मुझसे जुड़ें

Wednesday, December 30, 2015

ऐ साला कौन बोला रे.. बिहार में जंगलराज

बिहार में रिटर्न ऑफ जंगलराज

वैसे ये कहना अभी जल्दबाज़ी है, लेकिन भविष्य के बारे में बात करना तो जल्दबाज़ी नहीं ही है. बिहार चुनाव में बड़ा ज़बरदस्त नारा चला था एक बार फिर से नीतीशे... नीतीश जी आएं... मुख्यमंत्री बनें... बिहार के लोगों ने जनादेश दिया है उसका सम्मान किया जाना चाहिए. लेकिन सम्मान उन्हें भी करना चाहिए जिनके हाथों में इस वक्त सत्ता की बागडोर है. 

दरअसल बिहार में इस बार रिटर्न ऑफ नीतीश कुमार नहीं हुआ है बल्कि रिटर्न ऑफ लालू यादव हुआ है. और लालू यादव के शासन काल को यही नीतीश कुमार जी अपने मुखारविंदु से एक दो बार नहीं हज़ार बार जंगलराज कह चुके हैं. खैर ये तो बीते वक्त की बात हो गयी. नए निज़ाम में नीतीश जी थोड़े असहाय नज़र आ रहे हैं. क्राइम के ग्राफ में एकाएक इज़ाफा होने लगा है. जिन सड़कों पर लोग रात में किसी भी वक्त सफर करने में हिचकते नहीं थे अब शाम सात-आठ बजते ही घरों में दुबक जाते हैं. 

अब सवाल ये है कि आखिर लोगों के दिलों में वो पुराना डर एक बार क्यों हावी होता चला जा रहा है. क्यों लॉ एंड ऑर्डर पर लोगों को भरोसा एक बार फिर वही पुराने वक्त जैसा हो गया है जिसे जंगलराज का नाम दिया गया था. मैं बिहार में जहां का निवासी हूं वहां कभी कभार ही सुनने को मिलता था कि कोई अपराध हुआ है. अपराध होते भी थे तो छोटे-मोटे, लेकिन पिछले एक महीने में वहां मर्डर की दो वारदातें, राह चलते लोगों से बाइक छीन लेने, उन्हें लूट लेने की 7-8 वारदातें, किडनैपिंग की दो वारदातें हुई हैं. ज़ाहिर है ऐसे वाक्ये डराने के लिए काफी है. और ये सब किसी शहर में नहीं हुआ है बल्कि छोटे से चौक जिसे हमारे यहां मोड़ कहा जाता है वहां हुआ है. तो ज़रा आप ही अंदाज़ा लगा लीजिए की पूरे ज़िले या फिर पूरे बिहार का हाल क्या हो गया है या क्या हो सकता है.

पिछले कुछ सालों से लोगों के ज़ेहन से ये डर निकल चुका था. ऐसा नहीं था कि अपराध होने बंद हो गए थे लेकिन उनमें ज़बरदस्त कमी ज़रूर आयी थी. व्यवसायियों में भी डर बैठा हुआ है. कहीं ना कहीं से रंगदारी की डिमांड आ ही जा रही है. भई किसे अपनी जान की चिंता नहीं है. अपने बच्चों को बिहार से निकाल कर दूसरे राज्यों में भेजने का सिलसिला एक बार फिर शुरु हो चुका है जो कभी लालू राज में हुआ करता था. 

ज़ाहिर है ऐसे संकेत बिहार के लिए अच्छे नहीं हैं. बिहार जिस राह पर पिछले कुछ सालों से चलना शुरु हुआ था वो राह उसे आगे ले जा रही थी. उसे मज़बूत और प्रगतिशील बना रही थी. बिहारियों को भी लगने लगा था कि चलो यार वापस अपने गांव अपने शहर चलते हैं. वहीं पर कुछ करेंगे. परदेस को आखिर परदेस ही है लेकिन एक बार फिर उन्हें अपने विचारों को थामना पड़ रहा है. एक बार फिर उन्हें मन मसोस कर रह जाना पड़ रहा है. बिहार और बिहारियों की छवि दूसरे राज्यों में धीर-धीरे बदलनी शुरु हुई थी वो एक बार फिर से पुराने रंग में रंगनी शुरु हो चुकी है.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश जी से आग्रह है कि बिहार को जंगलराज से बचाएं. जिस जंगलराज से बचने के लिए जनता ने आपको सत्ता की चाभी सौंपी थी उसे गुम ना करें क्योंकि ये चाभी आजीवन तो आपके दी नहीं गयी है जहां दशकों तक बिहार की जनता ने जंगलराज सहा है वहां पांच साल और सही. 


Thursday, December 24, 2015

क्या मुसलमान वाकई असहिष्णु हैं ?

सहिष्णु मुसलमान, असहिष्णु मुसलमान

ब्रुनेई के सुल्तान ने मुसलमानों को क्रिसमस ना मनाने का आदेश दिया, दूसरे धर्मों के लोगों को अगर यहां क्रिसमस मनाना है तो उन्हें सरकार से मंज़ूरी लेनी होगी... सोमालिया में भी सरकार ने क्रिसमस मनाने पर बैन कर दिया है और कहा है कि क्रिसमस का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है.. इसलिए यहां पर ये नहीं मनाया जाएगा...

अब इस पर भी लोग यही कहेंगे कि इन आदेशों का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है... अरे भई नहीं है तो इस तरह का बैन क्यों... अगर ऐसा ही कुछ उन देशों में कर दिया जाए जहां मुसलमान अल्पसंख्यक हैं... तो वहां दंगे होने लगेंगे... मानवाधिकार वाले जूलुस निकालने लगेंगे... सेकुलर लोग अपना अवॉर्ड वापस करने लगेंगे.. देश असहिष्णु हो जाएगा...

सवाल यहां पर ये पैदा होता है कि ऐसा क्यों है, क्यों मुसलमानों पर ये लेबल चस्पा होता जा रहा है कि वो चरमपंथी हैं, असहिष्णु हैं. पूरी दुनिया में इस्लाम की छवि एक ऐसे धर्म के तौर पर बन गयी है जिसे मार-काट करने, आधुनिकता के साथ ना चलने, अपनी ज़िद पर रहने की आदत सी हो गयी है. और ये सब इसलिए हो रहा है कि क्योंकि कई जगहों पर ऐसे वाक्ये हुए हैं जिनसे लोगों के ज़ेहन में ये धारणा और मज़बूत होती जा रही है.

अब ब्रुनेई और सोमालिया इस्लामिक बहुल देश हैं. ब्रुनेई में ईसाई 10 फीसदी और बौद्ध करीब 13 फीसदी हैं, ज़ाहिर है 10 फीसदी ही सही लेकिन ब्रुनेई में ईसाईयों की आबादी ठीक-ठाक है, बावजूद इसके ऐसा फैसला लिया गया है. और वजह बतायी गयी है कि ये देश के मुस्लिम समुदाय के विश्वास के लिए खतरा है, यही नहीं किसी भी तरह के धार्मिक चिन्हों के पहनने, प्रदर्शन और सेलिब्रेशन पर भी बैन है. सोमालिया में दूसरे धर्मों के लोगों की संख्या ना के बराबर है फिर भी यहां क्रिसमस और नए साल के जश्न पर बैन लगा दिया गया है

तो इसका मतलब ये हुआ कि जहां पर मुसलमान बहुसंख्यक हैं वहां पर उनके हिसाब से देश चलता है, लेकिन जहां पर अल्पसंख्यक हैं वहां पर वो दूसरे धर्म के बहुसंख्यक को अपने हिसाब से देश को चलाने नहीं देते. तर्क ये है कि उनकी बातें भी मानी  जाएंगी और ऐसा ना होने पर हिंसा आम बात है. मसलन अगर हिंदुस्तान की बात करें तो क्या यहां पर ऐसा कोई आदेश दिया जा सकता है. जवाब है  नहीं.. कभी नहीं..

अभी कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र में मीट पर बैन लगाया गया था, सिर्फ दो या तीन दिनों की बात थी लेकिन इतना हंगामा हुआ कि पूछिए मत. मुसलमानों को किसी धार्मिक त्योहार को बैन तो छोड़िए उसमें कोई छोटे-मोटे बदलाव आप नहीं कर सकते भले ही आप बहुसंख्यक हैं और मुसलमान अल्पसंख्यक. जहां पर मुसलमान बहुसंख्यक हैं वहां पर वो जो मर्ज़ी आए वो कर सकते हैं.

असहिष्णुता की मात्रा मुसलमानों में थोड़ी ज्यादा है ये तो मैं मानता हूं. लेकिन ब्रुनेई और सोमालिया में जो हुआ वो कुछ ज्यादा ही है. लेकिन परेशानी ये है कि जैसे ही इस पर बहस शुरु होगी, हमारे मुसलामान  बुद्धिजीवी इसे गलत ठहराते हुए इस्लाम को किनारे कर देंगे और कहेंगे कि ये उन देशों की दिक्कत है ना कि इस्लाम की. ये ठीक वैसा ही है कि इस्लामिक संगठन ISIS के लिए कहते हैं कि उनका इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है

मेरा मानना है कि ऐसा होना भी नहीं चाहिए. बहुसंख्यक होने का मतलब ये नहीं है कि आपके मन में जो आएगा आप करेंगे. एक धर्म को दूसरे धर्म की इज्ज़त करनी चाहिए ना कि उसका अपमान. हिंदुस्तान में जितने धूम-धाम से दीवाली मनायी जाती है उतने ही धूम-धाम से ईद भी. सही तरीका भी यही है साथ रहने का.








