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Wednesday, December 12, 2012

अमौसा का मेला

स्वर्गीय कवि कैलाश गौतम की ये रचना वैसे है तो भोजपुरी भाषियों के लिए... लेकिन मुझे लगता है कि थोड़ी मशक्कत के बाद हिंदीभाषी भी इसके मर्म को समझ सकते हैं... पहली बार जब ये कविता पढ़ी तो ऐसा लगा कि जैसे गांव की पूरी ज़िंदगी शब्दों में रच कर सामने रख दी गयी है... ज़रूर पढ़ें और ना समझ में आए तो बेहिचक सवाल भी पूछें....


कि भक्ति के रंग मे रंगल गाव देखs
धरम मे करम मे सनल गाव देखs
अगल मे बगल मे सगल गाव देखs
अमौसा नहाये चलल गाव देखs

एहु हाथे झोरा ओहु हाथे झोरा 
आ कान्ही पे बोरा कपारे पे बोरा 
आ कमरी पे केहु रजाई मे केहु 
अ कथरी मे केहु दुलाई मे केहु 
कि आज रंगावत हई गोड देखs
हसत हउये बब्बा तनी जोड देखs 
घुंघटवे से पुछे पतोहिया कि अईया 
गठरईया मे अब का रखाई बतईहा 
एहर हउवे लुगा ओहर हउवे पुडी 
रामायन के लगे ह मडुवा के ढुंढी 
उ चाउर चिउरा किनारे के ओरी 
आ नवका चपलवा अंचारे के ओरी 

अमौसा का मेला अमौसा का मेला ........ 

मचल हउवे हल्ला चढावs उतारs 
खचाखच भरल रेलगाडी निहारs 
एहर गुर्री गुर्रा ओहर लुली - लुला 
आ बिच्चे मे हउवे शराफत से बोलs 
चपाईल ह केहु दबाईल ह केहु
आ घंटन से उपर टंगाईल ह केहु
केहु हक्का बक्का केहु लाल पियर
केहु फनफनात हउवे कीरा के नीयर 
अ बप्पा रे बप्पा आ दईया रे दईया 
तनी हम्मे आगे बढे द त भईया 
मगर केहु दर से टसकले ना टसके 
टसकले ना टसके , मसकले ना मसके 
छिडल हौ हिताई नताई के चरचा
पढाई लिखाई कमाई के चरचा 
दरोगा के बदली करावत ह केहु 
आ लग्गी से पानी पियावत ह केहु 

अमौसा के मेला अमौसा के मेला ...... 

जेहर देख ओहरै बढत हउवे मेला 
आ सरगे के सीढी चढत हउवे मेला 
बडी हउवे सांसत ना कहले कहाला 
मुडेमुड सगरे ना गिनले गिनाला 
एहि भीड मे संत गिरह्स्त देखा 
सभे अपने अपने मे हौ व्यस्त देखा 
आ टाई मे केहु आ टोपी मे केहु 
आ झुंसी मे केहु , आलोपी मे केहु 
अखाडन मे संगत आ रंगत ई देखs 
बिछौल हउ हजारन के पंगत ई देखs 
कही रासलीला कही परबचन हउ 
कही गोष्ठी हउ कही पे भजन हउ 
केहु बुढिया माई के कोरा उठावे 
अ तिरबेनी मईया मे गोता लगावे 
कलपबास मे घर के चिन्ता लगल हउ 
कटल धान खरिहाने वईसे परल हउ 

अमौसा के मेला , अमौसा के मेला ...... 

गुलब्बन के दुलहिन चले धीरे धीरे
भरल नाव जईसे नदी तीरे तीरे
सजल देहि जईसे हो गवने की डोली
हंसौ हौ बताशा शहद हउवे बोली 
अ देखवली हा ठोकर बचवली हा धक्का 
मनै मन छुहारा मनै मन मुनाक्का 
फुटेहरा नियर मुस्किया मुस्किया के
निहारे ले मेला सिहा के चिहा के
सबै देवी देवता मनावत चलेली
आ नरियर पे नरियर चढावत चलेली 
किनारे से देखे इशारे से बोले 
कही गाँठ जोडे कही गाँठ खोले 
बडे मन से मन्दिर मे दरशन करईली 
आ दुधे से शिवजी के अरघा भरईली 
चढावे चढावा आ गोंठे शिवाला 
छुवल चाहे पिंडी लटक नाही जाला 

अमौसा के मेला अमौसा के मेला ....... 

