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Sunday, September 06, 2015

आज़ाद और गुलाम


परिंदों को रोज़ सुबह देखता हूं उड़ते हुए
बच्चों की भूख को खुद भूखा रह कर मिटाते हुए
शाम को जब वो घोंसलों में लौटते हैं थक हार कर
सो जाते हैं आज़ादी की नींद में फिर सुबह उठने के लिए

सुबह-सुबह तो उठता मैं भी हूं परिंदों की तरह
बच्चों की भूख मिटाने खुद भी जाता हूं
शाम को घर तो मैं भी लौटता हूं थक हार कर
रात की नींद हमारी भी आज़ादी वाली होती है

कमीनी अगली सुबह फिर गुलाम होने का अहसास करा जाती है

©Alok Ranjan