Tuesday, December 22, 2015

छोटी मीडिया, बड़ी कहानियां पार्ट - 1

चैनल हेड, मैडम एंकर और बेचारा कॉपी एडिटर


शीटीवी बैंगलोर में कॉपी एडिटर के पद पर काम करता राजेश अपना काम खत्म करके कंप्यूटर बंद ही करने वाला था कि तभी उसने देखा कि उसके चैनल की तेज़तर्रार एंकर मटकती हुई आयी और आते ही धड़धड़ा कर बोलना शुरु कर दिया... 

राजेश जी आज तो नाइट शिफ्ट में आपको रूकना पड़ेगा.. 

रूकना पड़ेगा.. लेकिन क्यों...

वो नाइट शिफ्ट के एंकर की तबीयत खराब हो गयी ना... तो आज नहीं आ रहा... इसलिए आपको डबल शिफ्ट करनी पड़ेगी.. 

नहीं-नहीं मैं कैसे करूंगा... वो तो तुम्हारा रीलिवर है... डेज़ीगनेटेड एंकर तो तुम हो... मैं तो शौकिया करता हूं.. और हां इसके लिए मुझे पैसे भी नहीं मिलते हैं... 

राजेश तुम्हें रूकना तो पड़ेगा... मैं बहुत थक गयी हूं... डबल शिफ्ट नहीं कर सकती... 

मैडम ऐसा है... मैं नहीं रूकूंगा... स्टोरी भी लिखो... बुलेटिन भी निकालों और फिर जाकर एंकरिंग भी करो... एक शिफ्ट में इससे ज्यादा काम नहीं कर सकता और आपने गिनती के सिर्फ 4 बुलेटिन किए हैं... 

अरे ऐसे कैसे नहीं रूकोगे... मैं बॉस से बात करती हूं... 

हां-हां जाओ कर लो... बॉस कहेंगे तब भी नहीं रूकूंगा... रिक्वेस्ट करती तो रूक भी जाता लेकिन तुम जो कि मेरी जूनियर होकर... बॉस बनने की कोशिश कर रही हो... बॉस के करीब हो इसका मतलब ये नहीं की तुम ही बॉस हो... 

जैसे ही एंकर मैडम ने ये बातें सुनीं... रोना शुरु कर दिया.. डेस्क पर मौजूद लोग भी हैरान रह गए... हद तो तब हो गयी जब मैडम ने रोते-रोते आउटपुट हेड को फोन किया... और पूरी रामकहानी बतायी... मैडम ने जैसे ही फोन रखा... वैसे ही डेस्क इंचार्ट रामेश्वर जी का फोन बजना शुरु हुआ... 

जी सर... 

हां सर... 

ठीक है सर.. मैं बोलता हूं... 

हां सर... बिल्कुल सर...  पक्का सर... 

राजेश... यार कर ले नाइट शिफ्ट...बॉस कह रहे हैं... 

सर.. बिल्कुल नहीं... कैसी बात कर रहे हैं आप.. आपको समझ में तो आ रहा है ना कि यहां पर क्या हो रहा है... 

हां यार राजेश.. मैं समझ रहा हूं... लेकिन छोड़ ना यार.. मैं तुझसे सीनियर हूं ना.. मेरी बात मान ले... कर ले डबल शिफ्ट...नहीं तो तुझे नाइट शिफ्ट में डालने का फरमान बॉस ने सुनाया है... 

सर... डाल दो नाइट शिफ्ट में.. वो मंज़ूर है.. लेकिन आज तो डबल शिफ्ट नहीं करूंगा... 

इतना कहकर राजेश ने अपना सिस्टम बंद किया.. बैग उठाया... और ऑफिस से निकलकर बस स्टॉप पर पहुंच गया... ज़ाहिर है वो अगले दिन से अनिश्चितकाल तक नाइट शिफ्ट करने का मन बना चुका था... 

करीब दो हफ्ते बाद.. राजेश ने सोचा कि घर हो आया जाए... इसलिए उसने छुट्टी की अर्ज़ी लिखी और अपने डेस्क इंचार्च को थमा दिया... 

अबे 15 दिनों के लिए जाएगा... 

अरे सर.. साल भर में एक बार जाता हूं... 4 दिन तो आने जाने में लग जाते हैं.. अब साल में एक बार जाऊंगा तो 10 दिन भी ना रहा घर पर.. तो घरवाले क्या कहेंगे... 

अच्छा ठीक है.. लेकिन इस पर तो बॉस के ही साइन होंगे... 

हां तो आप करवा लेना ना... मैं तो नाइट में हूं... दिन में फिर रूकना पड़ेगा... 

अगले दिन राजेश का ऑफ था... रात करीब 8 बजे उसके डेस्क इंचार्ज का फोन आया... उनका कहना था कि बॉस ने कहा है कि अगली रात जब वो ऑफिस आए तो दिन में मिलकर जाए.. छुट्टियों वाली अर्ज़ी पर बात करनी है... 

राजेश ने नाइट शिफ्ट की और फिर रुका रहा...जो  बॉस रोज़ाना सुबह 10 बजे ऑफिस आ जाता था.. उस दिन वो दोपहर दो बजे आया... अपना सामान अपने केबिन में रखकर वो डेस्क की ओर आया... राजेश को बोला कि वीओ रूम में आओ... 

तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे आदेश को ना मानने की... 

राजेश ने जैसे ही वीओ रूम का दरवाज़ा बंद किया... बॉस की दहाड़ती हुई आवाज़ आयी... 

नहीं सर ऐसा कुछ भी नहीं है... आप गलत समझ रहे हैं... मैं कॉपी एडिटर हूं.. दिन भर स्टोरीज़ लिखता हूं... बुलेटिन भी निकालता हूं.. और साथ में एक शो भी एंकर करता हूं.. जबकि चुगली मैडम तो सिर्फ एंकरिंग करती हैं... और उस दिन तो शायद 4 बुलेटिन ही किए थे... इसलिए मैंने ऐसा कहा... 

तुम जानते नहीं हो मुझे... तुम्हारा करियर बर्बाद कर दूंगा... कहीं के नहीं रहोगे तुम... 

सर... आप मुझसे ऐसे नहीं बात कर सकते... मैंने कोई क्राइम नहीं किया है... मैनेजमेंट के नियमों के मुताबिक मैंने कोई गलती नहीं की है... डेज़ीगनेटेड एंकर का रीलिवर अगर नहीं आया तो... एंकर को ही डबल शिफ्ट करनी होती है.. ना कि मेरे जैसे काम चलाऊ एंकर को... 

तुम मुझसे बहस कर रहे हो.. तुम जानते नहीं हो मेरी पहुंच कहां है... और.. और.. तुम मुझे नियम समझा रहे हो... देखता हूं तुम कहीं और नौकरी कैसे करते हो... ये छुट्टी लेकर जो तुम नौकरी खोजने जा रहे हो ना... वहां नौकरी करने नहीं दूंगा.. सिर्फ 5 दिन की छुट्टी मिलेगी.. इससे ज्यादा नहीं...

सर.. चार दिन तो घर आने जाने में लग जाते हैं...एक साल बाद जा रहा हूं.. एक दिन के लिए क्या करने जाऊंगा.. 

तो मत जाओ.. मैं तुम्हारा बॉस हूं.. और पांच दिन की ही छुट्टी मंज़ूर करूंगा... इतना कहकर बॉस ने दरवाज़ा खोला और बाहर निकल गया... बाहर एंकर मैडम तो जैसे उन्हीं के इंतज़ार में खड़ी थीं... चुगली... इधर मेरे केबिन में आओ... शाम के बुलेटिन के सिलसिले में डिसक्स करना है... चुगली  कुमारी मुस्कुराते हुए बॉस के पीछे चल पड़ी... 

एक महीने बाद डेस्क वालों को पता चला कि बॉस की विदाई हो गयी है... साथ में एंकर मोहतरमा चुगली कुमारी की नौकरी भी चली गयी है... दोनों को ऑफिस की गाड़ी में किसी बाज़ार में पकड़ा गया था... 

डेस्क वालों को ये भी पता चला कि... राजेश ने सीधे कंपनी के जनरल मैनेजर से छुट्टी की गुहार लगायी... पूरी कहानी बतायी... जीएम ने टाइम ऑफिस से जब राजेश का रिकॉर्ड मंगाया तो पाया कि उसके खाते में करीब 30 छुट्टियां और 15 दिन के एक्स्ट्रा वर्क पड़े थे... फौरन 30 दिनों की छुट्टी मंज़ूर की गयी.. 


डेस्क वालों की जानकारी में ये भी आया कि राजेश की नौकरी दिल्ली में किसी नेशनल चैनल में हो गयी है... वो वापस लौटकर शीटीवी बैंगलोर कभी नहीं गया... हां.. बाद में उसने चुगली कुमारी को उसी चैनल के चक्कर लगाते देखा.. जिसमें वो काम कर रहा था... ज़ाहिर है... तेज़तर्रार एंकर चुगली कुमारी की दाल यहां तो गलने से रही थी... 

