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Thursday, May 31, 2012

हैलो भैया बोल रहे हैं !

बहुत दिनों से सोच रहा था कि कहानी लिखूं... प्लॉट तो कई थे पर आमिर खान के शो सत्यमेव जयते को देखने के बाद बहुत दिनों से सोच की गहराइयों में दफ्न पड़े इस प्लॉट को बाहर निकाला... कोशिश की है लिखने की... लेकिन मेरे साथ-साथ मेरे दोस्तों को भी लगता है कि इस कहानी में कई सवाल अनसुलझे हैं... आखिर तक जाते जाते कहानी टूटती जा रही है... मैं इस पर एक शॉर्ट फिल्म बनाने की सोच रहा हूं... मैं चाहता हूं... इस कहानी में सुधार के लिए आप लोग मुझे सहयोग दें... आपको जहां भी लगता है कि इस कहानी में ये कमी है.. या यहां पर ये होना चाहिए था... प्लीज़ शेयर करें.... शॉर्ट फिल्म बनाने में बेहद मदद मिलेगी... हो सकता है आपके विचारों... आपके सुधारों के साथ फिल्म की स्क्रिप्ट ज्यादा मज़बूत हो जाए... 


(पहला दिन)

राजेश रोज़ की तरह ऑफिस जाने की तैयारी में था.. प्राइवेट कंपनी में काम करने वालों के लिए ये वक्त लड़ाई के किसी मैदान की तरह होता है... सबकुछ जल्दी... फ्रेश होना तो जल्दी होना... नाश्ता करना तो जल्दी करना.... तैयार होना तो जल्दी होना... यानि सबकुछ फटाफट... ऐसा लगता है मानो सुबह-सुबह लोकल ट्रेन सुपर फास्ट में तब्दील हो गई है... खैर राजेश बाथरूम की ओर बढ़ ही रहा था कि मोबाइल की घंटी बजी... राजेश के चेहरे पर गुस्से की झलक साफ नज़र आयी..

ओह हो.. इस वक्त कौन है कमबख्त... यार लोग समझते नहीं हैं कि ऑफिस जाने के वक्त टाइम कहां होता है... पता नहीं लोगों को इसी वक्त फोन करने की चूल क्यों लगी रहती है... स्क्रीन पर कोई अजनबी सा नंबर डिस्प्ले हो रहा था...

हैलो... कौन बोल रहा है...

उधर से किसी ने कुछ भी नहीं बोला... सिर्फ सांसों की आवाज़ें आ रहीं थी...

अरे भइया बोलोगे... या इसी तरह भोले बाबा बनकर सुनते रहोगे... टाइम नहीं है मेरे पास... जल्दी बोलो कौन है ?

दूसरी ओर से तब भी कोई नहीं बोला...

तब तक तो राजेश का पारा बाहर की गर्मी की हदों को तोड़ते हुए डबल हो चुका था... अबे कौन है साले... हरामखोर पक्का ये तुमलोगों की मार्केटिंग का कोई नया फंडा होगा... अरे भइया माफ करो...

फोन को कट करके वो सीधा बाथरूम में भागा... नहा धो कर जब राजेश तैयार हो गया तब उसकी नज़र फिर अपने मोबाइल पर पड़ी... मिस्ड कॉल में चार बार वही नंबर देखा.. राजेश ने सोचा शायद उसके किसी रिश्तेदार का फोन हो... उसने कॉल बैक किया... एक बार, दो बार.. तीन बार.. लेकिन किसी ने उठाया नहीं... खैर राजेश ऑफिस चला गया...

(दूसरा दिन)

अगले दिन सुबह फिर वही ऑफिस जाने की जल्दी... और ठीक उसी टाइम पर मोबाइल की घंटी का बजना... राजेश ने फोन उठाया..

अरे ये तो वही नंबर है... पता नहीं कौन है यार
हैलो..कौन बोल रहा है... अरे कुछ तो बोलो भाई..
हैलो...
हैलो...
अरे जब बोलना नहीं होता तो फोन क्यों करते हो भाई... आइंदा से फोन किया तो अच्छा नहीं होगा... राजेश ने फोन कट कर दिया...

