंगलराज का नाम दिया गया था. मैं बिहार में जहां का निवासी हूं वहां कभी कभार ही सुनने को मिलता था कि कोई अपराध हुआ है. अपराध होते भी थे तो छोटे-मोटे, लेकिन पिछले एक महीने में वहां मर्डर की दो वारदातें, राह चलते लोगों से बाइक छीन लेने, उन्हें लूट लेने की 7-8 वारदातें, किडनैपिंग की दो वारदातें हुई हैं. ज़ाहिर है ऐसे वाक्ये डराने के लिए काफी है. और ये सब किसी शहर में नहीं हुआ है बल्कि छोटे से चौक जिसे हमारे यहां मोड़ कहा जाता है वहां हुआ है. तो ज़रा आप ही अंदाज़ा लगा लीजिए की पूरे ज़िले या फिर पूरे बिहार का हाल क्या हो गया है या क्या हो सकता है.

पिछले कुछ सालों से लोगों के ज़ेहन से ये डर निकल चुका था. ऐसा नहीं था कि अपराध होने बंद हो गए थे लेकिन उनमें ज़बरदस्त कमी ज़रूर आयी थी. व्यवसायियों में भी डर बैठा हुआ है. कहीं ना कहीं से रंगदारी की डिमांड आ ही जा रही है. भई किसे अपनी जान की चिंता नहीं है. अपने बच्चों को बिहार से निकाल कर दूसरे राज्यों में भेजने का सिलसिला एक बार फिर शुरु हो चुका है जो कभी लालू राज में हुआ करता था. 

ज़ाहिर है ऐसे संकेत बिहार के लिए अच्छे नहीं हैं. बिहार जिस राह पर पिछले कुछ सालों से चलना शुरु हुआ था वो राह उसे आगे ले जा रही थी. उसे मज़बूत और प्रगतिशील बना रही थी. बिहारियों को भी लगने लगा था कि चलो यार वापस अपने गांव अपने शहर चलते हैं. वहीं पर कुछ करेंगे. परदेस को आखिर परदेस ही है लेकिन एक बार फिर उन्हें अपने विचारों को थामना पड़ रहा है. एक बार फिर उन्हें मन मसोस कर रह जाना पड़ रहा है. बिहार और बिहारियों की छवि दूसरे राज्यों में धीर-धीरे बदलनी शुरु हुई थी वो एक बार फिर से पुराने रंग में रंगनी शुरु हो चुकी है.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश जी से आग्रह है कि बिहार को जंगलराज से बचाएं. जिस जंगलराज से बचने के लिए जनता ने आपको सत्ता की चाभी सौंपी थी उसे गुम ना करें क्योंकि ये चाभी आजीवन तो आपके दी नहीं गयी है जहां दशकों तक बिहार की जनता ने जंगलराज सहा है वहां पांच साल और सही. 


Thursday, December 24, 2015

क्या मुसलमान वाकई असहिष्णु हैं ?

सहिष्णु मुसलमान, असहिष्णु मुसलमान

ब्रुनेई के सुल्तान ने मुसलमानों को क्रिसमस ना मनाने का आदेश दिया, दूसरे धर्मों के लोगों को अगर यहां क्रिसमस मनाना है तो उन्हें सरकार से मंज़ूरी लेनी होगी... सोमालिया में भी सरकार ने क्रिसमस मनाने पर बैन कर दिया है और कहा है कि क्रिसमस का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है.. इसलिए यहां पर ये नहीं मनाया जाएगा...

अब इस पर भी लोग यही कहेंगे कि इन आदेशों का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है... अरे भई नहीं है तो इस तरह का बैन क्यों... अगर ऐसा ही कुछ उन देशों में कर दिया जाए जहां मुसलमान अल्पसंख्यक हैं... तो वहां दंगे होने लगेंगे... मानवाधिकार वाले जूलुस निकालने लगेंगे... सेकुलर लोग अपना अवॉर्ड वापस करने लगेंगे.. देश असहिष्णु हो जाएगा...