(इस कहानी का किसी भी जीवित या मृत, चालू या बंद चैनल से कोई संबंध नहीं है... ये लेखक की महज़ कोरी कल्पना है.. इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं )

©Alok Ranjan

Sunday, October 18, 2015

मज़हब के नाम पर लड़ा जाएगा तीसरा विश्वयुद्ध

हमारी धरती ने यूं तो कई लड़ाईयां देखीं.. कई जंगों में हज़ारों लोगों को मरते देखा... छिटपुट लड़ाईयां अभी भी चल ही रही हैं... छिटपुट इसलिए क्योंकि ये सारी जंगें दो विश्वयुद्धों की बराबरी नहीं कर सकतीं.. लेकिन यहां पर एक बड़ा सवाल ये है कि क्या दुनिया एक बार फिर विश्वयुद्ध की तैयारी में जुटी है... और जहां तक मुझे लगता है इस बार तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए नहीं बल्कि धर्म के लिए होगा... मज़हब को बचाने के नाम पर लाखों लोगों की हत्याएं होंगी... धर्म के ठेकेदार नफरत के बीज बोएंगे... और फिर ये नफरत उस स्तर पर पहुंच जाएगी जहां इंसान ही इंसान के खात्मे की ओर अग्रसर हो जाएंगे... इस बार मित्र और शत्रु राष्ट्र एकजुट नहीं होंगे.. बल्कि मित्र और शत्रु धर्म के नाम पर गठबंधन होगा... या यूं कहें की होना शुरु हो चुका है...

दो-दो विश्वयुद्धों के बाद अगर कोई लड़ाई सबसे बड़ी मानी जाती है तो वो है गल्फ वॉर... गल्फ वॉर के बाद से ही दुनिया का एक बार फिर ध्रुवीकरण शुरु हुआ.. उसके बाद इराक.. अफगानिस्तान... लीबिया... सीरिया...और ना जाने तमाम ऐसे देश जहां पर इस ध्रुवीकरण को और ज्यादा मज़बूत.. और ज्यादा फैलाया जा सके... इसके लिए काम किया गया... ISIS जैसे संगठन की पैदाइश कोई रातों रात नहीं हो गयी... इसे एक मकसद के लिए पैदा किया गया है.. और ऐसा भी नहीं है कि इसके पीछे सिर्फ मुस्लिम चरमपंथी गुट ही हो... बल्कि इसके पीछे एक सोची-समझी साज़िश भी हो सकती है... कई विशेषज्ञों का तो यहां तक मानना है कि अमेरिका.. इज़रायल के साथ कई मुस्लिम संगठनों की सांठ-गांठ है ये ISIS...

अब जबकि रूस भी इस जंग में कूद पड़ा है तो समीकरण बदलने लगे हैं... अमेरिका को ये नागवार गुज़र रहा है कि रूस ने उसे सीधी चुनौती दे दी है... विशेषज्ञों की राय पर भी इस पर बंटी हुई है... कई लोगों का ये मानना है कि अगर अमेरिका सहित कई देश मिलकर ISIS पर पिछले लंबे वक्त से हमला कर रहे हैं तो वो अबतक उसे खत्म क्यों नहीं कर पाए हैं... दरअसल मामला यहीं फंसा हुआ है... ISIS सीधे सीरिया की सरकार को चुनौती दे रही है... और कहीं ना कहीं अमेरिका सहित दूसरे पश्चिमी देशों का असद की सरकार को हटाना फायदेमंद होगा.. .लेकिन रूस के इस लड़ाई में शामिल हो जाने के बाद हालात एकदम से बदल गए हैं.. क्योंकि रूस इसमें असद का साथ दे रहा है.. और यही बात अमेरिका को खराब लग रही है... यानि ISIS के बहाने रूस और अमेरिका एक बार फिर आमने सामने हैं...

याद कीजिए दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत कैसे हुई थी... कैसे हिटलर के खिलाफ अमेरिका को जंग में कूदना पड़ा था... लेकिन उस वक्त रूस और अमेरिका एक ही खेमे में थे... दूसरा खेमा था हिटलर का जिसकी महत्वकांक्षा और पहले विश्वयुद्ध की खीझ ने दूसरे विश्वयुद्ध को जन्म दिया... खैर लेकिन अब परिस्थितियां उल्टी हैं... हिटलर की जगह पर इस वक्त आतंकी संगठन ISIS मौजूद है... रूस का आरोप है कि अमेरिका और दूसरे कई देश मिलकर उसे कमज़ोर करने की चाल चल रहे हैं.. और उसमें उन्होंने ISIS को मोहरा बनाया हुआ है...

रूस का तो ये भी आरोप है कि उसके रूपए रूबल को कमज़ोर करने के लिए अमेरिका और सऊदी अरब ने मिलकर कच्चे तेल की कीमतों को कम करने की साज़िश रची... और ऐसा तभी मुमकिन हुआ जब ISIS के कब्ज़े वाले तेल के कुओं से कौड़ियों के दाम पर कच्चा तेल खरीदा गया... जिससे अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें आधी हो गयीं... रुस के लिए परेशानी ये हुई कि उसे कच्चे तेल के उत्पादन में ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ रहे थे... यानि बाज़ार में कच्चा तेल जितने पैसे पर बिक रहा था उससे करीब दूना पैसा रूस को कच्चा तेल निकालने में खर्च करना पड़ रहा था...


अब सवाल ये है कि क्या वाकई दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध की ओर बढ़ रही है... जवाब है हां... युद्ध का मतलब ये नहीं है कि दोनों ओर से मिसाइलें छोड़ी जाएं... गोले बरसाए जाएं... आज के ज़माने में युद्ध का मतलब ये है कि किसी देश को आर्थिक, सामजिक और मज़हबी रुप में इतना कमज़ोर कर दिया जाए कि वो खुद ही खत्म हो जाए... क्योंकि जहां बात धर्म के नाम पर लड़ने और धर्म को बचाने की बात आती है... तो लोग भूखे पेट भी लड़ने को तैयार हो जाते हैं... दरअसल इस्लाम की जो तस्वीर फिलहाल दुनिया को दिखायी जा रही है वो बेहद खतरनाक है... गैर इस्लामी लोगों के दिलों में इस्लाम का नाम आतंक की तरह छपता जा रहा है... यही काम यहूदियों, ईसाइयों और हिंदुओं में भी किया जा रहा है... कट्टरता को हर ओर से बढ़ाया जा रहा है... और धार्मिक कट्टरता जब अपने चरम पर होगी तो आप आसानी से अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वो युद्ध पिछले दोनों विश्वयुद्धों से कितना भयानक और कितना खूंखार होगा... 

Sunday, September 06, 2015

आज़ाद और गुलाम


परिंदों को रोज़ सुबह देखता हूं उड़ते हुए
बच्चों की भूख को खुद भूखा रह कर मिटाते हुए
शाम को जब वो घोंसलों में लौटते हैं थक हार कर
सो जाते हैं आज़ादी की नींद में फिर सुबह उठने के लिए

सुबह-सुबह तो उठता मैं भी हूं परिंदों की तरह
बच्चों की भूख मिटाने खुद भी जाता हूं
शाम को घर तो मैं भी लौटता हूं थक हार कर
रात की नींद हमारी भी आज़ादी वाली होती है

कमीनी अगली सुबह फिर गुलाम होने का अहसास करा जाती है

©Alok Ranjan

नियति


शर्मा जी... शाम को जब घर वापसी के लिए निकलें तो ज़रा मुझे फोन कर लीजिएगा बाज़ार से दो-चार चीज़ें मंगानी हैं... संजना ने अपने पति को उलाहने वाले अंदाज़ में कहा...

जी.. मैडम ज़रूर... लेकिन एक बात बताइए... आज आपका अंदाज़ कुछ बदला-बदला सा क्यों है.. और ताना तो ऐसा मार रही हैं आप... जैसे इससे पहले आपकी कोई बात मानी ही नहीं गयी है...

नहीं नहीं ऐसी बात नहीं है... हर बार तो आपका कोई आदमी घर के सारे काम कर जाता है... लिस्ट आपको भेजती हूं.. सामान कोई और लेकर आता है... लेकिन आज ऐसा नहीं है...आज तो आपको खुद बाज़ार जाकर मेरी कही चीज़ लेकर आनी होगी... क्योंकि मैं नहीं चाहती की पिछली बार की तरह जब आपकी बहनों को मैं गिफ्ट दूं तो आप नाक भौं सिकोड़ों की क्या दे दिया...

हां..हां.. ठीक है... टाइम मिला तो पक्का लेकर आऊंगा... इतना कहकर कमल ने बैग उठाया और ऑफिस के लिए निकल पड़ा...

घर से उसका ऑफिस करीब 10 किलोमीटर दूर था... फोन पर कुछ देखते-देखते अचानक उसकी नज़र साथ में चल रही एक कार पर पड़ी.. उसमें एक बड़ा प्यारा सा बच्चा जीभ निकाल कर उसे चिढ़ाता हुआ दिख गया...

कमल को हंसी आयी.. क्योंकि बचपन में वो भी इतना ही शरारती था... जब भी अपने पापा के साथ वो कहीं जाता..रास्ते पर ऐसी ही हरकतें करता जाता... अपना बचपना याद आते ही होठों पर उसकी एक हल्की सी हंसी आ गयी...