(तीसरा दिन)

हैलो...
हैलो...
हैलो... बोलता क्यों नहीं बे...

(चौथा दिन)

हैलो...
हैलो...
हैलो... अरे गूंगा है क्या साले.. कुछ तो बोल.. हरामी की औलाद...

(पांचवा दिन)

हैलो...
हैलो...
हैलो... तेरी तो... बेहन........मादर......कुत्ते के बच्चे....सूअर... साले.. बोल कुछ तो बोल...

(छठा दिन)

साढ़े आठ बजे... राजेश का वही रोज़ का अफरातफरी वाला आलम... राजेश की नज़र बार-बार मोबाइल की ओर जा रही थी... क्या आज भी फोन की घंटी बजेगी... अगर बजी.. तो आज फोन करने वाले की वो बैंड बजा देगा... छोड़ेगा नहीं.. आज तो बस आर या पार... मोबाइल बजा...

भोस.... के... अबे बोलने में फटती है क्या तेरी... बेहन...बोलता है कि नहीं तू...

उधर से आवाज़ आई...

आप भैया बोल रहे हो क्या ?
क..क...क...कौन ?
आप मेरे भैया बोल रहे हैं ना ?
राजेश उस मासूम आवाज़ को पहचान नहीं पाया... उसे अब अपनी बोली पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी... उसने तो सोचा भी नहीं था कि फोन की दूसरी तरफ कोई बच्चा भी हो सकता है... आवाज़ से तो 7 या 8 साल का लग रहा है.... या फिर उससे भी छोटा लग रहा है...

त...त...त...तुम कौन बोल रहे हो ?

आप मेरे भैया ही हो ना ? बोलो ना...

बच्चे की आवाज़ से लग रहा था.. कि वो किसी छोटे से बंद कमरे से आ रही है... वो बेहद डरा हुआ लग रहा था... उसकी आवाज़ कांप रही थी... ऐसा लग रहा था मानो अगर किसी ने उसे फोन पर बातें करते हुए देख लिया तो कहर टूट पड़ेगा... राजेश ने फिर कहा...

तुम कौन और कहां से बोल रहे हो ? इतने डरे हुए क्यों हो ? बोलो... कौन हो तुम.. और मुझे भैया क्यों कह रहे हो ?

मैं कल इसी वक्त फोन करूंगा... कोई आ रहा है... मैं आपसे ज्यादा देर बात नहीं कर सकता...

फोन कट चुका था... लेकिन राजेश के चेहरे पर हवाईयां उड़ रहीं थी... शायद अपराधबोध भी मन ही मन बढ़ रहा था.. कि पिछले कई दिनों से वो बेहद गंदे तरीके से फोन पर बात कर रहा था... खैर भारी मन से वो ऑफिस चला गया... दिनभर वो उसी बच्चे के बारे में सोचता रहा... कौन है... कहां पर है... वो उसे क्यों फोन करता है... वो चाहता क्या है... ना जाने कितने सवाल राजेश के दिलो-दिमाग में घुमड़ रहे थे... रात को जब घर पहुंचा तब भी उसकी हालत ऐसी ही थी... ऐसा लग रहा था कि जल्दी से वो उस बच्चे की आवाज़ सुन ले... वो उससे सारी बातें पूछ ले... ये सब सोचते-सोचते कब उसकी आंख लग गई पता ही नहीं चला...

(सातवां दिन)

रोज़ आठ बजे उठने वाले राजेश की नींद आज पहले खुल गई.. वो खुद हैरान था कि उसे क्या हो गया है... अभी तो सुबह के 7 बजे हैं... कभी उसकी नींद बिना अलार्म के खुली नहीं... आज ऐसा क्यों हुआ... उसे साढ़े आठ बजने का इंतज़ार होने लगा...

अरे यार आज तो वक्त ही नहीं कट रहा... कब बजेंगे ये साढ़े आठ.. आज तो बच्चे से पूरी डिटेल ले लूंगा.. शायद वो बच्चा किडनैप हो चुका है.. तभी तो डरा-डरा सा है... सहम कर बातें करता है...