एहि मे चम्पा चमेली भेटईली 
आ बचपन के दुनो सहेली भेटईली 
ई आपन सुनावे उ आपन सुनावे 
दुनो आपन गहना गदेला गिनावे
असो का बनवलु असो का गढवलु
तु जीजा के फोटो ना अब तक पठवलु
ना ई उन्हे रोके ना उ इन्हे टोके
दुनो अपने दुल्हा के तारीफ झोंके 
हमे अपनी सासु के पुतरी तु जन्हिया
आ हम्मे ससुर जी के पगरी तु जन्हिया 
शहरियो मे पक्की देहतियो मे पक्की 
चलत हउवे टेम्पु चलत हउवे चक्की 
मनेमन जरै आ गडे लगली दुनो 
भईल तु तु मै मै लडे लगली दुनो 
आ साधु छोडावे सिपाही छोडावे 
आ हलवाई जईसे कराही छोडावे 

अमौसा के मेला अमौसा के मेला ...... 

कलौता के माई के झोरा हेराईल
आ बुद्धु के बडका कटोरा हेराईल
टिकुलिया के माई टिकुलिया के जोहे
बिजुलिया के माई बिजुलिया के जोहे
मचल हउवे मेला मे सगरे ढुन्ढाई
चमेला के बाबु चमेला के माई
गुलबिया सभतर निहारत चलेलै
मुरहुवा मुरहुवा पुकारत चलेलै
आ छोटकी बिटियवा के मारत चलेलै 
बिटियवा पे गुस्सा उतारत चलेलै 

गोबरधन के सरहज किनारे भेटईली 
गोबरधन के संगे पँउड के नहईली 
घरे चलतs पाहुन दही गुड खियवती
भतीजा भईल हउ भतीजा देखवती 
उहे फेंक गठरी परईले गोबरधन 
ना फेर फेर देखईले धरईले गोबरधन 

अमौसा के मेला अमौसा के मेला ......... 

केहु शाल सुईटर दुशाला मोलावे
केहु बस अटैची की ताला मोलावे
केहु चायदानी पियाला मोलावे
सोठउरा के केहु मसाला मोलावे 
नुमाईस मे जाते बदल गईली भउजी 
आ भईया से आगे निकल गईली भउजी 
आईल हिंडोला मचल गईले भउजी 
आ देखते डरामा उछल गईली भउजी 
आ भईया बेचारु जोडत हवे खरचा 
भुलईले ना भुली पकौडी के मरिचा 
बिहाने कचहरी कचहरी के चिन्ता
बहिनिया के गहना मसहरी के चिन्ता
फटल हउवे कुर्ता फटल हउवे जुता
खलित्ता मे खाली किराये के बुता
तबौ पिछे पिछे चलत जात हउवन
गदेरी मे सुरती मलत जात हउवन 

अमौसा के मेला अमौसा के मेला ...

Tuesday, August 07, 2012

रिश्ते

करीब 3 साल पहले जब चीनी प्रधानमंत्री भारत के दौरे पर आए थे.. तब ये कहानी लिखी थी... आज अपने पुराने ईमेल चेक कर रहा था.. तो किसी मेल में ये दिख गई.. सोचा आप लोगों से शेयर कर लूं... ज़रूर पढ़ें और अपने विचारों से मुझे ज़रूर अवगत कराएं... आपलोगों के कमेंट्स से ही आगे और लिखने की ताकत मिलती है.. 