सवाल यहां पर ये पैदा होता है कि ऐसा क्यों है, क्यों मुसलमानों पर ये लेबल चस्पा होता जा रहा है कि वो चरमपंथी हैं, असहिष्णु हैं. पूरी दुनिया में इस्लाम की छवि एक ऐसे धर्म के तौर पर बन गयी है जिसे मार-काट करने, आधुनिकता के साथ ना चलने, अपनी ज़िद पर रहने की आदत सी हो गयी है. और ये सब इसलिए हो रहा है कि क्योंकि कई जगहों पर ऐसे वाक्ये हुए हैं जिनसे लोगों के ज़ेहन में ये धारणा और मज़बूत होती जा रही है.

अब ब्रुनेई और सोमालिया इस्लामिक बहुल देश हैं. ब्रुनेई में ईसाई 10 फीसदी और बौद्ध करीब 13 फीसदी हैं, ज़ाहिर है 10 फीसदी ही सही लेकिन ब्रुनेई में ईसाईयों की आबादी ठीक-ठाक है, बावजूद इसके ऐसा फैसला लिया गया है. और वजह बतायी गयी है कि ये देश के मुस्लिम समुदाय के विश्वास के लिए खतरा है, यही नहीं किसी भी तरह के धार्मिक चिन्हों के पहनने, प्रदर्शन और सेलिब्रेशन पर भी बैन है. सोमालिया में दूसरे धर्मों के लोगों की संख्या ना के बराबर है फिर भी यहां क्रिसमस और नए साल के जश्न पर बैन लगा दिया गया है

तो इसका मतलब ये हुआ कि जहां पर मुसलमान बहुसंख्यक हैं वहां पर उनके हिसाब से देश चलता है, लेकिन जहां पर अल्पसंख्यक हैं वहां पर वो दूसरे धर्म के बहुसंख्यक को अपने हिसाब से देश को चलाने नहीं देते. तर्क ये है कि उनकी बातें भी मानी  जाएंगी और ऐसा ना होने पर हिंसा आम बात है. मसलन अगर हिंदुस्तान की बात करें तो क्या यहां पर ऐसा कोई आदेश दिया जा सकता है. जवाब है  नहीं.. कभी नहीं..

अभी कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र में मीट पर बैन लगाया गया था, सिर्फ दो या तीन दिनों की बात थी लेकिन इतना हंगामा हुआ कि पूछिए मत. मुसलमानों को किसी धार्मिक त्योहार को बैन तो छोड़िए उसमें कोई छोटे-मोटे बदलाव आप नहीं कर सकते भले ही आप बहुसंख्यक हैं और मुसलमान अल्पसंख्यक. जहां पर मुसलमान बहुसंख्यक हैं वहां पर वो जो मर्ज़ी आए वो कर सकते हैं.

असहिष्णुता की मात्रा मुसलमानों में थोड़ी ज्यादा है ये तो मैं मानता हूं. लेकिन ब्रुनेई और सोमालिया में जो हुआ वो कुछ ज्यादा ही है. लेकिन परेशानी ये है कि जैसे ही इस पर बहस शुरु होगी, हमारे मुसलामान  बुद्धिजीवी इसे गलत ठहराते हुए इस्लाम को किनारे कर देंगे और कहेंगे कि ये उन देशों की दिक्कत है ना कि इस्लाम की. ये ठीक वैसा ही है कि इस्लामिक संगठन ISIS के लिए कहते हैं कि उनका इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है

मेरा मानना है कि ऐसा होना भी नहीं चाहिए. बहुसंख्यक होने का मतलब ये नहीं है कि आपके मन में जो आएगा आप करेंगे. एक धर्म को दूसरे धर्म की इज्ज़त करनी चाहिए ना कि उसका अपमान. हिंदुस्तान में जितने धूम-धाम से दीवाली मनायी जाती है उतने ही धूम-धाम से ईद भी. सही तरीका भी यही है साथ रहने का.








Tuesday, December 22, 2015

छोटी मीडिया, बड़ी कहानियां पार्ट - 1

चैनल हेड, मैडम एंकर और बेचारा कॉपी एडिटर


शीटीवी बैंगलोर में कॉपी एडिटर के पद पर काम करता राजेश अपना काम खत्म करके कंप्यूटर बंद ही करने वाला था कि तभी उसने देखा कि उसके चैनल की तेज़तर्रार एंकर मटकती हुई आयी और आते ही धड़धड़ा कर बोलना शुरु कर दिया... 

राजेश जी आज तो नाइट शिफ्ट में आपको रूकना पड़ेगा.. 

रूकना पड़ेगा.. लेकिन क्यों...