साढ़े आठ बजे... एक-दो मिनट घड़ी का कांटा और आगे बढ़ा... फोन नहीं आया... राजेश अधीर हो उठा... फोन क्यों नहीं आ रहा... कहीं कुछ अनहोनी तो नहीं हो गई... तभी मोबाइल की घंटी बजी...

ह..ह...ह..हैलो

भइया मुझे बचा लो... मुझे यहां से निकाल लो...भैया... यहां पर लोग बहुत गंदे है... हर वक्त अंधेरा रहता है... मुझे बचा लो भैया... एक आप ही हो जो मुझे बचा सकता है... अपने छोटे भाई को बचा लो... प्लीज़ भैया...

तुम्हारा नाम क्या है ? कहां पर हो ? कौन लोग हैं ? क्या तुम्हें किडनैप किया गया है ? क्या तुम्हें अपने मां-बाप का फोन नंबर पता है ?

लेकिन तबतक फोन कट चुका था, बच्चे की दर्द भरी आवाज़ की सिर्फ गूंज भर राजेश के कानों में रह गई थी... राजेश बेचैन हो चुका था

(आठवां दिन)

राजेश सोच रहा था... कि वो पुलिस को जाकर पूरी बात बता देगा.... वो पुलिस की मदद से लड़के को ढूंढने की कोशिश करेगा... आज फोन आने पर वो कुछ और जानकारी लेगा... जिससे कुछ तो पता चले... बच्चे की आवाज़ में उसे अपनापन नज़र आने लगा था... शायद मां-बाप का इकलौता बच्चा होने की वजह से राजेश अपने आप को अब बच्चे का बड़ा भाई मानने लगा था... उसे लग रहा था कि वो बच्चा उसी का छोटा भाई है... साढ़े आठ बज चुके थे... मोबाइल की घंटी बस बजने ही वाली थी... उसने फोन हाथ में ले लिया... लेकिन घंटी नहीं बजी... उसने कॉल बैक किया.. लेकिन वही हुआ तो हमेशा होता था... फोन स्विच्ड ऑफ था...

(नौवां दिन)

फोन नहीं आया

(दसवां दिन)

मोबाइल की घंटी नहीं बजी

(ग्यारहवां दिन)

फोन बजा.... राजेश ने आव ना देखा ताव.. उठाते ही बोला...

अरे दो दिनों से फोन क्यों नहीं किया ? तू कहां पर है ? मैं तुझे बचा लूंगा.. फिक्र मत कर... मैं ही हूं तेरा बड़ा भाई.. मैं तेरा भैया ही बोल रहा हूं..

दूसरी ओर से आवाज़ आई...

अरे राजेश.. बेटा क्या हुआ... कल ही तो तुझे फोन किया था... और ये किसे बचाने की बात कर रहा है ?

मम्मा... अरे... मुझे लगा कि वो है... ओह हो... नहीं-नहीं मम्मी कुछ भी नहीं... मम्मा देर हो रही है.. मैं आपको बाद में फोन करता हूं... ऑफिस टाइम पर पहुंचना है. इतना कहकर राजेश ने फोन काट दिया..

(बारहवां दिन)

सुबह-सुबह 6 बजे राजेश की नींद खुल गई... वजह थी मोबाइल की घंटी...नींद में ही उसने फोन उठाया...

हैलो...
मिस्टर राजेश..
हां.. बोल रहा हूं...
क्या आप त्रिलोकपुरी पुलिस स्टेशन आ सकते हैं ?
पुलिस स्टेशन...राजेश की आंखों से नींद एकाएक गायब हो गई... आप कौन बोल रहे हैं ?
जी मैं इंस्पेक्टर संजय तोमर बोल रहा हूं... जितनी जल्दी हो सकता है आप यहां पहुंचिए... बेहद ज़रूरी काम है

राजेश फटाफट फ्रेश होकर त्रिलोकपुरी थाने पहुंचा... इंस्पेक्टर संजय ने उसे बिठाया और एक कागज़ पर लिखे नंबर को उसकी ओर बढ़ाया...

राजेश जी.. क्या आप इस नंबर को पहचानते हैं
राजेश ने जवाब दिया.. हां.. ये तो मेरा नंबर है..
अच्छा.. क्या आप इस नंबर को पहचानते हैं.. इंस्पेक्टर ने दूसरा कागज़ का टुकड़ा उसकी ओर खिसकाया...