लेकिन शायद ये जेनरेशन का फर्क था.. तभी तो शीशे से झांकता वो बच्चा सिर्फ जीभ चिढ़ाने से ही नहीं रूका... कभी कानों पर हाथ लगाकर चिढ़ाता... कभी गोल-गोल आंखे घुमाकर चिढ़ाता... रास्ते भर वो कमल को चिढ़ाता रहा... बच्चा दिखने में बहुत प्यारा था... कमल और संजना भी अब बच्चा प्लान कर रहे थे.. इसलिए कमल को इस बच्चे में अपना बच्चा नज़र आने लगा... एक ओर कमल उसके चेहरे में अपने बच्चे की सूरत ढूंढ रहा था.. और दूसरी ओर बच्चा अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आ रहा था... चिढ़ाने का सिलसिला जारी था...

कई बार कमल को गुस्सा भी आया कि यार कैसा बच्चा है... क्योंकि जब वो ऐसा करता था तो पापा फौरन डांट देते थे... वो कहते थे कि लोगों को लगना चाहिए कि तुम शरीफों के घर के बच्चे हो... लेकिन कार में बैठे इसके मां-बाप.. हां मां-बाप ही लग रहे हैं... वो इसे ना तो डांट रहे हैं.. और ना ही रोक रहे हैं...

खैर कमल ने अपना ध्यान बच्चे से हटा दिया... क्योंकि वो अपने ऑफिस बस पहुंचने ही वाला था...कार से उतर कर जैसे ही ऑफिस पहुंचा.. तो उसने देखा की दर्जनों लोग उसका इंतज़ार कर रहे थे...

नमस्ते डॉक्टर साहब... प्रणाम डॉक्टर साहब... ना जाने कितने लोगों ने उसे देखकर अभिवादन किया... नर्स फौरन भागती हुई आयी और बोला की सर आज तो क्लिनिक पर बहुत भीड़ है... कमल को एक बार अपने-आप पर फक्र हुआ... आखिर वो शहर का ही क्या...पूरे राज्य का टॉप का कैंसर एक्सपर्ट था... लेकिन फक्र की सिर्फ यही वजह नहीं थी... फक्र इसलिए भी था क्योंकि विदेश की ऐशो आराम की नौकरी छोड़कर उसने अपने शहर में प्रैक्टिस करने का फैसला किया था... अपने पिता की कैंसर से मौत के बाद उसने प्रण लिया था.. कि अब किसी के साथ ऐसा नहीं होने देगा...

सिस्टर... कितने पेशेंट हैं... सर अभी तक तो 37 हैं... एक और पेशेंट अभी थोड़ी देर पहले आया है... लेकिन उसके घरवाले पहले दिखाने की ज़िद कर रहे हैं...

अरे ये क्या बात हुई. और जो लोग सुबह से यहां आकर बैठे हैं... क्या वो ज़रूरतमंद नहीं हैं...

सर.. दरअसल पेशेंट 5 साल का एक बच्चा है... ब्लड कैंसर है उसे... बड़ा प्यारा बच्चा है सर.. पता नहीं भगवान ऐसी नाइंसाफी क्यों कर देता है...

5 साल का बच्चा... ओह हो... चलो ठीक है... उसे ही पहले भेज दो.. देखूं क्या किया जा सकता है...

कमल अंदर जाकर कुर्सी पर बैठा ही था कि दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आयी... और दरवाज़े से झांकता जो चेहरा था... उसे देखते ही कमल को गहरा धक्का लगा...


सामने वही बच्चा था.. जो उसे रास्ते भर चिढ़ाता हुआ जा रहा था.... 

©Alok Ranjan

Wednesday, August 12, 2015

लहू का मज़हब क्या है ?


वो हिंदू हुआ
या मुसलमां हुआ ?

वो हरा हुआ
या भगवा हुआ ?

सुर्ख़ लाल लहू ने पूछा
बता मैं किसका हुआ ?

© Alok Ranjan​

Tuesday, August 04, 2015

पूजा


मां... मुझे दूध चाहिए... तूने दस दिन पहले मुझसे वादा किया था.. कि तू मुझे जल्दी ही दूध लेकर आएगी और पिलाएगी... बुधना ने अपनी मां को उलाहना और याचक का भाव एक साथ लाकर कहा... 

हां बेटा वादा किया तो था... लेकिन क्या करूं... एक तेरा बाप है.. जो दिन भर कमाता है.. और शाम को सारे पैसे अपनी दारू में उड़ा देता है... और पैसे ना होने का गुस्सा मुझपर उतारता है... इधर तू है कि तुझे छटांक भर दूध भी ना मिल पाता है... इतना कहते-कहते रामदुलारी की आंखों से दो आंसू टपक पड़े... 

ऐ मां... चल छोड़.. नहीं पीना मुझे दूध... जो भी खाने को देगी ना मैं खा लूंगा... लेकिन तू रो मत... एक दिन आएगा जब मैं खूब पैसे कमाउंगा तो फिर दूध की कमी नहीं होने दूंगा... बुधना इतना कहकर घर से बाहर निकल गया... 

12 साल की उम्र वाले को ना तो बच्चा कह सकते हैं और ना ही बड़ा... मुफलिसी ने बुधना को कुछ ज्यादा ही  समझदार बना दिया था... बाप को दारू के अलावा कुछ सूझता नहीं था.. एक मां ही थी जो उसका ख्याल रखती थी... लोगों के घरों में झाड़ू-पोछा करके जितना भी कमा पाती थी...उससे घर भी चलाती थी.. और बुधना को पास के सरकारी स्कूल में पढ़ने भी भेजती थी... 

बुधना सड़क पर इधर-उधर देखता हुआ बेवजह घूम तो रहा था.. लेकिन मन में दूध पीने की इच्छा ज़ोर मार रही थी... आज माहौल भी बदला-बदला सा लग रहा था... तभी उसने देखा की थोड़ी दूर आगे एक दूधवाला ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था... मुफ्त में दूध ले लीजिए... मुफ्त में दूध ले लीजिए... बुधना के कानों में जैसे ही ये आवाज़ पड़ी वो फौरन दूधवाले के पास पहुंच गया.. 

दूधवाले भैया... मुझे में दूध दे दो... 

क्यों भई तुझे क्यों दूध दे दूं... दूधवाले ने आंखें तरेरते हुए बुधना से पूछा.. 

अरे आप ही तो कह रहे हो कि मुफ्त में दूध ले लो... तो मुझे क्यों नहीं दे रहे... 

चल भाग जा यहां से... ये दूध भगवान पर चढ़ाने के लिए है... भोलेनाथ को खुश करने के लिए मैंने मुफ्त में उन लोगों को दूध देने का फैसला किया है.. जो मंदिर में जाकर शिवलिंग पर दूध चढ़ाएंगे... और मुझे पुण्य मिलेगा...ये तेरे जैसे भिखारियों के लिए नहीं है.. भाग जा यहां से... 

दूधवाले ने एक तरह से बुधना को धक्का देते हुए हटा दिया...  

दूधवाले भैया... थोड़ा सा दूध दे दो... कई दिनों से बड़ा मन हो रहा था दूध पीने को.. वैसे भी भोलेनाथ पर तो हज़ारों लोग दूध चढ़ा रहे होंगे.. उनका मन तो भर ही जाएगा... अब तो ऐसा लगता है कि मैं दूध का स्वाद भी भूल गया हूं... एक घूंट ही दे दो... ज्यादा नहीं मांगता... 

बुधना बिल्कुल किसी भिखारी की तरह दूधवाले की खुशामद करने लगा... लेकिन दूधवाला एक घूंट भी दूध उसे देने को तैयार नहीं हुआ... लेकिन बुधना वहां से गया नहीं... वो मांगता रहा.. थोड़ी देर में दूध वाले को गुस्सा आ गया उसने दो ज़ोरदार तमाचे बुधना को मारे... थप्पड़ खाते ही बुधना की आंखों के आगे अंधेरा छा गया... रोते-रोते वो वहां से चल गया... 

सड़क पर चहल-पहल ज्यादा थी... बुधना ने देखा की पास का शिव मंदिर बेहद सजा हुआ था... सैकड़ों लोग लोटा लिए मंदिर के बाहर लाइन में लगे हुए थे... लोटे में दूध था.. जिसके हाथ में लोटा नहीं था वो तो सीधे दूध के पैकेट लेकर ही खड़ा था... सबको चिंता इस बात की थी... कि ज्यादा से ज्यादा दूध चढ़ा दें जिससे भगवान शिव खुश हो जाएं.. उनके सारे पाप कट जाएं.. और किस्मत चमक जाए... 

अब बुधना ठहरा 12 साल का जवान होता बच्चा... दिमाग में दूध अभी तक घूम रहा था... इसलिए वो चुपचाप मंदिर के पीछे पहुंच गया... मंदिर के पीछे नाली से दूध की धारा बह रही थी... उसने इधर-उधर देखा... उसे इस बात की यकीन हो गया कि कोई उसे देख नहीं रहा तो चुपके से उसने नाली में बहते दूध को अपनी अंजुली से  उठाया और पी गया... 

आहहहह... कितना शानदार स्वाद है दूूध का... समझ नहीं आता भगवान को इतना दूध चढ़ाते क्यों हैं... भला पत्थर के शिवजी दूध पीते कैसे होंगे...सारा दूध तो नाले में जाकर गिर रहा है... और अगर भगवान पीते भी होंगे तो.. पेट तो उनका कब का भर गया होगा.. और दूध पीना उन्होंने बंद कर दिया होगा... इसीलिए दूध नाली से बहकर निकल रहा है... ये सब सोचते-सोचते उसने दूसरी बार नाली से दूध निकाल कर पी लिया... और आंखें मूंद कर वो दूध के स्वाद को अपने ज़ेहन पर बिठाने लगा... शायद दो मिनट ही हुए होंगे कि तभी एक चिल्लाती हुई आवा़ज आयी... 