वो नाइट शिफ्ट के एंकर की तबीयत खराब हो गयी ना... तो आज नहीं आ रहा... इसलिए आपको डबल शिफ्ट करनी पड़ेगी.. 

नहीं-नहीं मैं कैसे करूंगा... वो तो तुम्हारा रीलिवर है... डेज़ीगनेटेड एंकर तो तुम हो... मैं तो शौकिया करता हूं.. और हां इसके लिए मुझे पैसे भी नहीं मिलते हैं... 

राजेश तुम्हें रूकना तो पड़ेगा... मैं बहुत थक गयी हूं... डबल शिफ्ट नहीं कर सकती... 

मैडम ऐसा है... मैं नहीं रूकूंगा... स्टोरी भी लिखो... बुलेटिन भी निकालों और फिर जाकर एंकरिंग भी करो... एक शिफ्ट में इससे ज्यादा काम नहीं कर सकता और आपने गिनती के सिर्फ 4 बुलेटिन किए हैं... 

अरे ऐसे कैसे नहीं रूकोगे... मैं बॉस से बात करती हूं... 

हां-हां जाओ कर लो... बॉस कहेंगे तब भी नहीं रूकूंगा... रिक्वेस्ट करती तो रूक भी जाता लेकिन तुम जो कि मेरी जूनियर होकर... बॉस बनने की कोशिश कर रही हो... बॉस के करीब हो इसका मतलब ये नहीं की तुम ही बॉस हो... 

जैसे ही एंकर मैडम ने ये बातें सुनीं... रोना शुरु कर दिया.. डेस्क पर मौजूद लोग भी हैरान रह गए... हद तो तब हो गयी जब मैडम ने रोते-रोते आउटपुट हेड को फोन किया... और पूरी रामकहानी बतायी... मैडम ने जैसे ही फोन रखा... वैसे ही डेस्क इंचार्ट रामेश्वर जी का फोन बजना शुरु हुआ... 

जी सर... 

हां सर... 

ठीक है सर.. मैं बोलता हूं... 

हां सर... बिल्कुल सर...  पक्का सर... 

राजेश... यार कर ले नाइट शिफ्ट...बॉस कह रहे हैं... 

सर.. बिल्कुल नहीं... कैसी बात कर रहे हैं आप.. आपको समझ में तो आ रहा है ना कि यहां पर क्या हो रहा है... 

हां यार राजेश.. मैं समझ रहा हूं... लेकिन छोड़ ना यार.. मैं तुझसे सीनियर हूं ना.. मेरी बात मान ले... कर ले डबल शिफ्ट...नहीं तो तुझे नाइट शिफ्ट में डालने का फरमान बॉस ने सुनाया है... 

सर... डाल दो नाइट शिफ्ट में.. वो मंज़ूर है.. लेकिन आज तो डबल शिफ्ट नहीं करूंगा... 

इतना कहकर राजेश ने अपना सिस्टम बंद किया.. बैग उठाया... और ऑफिस से निकलकर बस स्टॉप पर पहुंच गया... ज़ाहिर है वो अगले दिन से अनिश्चितकाल तक नाइट शिफ्ट करने का मन बना चुका था... 

करीब दो हफ्ते बाद.. राजेश ने सोचा कि घर हो आया जाए... इसलिए उसने छुट्टी की अर्ज़ी लिखी और अपने डेस्क इंचार्च को थमा दिया... 

अबे 15 दिनों के लिए जाएगा... 

अरे सर.. साल भर में एक बार जाता हूं... 4 दिन तो आने जाने में लग जाते हैं.. अब साल में एक बार जाऊंगा तो 10 दिन भी ना रहा घर पर.. तो घरवाले क्या कहेंगे... 

अच्छा ठीक है.. लेकिन इस पर तो बॉस के ही साइन होंगे... 

हां तो आप करवा लेना ना... मैं तो नाइट में हूं... दिन में फिर रूकना पड़ेगा... 

अगले दिन राजेश का ऑफ था... रात करीब 8 बजे उसके डेस्क इंचार्ज का फोन आया... उनका कहना था कि बॉस ने कहा है कि अगली रात जब वो ऑफिस आए तो दिन में मिलकर जाए.. छुट्टियों वाली अर्ज़ी पर बात करनी है... 