नंबर देखते ही.. राजेश पहले तो चौंका.. हैरान हुआ... फिर किसी अनहोनी की आशंका से उसका जी कांप उठा...

जी हां... ये तो वही नंबर है.. रोज़ इस नंबर से मुझे फोन आता है.... साढ़े आठ बजे सुबह के करीब... ये तो उस बच्चे का नंबर है... रोज़ फोन करता है... इंस्पेक्टर साहब.. क्या आप लोगों को ये बच्चा मिल गया... मुझसे बचाने को कहता था... लगता था किसी ने इसका अपहरण कर लिया था...

राजेश जी.. हमें इस बच्चे की लाश मिली है... किसी ने इसे मारकर फैंक दिया था... बच्चे की लाश भी आपके ही मोहल्ले से मिली है... साथ में मोबाइल फोन भी मिला है... जिसमें आपका नंबर हमें मिला... छानबीन कर हमने पहले ही पता लगा लिया था कि ये नंबर किसका है...

राजेश के चेहरे पर हवाइयां उड़ रहीं थी... काटो तो खून नहीं था... उसे इंस्पेक्टर की बातों पर यकीन नहीं हो रहा था... अरे ऐसा कैसे हो सकता है....

राजेश जी... क्या आप ऐसे किसी बच्चे को जानते थे... इंस्पेक्टर ने फोटो दिखाते हुए राजेश से पूछा...

फोटो देखकर राजेश को लगा कि मासूम सा बच्चा नींद में हैं... वो सो रहा है... चेहरे पर ज़ख्मों के निशान थे... कपड़े भी फटे हुए थे... और हाथ में मोबाइल फोन था...

कांपती हुई आवाज़ में राजेश ने इंकार किया...

ठीक है राजेश जी... हम आपको पूछताछ के लिए बुलाते रहेंगे... केस के सिलसिले में आपको थोड़ी बहुत पऱेशानियां होंगी... लेकिन हम आशा करते हैं कि आप हमारी मदद ज़रूर करेंगे...

राजेश का दिमाग घूम रहा था... वो बड़े भारी मन से घर लौटा... ऑफिस जाने की इच्छा नहीं हुई... वो चुपचाप घर में पड़ा रहा... थाने से लौटने के बाद वो घर से बाहर ही नहीं निकला... बार-बार उस बच्चे का चेहरा आंखों के आगे घूम रहा था... और सोच रहा था.. काश वो पहले ही पुलिस के पास चला जाता...तो शायद बच्चे की जान बच जाती... लेकिन इतने मासूम बच्चे से किसकी दुश्मनी हो सकती है ? कौन होगा वो जिसने बच्चे की जान ली होगी ? किसी को इस मासूम से क्यों खतरा होगा ? कभी वो मोबाइल को देखता... तो कभी बच्चे की फोटो के बारे में सोचता... सोचते-सोचते उसे कब नींद लगी पता भी नहीं चला...

(तेरहवां दिन)

राजेश की नींद हमेशा की तरह अपने वक्त पर खुल गई... सबसे पहले नज़र मोबाइल पर पड़ी... लगा अभी घंटी बजेगी और बच्चा उसे भैया कहकर बुलाएगा... लेकिन अब ये बीती बात हो चुकी थी... राजेश जानता था कि ठीक साढ़े आठ बजे फोन नहीं आएगा... फोन पर उसे बच्चे की वो आवाज़ कभी सुनाई नहीं देगी... वो उठा बाहर गया... न्यूज़ पेपर उठाया... अखबार के फ्रंट पेज पर वही फोटो छपी थी... जो उसने कल पुलिस स्टेशन में देखी थी... खबर की हेडिंग थी... चाइल्ड सेक्स के बड़े रैकेट का भंडाफोड़... बच्चे की लाश मिलने के बाद हुआ खुलासा.... मामले में कई सफेदपोशों के शामिल होने का शक...

राजेश के हाथ कांपने लगे... न्यूज़ पेपर उसे मनों भारी लगने लगा... ऐसा लगा जैसे उसके शरीर में जान ही नहीं बची...