अरे इस भिखारी ने तो भगवान का दूध जूठा कर दिया... अनर्थ हो गया... पकड़ो इसे... 

बुधना की आंखें खुली तो उसने देखा कई लोग उसकी ओर भागे आ रहे हैं... और जब तक वो कुछ सोच-समझ पाता उसके ऊपर लात-घूंसों की बरसात हो गयी... कहां दो मिनट पहले वो दूध का स्वाद ज़ेहन पर चस्पा कर रहा था और कहां अब लात-घूंसों का स्वाद चखना पड़ रहा था... 

उधर कैलाश पर्वत पर बैठे भगवान शिव देवी पार्वती से कह रहे थे कि देखो ना कलियुग ने उन्हें कितना संकुचित और बेबस कर दिया है कि.. वो धरती पर होते इस अत्याचार के खिलाफ कुछ भी नहीं कर सकते... कैलाश पर्वत की सीमा से बाहर जाना भी अब उनके लिए मुमकिन नहीं है... 

Thursday, July 30, 2015

पहले इस जनसंख्या बम को तो काबू में कर लें


ए भाई बेहद चिंता वाली खबर आ रही है. यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक 2050 तक भारत इस दुनिया का सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश बन जाएगा... चीन को पीछे छोड़ते हुए हम सबसे ज्यादा आबादी वाली नंबर एक की कुर्सी पर बैठ जाएंगे... रिपोर्ट के मुताबिक तो ये भी बात सामने आ रही है कि अगले सात सालों में ही हम चीन को पीछे छोड़ देंगे...

- जनसंख्या में भारत 2022 में ही चीन को पीछे छोड़ देगा

- 2015 से 2050 तक बढ़ने वाली जनसंख्या में आधे से ज्यादा का योगदान भारत, नाइजीरिया, पाकिस्तान, कांगो, इथोपिया, तंजानिया, अमेरिका, इंडोनेशिया और युगांडा का होगा

- यूनाइटेड नेशंस की इस रिपोर्ट के मुताबिक 35 साल के भीतर इस दुनिया की जनसंख्या करीब 2 अरब 40 करोड़ बढ़ जाएगी

- साल 2050 तक दुनियाभर में 9 अरब 70 करोड़ लोग हो जाएंगे

- साल 2100 तक तो दुनिया की जनसंख्या 11 अरब 20 करोड़ को भी पार कर जाने की बात कही गयी है

- 2050 तक अफ्रीका के 28 देशों की जनसंख्या दोगुनी हो जाएगी

- 35 साल के भीतर नाइजीरिया की जनसंख्या अमेरिका से भी ज्यादा हो जाएगी

CHANGING OF THE GUARD: THE TOP FIVE MOST POPULATED COUNTRIES

                   2015 2050 2100

1. China – 1.4million 1. India – 1.7million 1. India – 1.7million
2. India – 1.3million 2. China – 1.3million 2. China – 1.0million
3. USA – 322,000 3. Nigeria – 399,000 3. Nigeria – 752,000
4. Indonesia – 258,000         4. USA – 389,000 4. USA – 450,000
5. Brazil – 208,000 5. Indonesia – 322,000 5. DR Congo – 389,000
                 
कहने का मतलब ये है कि इतनी सारी योजनाओं के बाद भी हमारी जनसंख्या काबू में नहीं आ रही, ऐसा ही जारी रहा तो वो दिन दूर नहीं जब संसाधनों के लिए जंग छिड़ जाएगी, रोटी इतनी महंगी हो जाएगी कि गरीबों में भूखमरी के हालात पैदा हो जाएंगे, उत्पादन उन अनुपात में नहीं हो पाएगा जिस अनुपात में हमारी जनता को चाहिए, तो जागो हिंदुस्तानियों जागो, वरना ये ना कहना कि इसकी गलती भी सरकार की ही है




                 


Monday, July 27, 2015

शहादत


आज फिर कुछ घरों के चूल्हे चुप हैं...
आज फिर कुछ मांगों के सिंदूर धुल गए हैं...
आज फिर कुछ बापों के कलेजे छलनी हुए हैं...
आज फिर कुछ सहमी निगाहें अपने पापा को देख रही हैं...
सवाल है इन डरी-डरी आंखों में.....
पापा चुप-चाप क्यों सो रहे हैं....
मम्मी की आंखें पथराई सी क्यों हैं...
दादाजी के कंधे इतने उतरे से क्यों हैं...
दादी के आंसू क्यों नहीं रुक रहे...
कुछ लोगों को उधऱ कोने में कहते सुना है...
मेरे पापा अमर हो गए हैं....
मेरे पापा शहीद हो गए हैं...
छोटी बहन मुझसे पूछती है....

भइया... ये शहीद होना क्या होता है... 

©Alok Ranjan

Sunday, July 19, 2015

सासंदों की सब्सिडी और जनता का शपथ अभियान


यूं तो हमारी आदत है कि हम जनता के साथ ही रहते हैं... उनकी आवाज़ों को अपना मानते हैं... उनकी हांक में हांक मिलाते हैं... लेकिन इस बार ज़रा हम सटक गए हैं... थोड़ा सा बिदक गए हैं... मतलब ये कि भाई साहब भेड़ चाल में शामिल होने पर अब हमें थोड़ा-थोड़ा एतराज़ होने लगा है... दरअसल मियां कुछ बात यूं हो गयी कि पिछले कुछ दिनों से फेसबुक से लेकर व्हाट्स एप तक.. लोगों ने बात-बात पर शपथ लेनी शुरु कर दी है... हम शपथ लेते हैं कि ब्ला-ब्ला-ब्ला-ब्ला... और फिर जहां एक बार शपथ लेने की परंपरा शुरु होती है... उसके पीछे-पीछे जनता टूट पड़ती है... अब मियां उन्हें कौन समझाए कि भाई ज़रा देख लो... सोच लो... समझ लो... अब देखिए ना... महीने में चार एक्स्ट्रा मेहमान अगर घर पर आ जाएं और उन्हें खिलाना पिलाना पड़े तो भाई बजट का लाल रंग का बजर घों-घों करके बजने लगता है... और खुदा ना खास्ता कोई पर्व-त्योहार आ जाए तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा हो जाता है... ऐसा ही कुछ हमारे माननीय सांसदों के साथ हो रहा है...

कहने का मतबल ये है कि पिछले 68 सालों से एक सिस्टम बना है... अब ये सिस्टम काहे बना.. क्यों बना... इसके पीछे की अपनी वजहें हैं... लेकिन सिस्टम बना हुआ है... हालांकि ये भी ठीक है कि वक्त के साथ सिस्टम में थोड़ा बदलाव होना चाहिए... लेकिन सिस्टम अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रहा है... वैसे तुलना की जाए तो हमारे सांसदों का वेतन उतना नहीं है... जितना दुनिया के कई देशों में है... लेकिन यहां पर ये भी है कि हमारे सांसदों को जितनी सुविधाएं (सब्सिडी) मिलती है उतनी और कहीं नहीं मिलती... खैर बात हो रही थी सांसदों के वेतन की... ब्रिटेन में एक सांसद को बेसिक वेतन के तौर पर करीब 64 हज़ार पाउंड यानि भारतीय रुपए में कहें तो करीब 63 लाख रुपए मिलते हैं... सिंगापुर में ये रकम करीब 20 हज़ार डॉलर यानि करीब 12 लाख रुपए है... अमेरिका में तो करीब एक करोड़ है...

देश
सांसदों का कुल वेतन (रुपए)
प्रति व्यक्ति आय (रुपए)
भारत
35 लाख
99 हजार
इटली
1.11 करोड़
12 लाख
जापान
1.64 करोड़
1.05 करोड़
न्यूजीलैंड
71.58 लाख
15.51 लाख
अमेरिका
1.07 करोड़
26.98 लाख
फ्रांस
52 लाख
14.62 लाख
जर्मनी
73 लाख
21.96 लाख
आयरलैंड
73 लाख
22.50 लाख
यूके
65 लाख
20.83 लाख
ऑस्ट्रेलिया
1.19 करोड़
39.24 लाख

हालांकि मैं यहां पर सांसदों की तनख्वाह बढ़ाने या फिर उनको मिल रही सब्सिडी को जायज़ ठहराने की कोशिश बिल्कुल भी नहीं कर रहा... मेरा तो मानना है कि भाई रोज़ का रोना छोड़ो कोई मुकम्मल उपाय कर दो... जैसे की हमारी नौकरी में है... भाई आपकी सैलरी फिक्स है... फिर आप उसका जिस तरह से इस्तेमाल करना चाहें कर सकते हैं... घर पर रोज़ लोगों को बुलाइए पार्टी दीजिए.. या फिर चुपचाप अपना घर चलाइए... लेकिन चूंकि हमारे सांसद ऐसा नहीं कर सकते.. क्योंकि अगर उनके घर या दफ्तर पर पहुंचा एक भी आदमी हमारी शादियों में फूफाजी/चाचाजी/बाबाजी की तरह बिना चाय पिए बिदक गया तो समझ लीजिए 5-10 वोट तो उसके गए... इसलिए बेचारे सांसद को अपने यहां आए हर किसी को चाय-पानी और खाने के लिए पूछना ही पड़ेगा... अपने क्षेत्र के लोगों को वो कत्तई मना नहीं कर सकता... अब उस बेचारे की भी अपनी मजबूरी है... आखिर वोट के लिए तो उसे अपनी जनता के बीच भी जाना पड़ेगा... अमूमन जनता इस बात को याद नहीं रखती की सांसद जी ने सड़क बनवाने का वादा जो किया था वो अब तक पूरा नहीं हुआ है... लेकिन ये ज़रूर याद रखती है कि सांसद जी के यहां गए थे तो चाय भी नहीं पिलाया...