राजेश ने नाइट शिफ्ट की और फिर रुका रहा...जो  बॉस रोज़ाना सुबह 10 बजे ऑफिस आ जाता था.. उस दिन वो दोपहर दो बजे आया... अपना सामान अपने केबिन में रखकर वो डेस्क की ओर आया... राजेश को बोला कि वीओ रूम में आओ... 

तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे आदेश को ना मानने की... 

राजेश ने जैसे ही वीओ रूम का दरवाज़ा बंद किया... बॉस की दहाड़ती हुई आवाज़ आयी... 

नहीं सर ऐसा कुछ भी नहीं है... आप गलत समझ रहे हैं... मैं कॉपी एडिटर हूं.. दिन भर स्टोरीज़ लिखता हूं... बुलेटिन भी निकालता हूं.. और साथ में एक शो भी एंकर करता हूं.. जबकि चुगली मैडम तो सिर्फ एंकरिंग करती हैं... और उस दिन तो शायद 4 बुलेटिन ही किए थे... इसलिए मैंने ऐसा कहा... 

तुम जानते नहीं हो मुझे... तुम्हारा करियर बर्बाद कर दूंगा... कहीं के नहीं रहोगे तुम... 

सर... आप मुझसे ऐसे नहीं बात कर सकते... मैंने कोई क्राइम नहीं किया है... मैनेजमेंट के नियमों के मुताबिक मैंने कोई गलती नहीं की है... डेज़ीगनेटेड एंकर का रीलिवर अगर नहीं आया तो... एंकर को ही डबल शिफ्ट करनी होती है.. ना कि मेरे जैसे काम चलाऊ एंकर को... 

तुम मुझसे बहस कर रहे हो.. तुम जानते नहीं हो मेरी पहुंच कहां है... और.. और.. तुम मुझे नियम समझा रहे हो... देखता हूं तुम कहीं और नौकरी कैसे करते हो... ये छुट्टी लेकर जो तुम नौकरी खोजने जा रहे हो ना... वहां नौकरी करने नहीं दूंगा.. सिर्फ 5 दिन की छुट्टी मिलेगी.. इससे ज्यादा नहीं...

सर.. चार दिन तो घर आने जाने में लग जाते हैं...एक साल बाद जा रहा हूं.. एक दिन के लिए क्या करने जाऊंगा.. 

तो मत जाओ.. मैं तुम्हारा बॉस हूं.. और पांच दिन की ही छुट्टी मंज़ूर करूंगा... इतना कहकर बॉस ने दरवाज़ा खोला और बाहर निकल गया... बाहर एंकर मैडम तो जैसे उन्हीं के इंतज़ार में खड़ी थीं... चुगली... इधर मेरे केबिन में आओ... शाम के बुलेटिन के सिलसिले में डिसक्स करना है... चुगली  कुमारी मुस्कुराते हुए बॉस के पीछे चल पड़ी... 

एक महीने बाद डेस्क वालों को पता चला कि बॉस की विदाई हो गयी है... साथ में एंकर मोहतरमा चुगली कुमारी की नौकरी भी चली गयी है... दोनों को ऑफिस की गाड़ी में किसी बाज़ार में पकड़ा गया था... 

डेस्क वालों को ये भी पता चला कि... राजेश ने सीधे कंपनी के जनरल मैनेजर से छुट्टी की गुहार लगायी... पूरी कहानी बतायी... जीएम ने टाइम ऑफिस से जब राजेश का रिकॉर्ड मंगाया तो पाया कि उसके खाते में करीब 30 छुट्टियां और 15 दिन के एक्स्ट्रा वर्क पड़े थे... फौरन 30 दिनों की छुट्टी मंज़ूर की गयी.. 


डेस्क वालों की जानकारी में ये भी आया कि राजेश की नौकरी दिल्ली में किसी नेशनल चैनल में हो गयी है... वो वापस लौटकर शीटीवी बैंगलोर कभी नहीं गया... हां.. बाद में उसने चुगली कुमारी को उसी चैनल के चक्कर लगाते देखा.. जिसमें वो काम कर रहा था... ज़ाहिर है... तेज़तर्रार एंकर चुगली कुमारी की दाल यहां तो गलने से रही थी... 

(इस कहानी का किसी भी जीवित या मृत, चालू या बंद चैनल से कोई संबंध नहीं है... ये लेखक की महज़ कोरी कल्पना है.. इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं )

©Alok Ranjan