वैसे ये बात भी अलग नहीं है कि जैसे ही कोई सांसद बनता है... अगले पांच साल में उसकी सुख-समृद्धि और संपत्ति में उछाल शेयर बाज़ार को भी मात दे देता है... और उसके नीचे गिरने का तो सवाल ही नहीं होता.. यहां पर सूचकांक बस ऊपर ही बढ़ता जाता है... एक साहब ने तो मुझे राय दी की क्यों नहीं सरकार सांसदों से सारी सुविधाएं छीन लेती है... और उसके वेतन को कॉरपोरेट कल्चर के हिसाब से फिक्स कर दिया जाए.. और सांसद अपने वेतन के हिसाब से करता रहे खर्चा... वैसे फिर मेरे दिमाग में ये बात आयी कि भाई फिर तो सांसदों को कॉरपोरेट कल्चर के हिसाब से योग्यता भी साबित करनी पड़ेगी... मतलब दसवीं फेल होने पर तो सांसद बनना मुश्किल होगा ना...  

Wednesday, July 15, 2015

इमरान खान की बीवी और बीबीसी की पूर्व प्रेजेंटर फर्ज़ी पत्रकार निकलीं



तो कुल जमा खबर ये मिल रही है कि पाकिस्तानी क्रिकेटर इमरान खान की ताज़ातरीन बेगम साहिबा रेहम खान ने बीबीसी वालों से ही झूठ बोला और फर्ज़ीवाड़ा किया... अब बेचारे बीबीसी वालों ने जांच तब शुरु की जब बेगम साहिबा उन्हें बेवकूफ बना गयीं... रेहम खान की पत्रकारिता की डिग्री फर्ज़ी निकली है... उन्होंने जिस कॉलेज से पत्रकारिता की डिग्री हासिल करने का दावा किया था दरअसल उस कॉलेज ने इससे साफ इंकार कर दिया है कि ऐसा कोई कोर्स वो कराते भी हैं... यही नहीं कॉलेज ने तो इस बात से भी इंकार कर दिया है कि उनके यहां पत्रकारिता भी पढ़ाई जाती है... इमरान खान की बेगम साहिबा ने अपनी वेबसाइट के साथ-साथ बीबीसी को जो दस्तावेज़ दिए थे उनमें कहा गया था कि Broadcast Journalism में पोस्ट ग्रैजुएट कोर्स North Lindsay [sic] College, Scunthorpe, Lincolnshire से किया है... अब जब जांच की गयी तो पता चला कि कॉलेज में इस कोर्स की तो छोड़िए पत्रकारिता की पढ़ाई ही नहीं होती है... वैसे इन मोहतरमा का इतिहास भी इमरान खान से कम नहीं है... मैडम अपने पहले पति पर जो कि ब्रिटेन के जाने माने डॉक्टर हैं उनपर घरेलू हिंसा के आरोप लगा चुकी हैं... इमरान खान की दूसरी पत्नी जेमिमा ने दो बेटे हैं... पहली पत्नी सीता व्हाइट से एक बेटी है... इधर रेहम खान की पहली शादी से तीन बच्चे हैं...

Monday, July 13, 2015

42 की उम्र में 22 के लिएंडर पेस



बढ़ती उम्र क्या होती है ये शायद हमारे टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस को नहीं पता... कोर्ट पर उनकी चुस्ती-फुर्ती आज भी उतनी ही नज़र आती है जितनी 1990 में जूनियर विंबलडन खेलते वक्त दिखाई देती थी... जूनियर विंबलडन के चैंपियन बनने की खबर मुझे तब मिली थी जब मैं 10 साल का था... हमारे घर में अखबार एक दिन की देरी से आता था क्योंकि तब गांव में अखबार का उसी दिन आना किसी जादू से कम नहीं होता था... ठीक तरह से याद नहीं लेकिन शायद आज अखबार था... बचपन से ही खेल का पेज मुझे बेहद आकर्षित करता था... और ब्लैक एंड व्हाइट में लिएंडर पेस की तस्वीर छपी थी... आज रंगीन पेपर में जब उनकी तस्वीर देखी तो 25 साल पुरानी लिएंडर की वहीं तस्वीर आंखों के सामने नाच गयी... उस वक्त उतनी समझ नहीं थी कि विंबलडन जीतने का मतलब क्या होता है.. लेकिन आज पता है कि विंबलडन जीतना किसी भी टेनिस खिलाड़ी के लिए कितना मायने रखता है... पेस 42 के हो चुके हैं... उनके साथ खेलना शुरु करने वाले की खिलाड़ी रिटायरमेंट ले चुके हैं... लेकिन पेस कोर्ट पर अभी भी ना सिर्फ डटे हुए हैं... बल्कि जीतने की भूख अभी भी उतनी ही नज़र आती है जितनी पहले थी... पेस ने ढेरों उतार चढ़ाव देखे.. 21 जून 1999 को डबल्स में वो दुनिया के पहले नंबर के खिलाड़ी बने थे... तब उनका करियर अपनी ऊंचाईयों पर था... और करीब 16 साल बाद उनकी इस वक्त रैंकिंग डबल्स में 27वीं हैं... सुनने में ये बात ज्यादा बड़ी ना लगती हो... लेकिन खेल प्रेमी जानते हैं कि टेनिस में 42 साल की उम्र में भी इस रैंकिंग तक बरकरार रहना कोई छोटी-मोटी बात नहीं है... 1996 के अटलांटा ओलंपिक में पेस ने जब ब्रांज मेडल जीता था तब वो भारत के पहले खिलाड़ी बने जिसने व्यक्तिगत स्पर्धा में चार दशकों बाद मेडल विनर बने थे... क्रिकेट में जिस तरह पिच खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर असर डालती है... उसी तरह टेनिस में भी ये बात बेहद अहम है कि मैच किस तरह के कोर्ट पर खेला जा रहा है... लेकिन पेस के बारे में ये कहा जा सकता है कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वो हार्ड कोर्ट पर खेल रहे हैं.. ग्रास कोर्ट पर या क्ले कोर्ट पर... या फिर कारपेट कोर्ट पर... उन्होंने हर सरफेस वाले कोर्ट पर जीत दर्ज की है... डबल्स में पेस के नाम 8 ग्रैंड स्लैम हैं जबकि मिक्स्ड डबल्स में इस साल के विंबलडन टाइटल को मिलाकर 9 ग्रैंड स्लैम हो चुके हैं,... डबल्स में फ्रेंच ओपन और यूएस ओपन तीन-तीन बार जीते.... जबकि ऑस्ट्रेलियन ओपन और विंबलडन का खिताब एक-एक बार अपने नाम किया... वहीं मिक्स्ड डबल्स में सबसे ज्यादा चार बार विंबलडन का खिताब अपने नाम किया है... ऑस्ट्रेलियन ओपन तीन बार... फ्रेंच और यूएस ओपन एक-एक बार जीता है... यानि कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि भारत में टेनिस का मतलब ही लिएंडर पेस है... और शायद ये पेस का करिश्मा ही है कि आज सानिया मिर्ज़ा... रोहन बोपन्ना... सोमदेव बर्मन.. सुमित नागल जैसे खिलाड़ी भी उन्हीं के नक्शेकदम पर चल रहे हैं... 

Saturday, July 11, 2015

चलो कहीं तो चीन को मात दे पाएं हम



वैसे तो चीन से हम जनसंख्या के साथ-साथ करीब-करीब हर फील्ड में हमेशा पीछे रहते आए हैं... हालांकि ये बात अलग है कि जनसंख्या विस्फोट के मामले में हम निकट भविष्य में चीन को पछाड़ देंगे... लेकिन इसके परिणाम क्या होंगे.. ये आप और हम अच्छी तरह जानते हैं... लेकिन पिछले कुछ साल में या यूं कहें कि पिछले तीन-चार साल में बैडमिंटन में जिस तरह से हमने चीनी चुनौती को धवस्त किया है वो काबिलेगौर है... 2014 के चीन ओपन में ऐसा पहली बार हुआ जब पुरुष और महिला दोनों के सिंगल्स मुकाबलों में भारतीय खिलाड़ियों की जीत हुई... मेन्स सिंगल्स में श्रीकांत किदांबी और महिला सिंगल्स में सायना नेहवाल चैंपियन बने... सायना और श्रीकांत का जीतना इस मायने में भी बेहद अहम है क्योंकि 2003 से लेकर 2013 तक चीन दोनों ही मुकाबलों में कभी नहीं हारा था... 2001 में पुलेला गोपीचंद ने ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप जीती थी... उसके बाद अब तक हुए 14 में से 10 बार ये खिताब चीन के खिलाड़ियों के पास गया है... हालांकि इस साल महिला सिंगल्स में पहली बार अपनी सायना नेहवाल फाइनल में पहुंची लेकिन वो इसे जीत नहीं पायीं... लेकिन इसके बावजूद भी सायना की उपलब्धि इसलिए भी बड़ी थी क्योंकि क्वार्टर फाइनल और सेमीफाइनल में जिस तरह उन्होंने चीनी खिलाड़ियों को हराया उसने चीन में खलबली मचा दी... हालांकि इसकी शुरुआत 2009 में इंडोनेशिया ओपन से ही हो चुकी थी.. जब सायना ने लगातार दो साल तक चीनी खिलाड़ियों सहित दुनिया की दूसरी बड़ी खिलाड़ियों को हराकर खिताब पर कब्ज़ा किया... कुछ दिनों पहले तक सायना दुनिया की नंबर वन खिलाड़ी की कुर्सी पर काबिज़ थी.. जो किसी भी भारतीय शटलर के लिए बड़े ही गर्व की बात है.. फिलहाल सायना की रैंकिंग नंबर दो की है... सायना और श्रीकांत के अलावा इस वक्त भारतीय शटलर्स ने पूरी दुनिया पर अपनी अलग छाप छोड़ रखी है... पी कश्यप के गेम के दीवाने पूरी दुनिया में हो चुके है... उनकी तेज़ी और ताकत दोनों मिलकर उनके खेल को अलग मुकाम पर पहुंचा देते हैं... 2010 दिल्ली कॉमनवेल्थ में ब्रॉन्ज और ग्लासगो 2014 में कश्यप ने गोल्ड जीता... 2012 लंदन ओलंपिक में कश्यप भारत के पहले खिलाड़ी बने जो मेन्स सिंगल्स के क्वार्टर फाइनल तक पहुंचे... क्वार्टर फाइनल में वो दुनिया के पूर्व नंबर एक खिलाड़ी मलेशिया के ली चोंग वेई से हारे... वहीं श्रीकांत किदांबी ने भी दुनिया को ये बताया कि बैडमिंटन में अब भारतीय खिलाड़ियों को कमतर नहीं आंका जा सकता... 2013 से लेकर 2015 तक श्रीकांत ने चार बड़े खिताब अपने नाम किए... थाइलैंड ओपन... चीन ओपन.. स्विस ओपन.. और इंडिया ओपन... फिलहाल श्रीकांत की रैंकिंग तीसरी है.. यानि दुनियाभर में फिलहाल श्रीकांत तीसरे नंबर के खिलाड़ी हैं... जबकि कश्यप की रैंकिंग 10वीं है.. वहीं ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा की चर्चा किए बगैर अपनी बात खत्म करना ठीक नहीं होगा.. दोनों ने अभी कुछ दिनों पहले ही कनाडा ओपन का डबल्स का खिताब जीता है... और फिलहाल उनकी रैंकिंग 13वीं है... पांच पहले तक दुनिया को सिर्फ दो नाम ही याद थे... एक प्रकाश पादुकोण और दूसरे पुलेला गोपीचंद... बैडमिंटन में भारतीय खिलाड़ियों की चुनौती को बहुत हल्के में लिया जाता था...लेकिन पिछले पांच साल में तस्वीर बदल चुकी है...इस वक्त दुनियाभर में बैडमिंटन के खिलाड़ी भारतीय प्लेयर्स को ना सिर्फ बेहद मज़बूत विरोधी मानते हैं.. बल्कि उनका सम्मान भी करते हैं... चीन जैसे देश जिन्हें खेलों की फैक्ट्री का खिताब हासिल है.. वहां भी भारत का बढ़ता कद चर्चा का विषय बना हुआ है... बैडमिंटन में चीनी खिलाड़ियों को सबसे मुश्किल विरोधी कहा जाता है.. सबसे मज़बूत दीवार कहा जाता है.. उस मुश्किल को... उस दीवार को भारतीय खिलाड़ियों ने तोड़ दिया है... बैडमिंटन जैसे खेल में भारतीयों का इस तरह काबिज़ होना ये बताता है कि हमारे देश में अब बैडमिंटन का स्तर कितना ऊपर पहुंच चुका है.. और इसके लिए कम से कम पुलेला गोपीचंद को श्रेय देना तो बनता है... 

Sunday, July 05, 2015

वो इंटरव्यू वाली लड़की पार्ट - 6


कहानी का पांचवां पार्ट यहां पढ़ें
रोहित जब घर पहुंचा तो शादी की तैयारियां ज़ोरों पर थीं... अगले चार दिन में उसकी शादी हो जानी थी... इधर जब से रोहित गया था.. आयशा बड़ी रिज़र्व सी रहने लगी थी.. अपने ब्वॉयफ्रेंड साक्षम के साथ भी उसकी बातचीत बेहद कम हो गयी थी... हालांकि उसके मम्मी पापा को इस बात का ज़रा भी अहसास नहीं था कि वो किस दौर से गुज़र रही थी... आयशा भी खुद समझ नहीं पा रही थी.. कि आखिर ये क्यों हुआ.. और कैसे हुआ... वो बीते हुए कुछ महीनों को याद कर रही थी... कि तभी फोन की घंटी बजी.. देखा तो रोहित का फोन था... 

हाय रोहित सर... कैसे हैं आप.. कैसी चल रही हैं शादी की तैयारियां... 

हे... आयशा .. कैसी हो यार... यहां पर तो तैयारियां ज़ोर शोर से चल रही हैं... पूजा पे पूजा हुए जा रही है... पता नहीं कितनी सारी रस्में हैं.. बिहार में शादियां तो कई दिनों तक चलती हैं ना... तुम बताओ... मिली कहीं जॉब तुम्हें... 

अरे अभी कहां सर... लेकिन हो सकता है कि मिल जाए... आईबीएम से रिस्पांस आया है... परसों इंटरव्यू है... 

अरे यार परसों तो मेरी शादी है... चलो अच्छा है... मुझे पूरा भरोसा है कि तुम्हें वहां जॉब ज़रूर मिल जाएगी... 

हां सर... मुझे भी लग रहा है... चलो सर आप अपनी रस्में निभाओ... मम्मी बुला रही हैं... बाद में बात करती हूं आपसे... 

ओह हो... चलो ठीक है... इतना कहकर रोहित ने फोन काट दिया... रोहित को आयशा का यूं कहना कुछ ठीक नहीं लगा... लेकिन वो जानता था कि उसके और आयशा के बीच जो कुछ भी है... उसके बाद आयशा का उसका फोन उठाना ही काफी है... 

उधर आयशा की आंखें भी डबडबा आयी थीं... वो सोच रही थी..काश कुछ महीने पहले रोहित सर से मुलाकात हो जाती... साक्षम उसका ब्वॉयफ्रेंड ज़रूर है... वो उससे प्यार भी करती है... लेकिन शायद वो बचपने वाला प्यार है... क्योंकि एक तो साक्षम के घरवाले उसके खिलाफ हैं.. दूसरे साक्षम में अभी उतनी मेच्योरिटी नहीं आयी है... जितनी खुद उसमें है... इसलिए दोनों के मेंटल लेवल में भी फर्क है... रोहित के लिए जो कुछ भी वो महसूस कर रही है... वो कुछ खास है... क्योंकि यहां ना सिर्फ दोनों की सोच भी मिलती है.. बल्कि कभी-कभी तो दोनों की बातें भी ज़बान से एक जैसी ही निकलती हैं... 

रात में रोहित का फिर फोन आया... आयशा फोन उठाना तो चाहती थी.. लेकिन किसी तरह दिल पर पत्थऱ रखकर उसने फोन नहीं उठाया... अगले दिन सुबह फिर रोहित का फोन आया... इस बार आयशा फोन को इग्नोर नहीं कर पायी... 

हैलो मैडम... क्या हो गया है... रात को फोन नहीं उठाया..कितनी सारी बातें तुम्हें बतानी थी यार... 

हाय सर... गुड मॉर्निंग... कल तबीयत थोड़ी ठीक नहीं थी... जल्दी सो गयी थी.. इसलिए नहीं उठा पायी... 

अरे हुआ क्या है तुम्हें.. तुम्हारी आवाज़ से तो लग रहा है... तुम्हारी तबीयत अभी भी ठीक नहीं है... 

नहीं सर.. अब तो थोड़ा ठीक है... आयशा ने झूठ बोलते हुए.. अपनी रुलाई को छुपाने की कोशिश की... 

अच्छा चलो शाम को मेरी बारात है... फोन करुंगा.. तबीयत ठीक रही तो उठा लेना... टेक रेस्ट एंड टेक केअर... बाय-बाय

ओके सर बाय-बाय.. और हां कांग्रेट्स... इतना कहकर आयशा ने फोन काट दिया... गला रूंध चुका था... वो ज़ोर-ज़ोर से रोना चाह रही थी... तकिए में सिर छुपा कर थोड़ी देर वो रोती रही... जिससे उसे प्यार हुआ था.. जिसका साथ उसे पिछले कुछ महीनों में अच्छा लगने लगा था... जिसके बारे में सोचते ही उसे लग रहा था कि ये बंदा बिल्कुल परफेक्ट है... अब चंद घंटों में उसकी शादी होने वाली थी... उसे ये भी पता था... कि रोहित को भी उससे प्यार हो गया है.. लेकिन साथ ही उसे ये भी पता था.. कि तीन महीने के प्यार के लिए वो छह महीने पुरानी तय की गयी अपनी शादी नहीं तोड़ सकता... अब कुछ भी नहीं किया जा सकता था... 

तभी आयशा के कानों में उसकी मम्मी की आवाज़ पड़ी... 

अरे आयशा.. तुझे इंटरव्यू के लिए नहीं जाना क्या... नौ बज गए हैं... 11 बजे इंटरव्यू है ना तेरा... कब तैयार होगी.. कब जाएगी... 

ओ शिट... अरे यार मैं अपना इंटरव्यू कैसे भूल सकती हूं... शिट यार... हां मम्मी बस निकल रही हूं... इतना कहते-कहते वो दौड़ते हुए बाथरुम में घुस गयी... 

आयशा जब इंटरव्यू देकर बाहर निकली तो उसके चेहरे पर खुशी साफ झलक रही थी... आईबीएम जैसी बड़ी कंपनी में उसे जॉब मिल गयी थी... लेकिन साथ ही साथ थोड़ा दुख भी था... क्योंकि एक महीने बाद उसे अमेरिका जाना पड़ेगा... कंपनी के ट्रेनिंग प्रोग्राम के तहत उसे 6 महीने अमेरिका में गुज़ारने होंगे... आयशा ने जब पर्स से अपना फोन निकाला तो देखा... रोहित के 10 मिस्ड कॉल पड़े हुए थे... कम से कम 15 एसएमएस थे... फौरन उसे फोन किया... 

उधर से आवाज़ आयी.. अरे कहां हो यार... कब से फोन कर रहा हूं... मैसेज किए.. कोई जवाब नहीं... सबकुछ ठीक है ना... 

हां सर सबकुछ ठीक है... आपकी आवाज़ बहुत कम आ रही है.. शोर बहुत ज्यादा हो रहा है... 

हां यार.. बारात निकल चुकी है... इसीलिए शोर हो रहा है... तुम बताओ... कैसा रहा तुम्हारा इंटरव्यू... जॉब मिली... 

हां सर.. मिल गयी... वहीं तो थी.. इसीलिए आपका फोन उठा नहीं पायी.. और ना ही मैसेज का जवाब देने का ही वक्त मिला... अभी जैसे ही बाहर आयी हूं.. आपको फोन किया... 

अरे... बधाईयां... अब तो मैडम आईबीएम की एंप्लॉयी हो गयीं... बहुत अच्छा.. इसकी भी पार्टी ड्यू रही तुमपर... वापस आता हूं तो पार्टियां लूंगा तुमसे... चलो बारात निकल चुकी है... फिर फोन करूंगा... बाय-बाय.. एंड अगेन कांग्रेच्युलेशन्स... 

थैंक्यू सर... बाय-बाय... इतना कहकर आयशा ने फोन काट दिया.. वो समझ नहीं पा रही थी... कि इतनी अच्छी नौकरी मिलने की खुशी मनाए.. या फिर रोहित की शादी का गम... मन ही मन उसने सोचा.. यार ऐसा क्या है रोहित में.. जिससे वो सिर्फ तीन महीने में ही उसके ना सिर्फ इतना करीब हो गयी.. बल्कि पिछले ढाई साल से चल रहे अफेयर को भी उसने दरकिनार कर दिया... क्यों हो गया उसे रोहित से इतना प्यार... जिन बिहारियों के लिए वो गाली देती थी.. आज उन्हीं में से एक बिहारी से  उसे इतना प्यार कैसे हो सकता है... कुछ ही घंटे बाद उसकी शादी होने वाली है... और इधर उससे प्यार बढ़ता ही जा रहा है... क्या करूं यार.. कुछ समझ नहीं आ रहा.. इतना कहकर उसने ऑटो को हाथ दिया... और कहा.. .

भैया सेक्टर 12 चलना है... चलोगे... 

हां मैडम चलिए बैठिए... 

Saturday, July 04, 2015

वो इंटरव्यू वाली लड़की पार्ट - 5


कहानी का चौथा पार्ट यहां पढ़ें
अगली सुबह जब आयशा की नींद खुली तो उसने देखा रोहित दीवार से टेक लगाए.. अपने मोबाइल पर कुछ कर रहा था... जैसे ही उसने आयशा को देखा उसने कहा...

गुड मॉर्निंग...

गुड मॉर्निंग सर...

आय एम वेरी सॉरी आयशा...पता नहीं ये कैसे हो गया.. आय एम रिएली वेरी सॉरी यार... 

अरे प्लीज़ सॉरी मत बोलिए सर... इट्स ओके... ये बताइए ब्रेकफास्ट में क्या खिला रहे हैं... 

ओहहह... ब्रेड और चाय....

हां.. चलेगा-चलेगा...

फिर दोनों ने ब्रेकफास्ट किया... दोनों चुप थे.. दोनोें एक दूसरे से नज़रें चुरा रहे थे... चाय पीते-पीते रोहित ने कहा.. 

ऑफिस भी तो जाना होगा तुम्हें... 

हां जाना तो है.. लेकिन मन नहीं कर रहा... 

अच्छा अगर मन नहीं कर रहा तो मत जाओ... तुम्हारे एक दिन ना जाने से वहां कुछ बिगड़ने वाला थोड़े ही ना है... 

आप जा रहे हो ऑफिस... आयशा ने चेहरे पर सवालिया निशान बनाते हुए पूछा...

रोहित को ये सवाल थोड़ा अटपटा सा लगा... उसने कहा हां जाना तो पड़ेगा... तुम कहो तो ना जाऊं... 

मेरे कहने से आप ऑफिस नहीं जाओगे.. आयशा ने मुस्कुराते हुए रोहित की आंखों पर अपनी आंखे टिकाती हुई बोली... 

रोहित ने उसकी आंखों में ठीक वैसे ही झांकते हुए कहा.. हां.. बोल कर देखो नहीं जाऊंगा.. 

तो फिर मत जाओ.. इतना कहकर आयशा हंसने लगी... 

रोहित को पहले तो कुछ समझ नहीं आया.. लेकिन जब बात उसके भेजे में घुसी तो वो आयशा के और ज्यादा करीब खिसक गया...

उस दिन रोहित ऑफिस नहीं गया... आयशा ने भी अपने घर फोन करके बहाना मारा कि रात में जिस बर्थडे पार्टी में गयी थी वहां देर हो गयी.. इसलिए वो इधर से ही ऑफिस निकल रही है... शाम को घर आएगी... 

उस दिन ना तो आयशा ही घर से बाहर गयी.. और ना ही रोहित...सर्दियों के दिन थे इसलिए शाम जल्दी घिर आयी.. शाम 6 बजे के करीब रोहित ने आयशा को उसके घर ड्रॉप कर दिया... दोनों के बीच कुछ शुरु हो चुका था.. लेकिन क्या ये प्यार था... या कुछ और... दोनों में से किसी को कुछ भी नहीं पता था... लेकिन हां दोनों इस नए शुरु हुए रिश्ते की गर्माहट और संजीदगी समझ रहे थे... 

हाय रोहित सर... कैसे हैं आप... 

हाय आयशा.. मैं ठीक हूं... तुम बताओ... 

कुछ नहीं सर आज इंटर्नशिप का आखिरी दिन है... एक-दो जगहों पर सीवी डाली है.. कहीं ना कहीं हो ही जाएगा... छोटी मोटी कंपनी में तो मिल ही जाएगी  नौकरी... 

अच्छा... हां.. वो तो मिल ही जाएगी... चलो कैंटीन चलते हैं... चाय पीते हैं... वैसे भी चाय तो तुम्हें कुछ ज्यादा ही पसंद है... रोहित ने रहस्यमयी मुस्कुराहट देते हुए आयशा की ओर देखा... 

आयशा फौरन शर्मा गयी... और बोली हां चलिए... चाय पीते हैं.. वैसे भी आपके साथ ऑफिस में अब ये आखिरी चाय होगी... 

टेबल पर जैसे ही चाय आयी.. अचानक आयशा करीब-करीब उछलते हुए बोली.. 

अरे सर.. आपको तो बर्थडे आने वाला है... 

हां आने तो वाला है.. 

तो आपका बर्थडे कल सेलीब्रेट करते हैं... कल मैं कुछ काम से ऑफिस आउंगी.. उसके बाद आपके साथ ही चलेंगे... काजल और दिव्या को भी बोल देती हूं... आपको ट्रीट देनी पड़ेगी.. क्योंकि अब तो आप बर्थडे अपनी बीवी के साथ मनाओगे... हफ्ते भर में आपकी शादी हो जानी है... 

रोहित ने कहा ठीक है... कल का डन करते हैं फिर... 

अगले दिन आयशा... काजल और दिव्या ने मिलकर रोहित का बर्थडे मनाया... बर्थडे के अगले ही दिन रोहित को घर निकलना था.. आखिर शादी जो थी उसकी...आयशा बेहद खुश नज़र आ रही थी.. लेकिन असल में वो थी नहीं... वो रोना चाहती थी... वो जानती थी.. कि जिस रास्ते वो बढ़ चुकी है.. उस पर उसकी मंज़िल नहीं आएगी... वो कुछ भी कर ले.. लेकिन वो रोहित को नहीं पा सकती... रोहित भी उपर से खुश तो था.. लेकिन मन ही मन उसे भी इस बात का अहसास था.. कि आयशा से दूर होना उसके लिए अब मुश्किल होने वाला है... कुछ तो है कनेक्शन है दोनों के बीच... जिससे वो एक-दूसरे से जुड़ गए हैं...

कहानी का छठा पार्ट यहां पढ़ें