रिश्ते भी बड़े अजीब होते हैं... ज़रा सी चूक हो जाए.. उंच-नीच हो जाए तो फिर कोई भी सफाई... कोई भी जवाब... कुछ भी काम नहीं करता.. उसके बाद शुरु होती है रिश्तों को फिर से ठीक करने की कवायद... हम सोचते हैं कि अपनी इस कोशिश से सब कुछ ठीक कर लेंगे... सबकुछ पहले जैसा हो जाएगा... लेकिन ये कवायद ज़िंदगी भर चलती है... और नतीजा वही होता है जहां से इन सबकी शुरुआत होती है... कभी-कभी तो जी करता है छोड़ो यार... जिसको जो करना है वो करेगा ही... अगर समझ नहीं आ रहा तो मैं अपना खून क्यों जला रहा हूं.... लेकिन क्या करें.. दिमाग में कंप्यूटर की तरह शटडाउन बटन तो होता नहीं कि बटन दबाया और दिमाग बंद... पता नहीं संजय के दिमाग में और क्या-क्या चल रहा था... तभी उसे लगा कि कहीं से कोई उसे बुला रहा है... दिमाग फौरन वहां पहुंचा जहां वो काम कर रहा था... देखा तो उसके बॉस बुला रहे हैं... 

हां सर...

अरे संजय... वो पीएम का क्या हुआ...

पीएम... क्या हुआ सर...

अरे चीन के प्रधानमंत्री भारत दौरे पर हैं ना... आज भारतीय प्रधानमंत्री से मुलाकात होनी थी.. कोई खबर आई क्या... 

अरे हां सर.. दिमाग से निकल ही गया था... मैं देखता हूं...

इन्हें भी कोई और नहीं मिलता.. जब देखो तो मैं ही नज़र आता हूं.. एक तो छुट्टी नहीं देते... मांगने पर कहते हैं कि इतने सारे बिहारी मीडिया में हैं... सबको छठ पर घर जाना होता है... छुट्टी दे दूं तो चैनल चलेगा कैसे... चलो छुट्टी ना दी.. तो कम से कम थोड़ी देर आज के दिन छोड़ तो दो कि छठ के विजुअल ही देख कर संतोष कर लूं... लेकिन नहीं... आपको तो बर्दाश्त ही नहीं होता कि कोई दफ्तर में दो मिनट भी खाली कैसे बैठा है...

संजय भुनभुनाता हुआ अपनी डेस्क पर पहुंचा... साला चैनल की नौकरी ही बेकार है... दिमाग फिर गया था कि मीडिया में नौकरी करने चला आया... थोड़ी देर तक छठ की तस्वीरें देखता रहा... साथ ही अपने बचपन को भी याद करता रहा... उसके बाद पीएमओ (प्राइम मिनिस्टर्स ऑफिस) कवर करने वाले रिपोर्टर को फोन किया... 

अरे सर क्या निकला बातचीत में... चीनी प्रधानमंत्री ने कुछ बोला क्या ?

दूसरी ओर से आवाज़ आई

अरे नहीं कुछ नहीं बोला यार.. दोनों ने एक-दूसरे से हाथ मिलाया और चीनी प्रधानमंत्री ने पता नहीं चाइनीज़ में बुदबुदा कर क्या बोला... अभी-अभी प्रेस स्टेटमेंट हाथ में आई है.. देखता हूं इसमें क्या लिखा है... 

संजय का दिमाग एक बार फिर छठ घाट पर पहुंच गया... उसे याद आया की छठ के दिन गांव के सारे लोग अपने-अपने गिले-शिकवे.. अपनी-अपनी लड़ाईयां भूल कर एक दूसरे के साथ खड़े रहते हैं... बातचीत करते हैं.. परिवार का हाल-चाल पूछते हैं... कुछ ऐसा ही तो सुदर्शन चाचा और उसके पिता जी भी करते हैं... छठ के दिन घाट पर दोनों मिलते हैं... साथ-साथ काम करते हैं... सफाई से लेकर साज सजावट सबमें दोनों एक साथ ही रहते हैं... लेकिन उसके बाद तो जैसे तलवारें खिंच जाती हैं... 20 साल से उपर हो गए दोनों भाइयों के बीच दुश्मनी को.. घर में आना-जाना तो छोड़िए बोल-चाल भी बंद है.... लेकिन छठ घाट पर दोनों दुश्मनी भूल जाते हैं... दोनों के हंसते हुए चेहरे संजय को याद आ रहे थे... तभी फिर आवाज़ आई... 

"अरे भइया सुन रहे हो कि नहीं... पीएम ने कहा है कि अरुणाचल और दलाई लामा के मुद्दे पर कोई बात नहीं हुई.. लेकिन दोनों ही देश एक दूसरे से बेहतर संबंध चाहते हैं... और इसके लिए छोटी मोटी बाधाएं नहीं आने दी जाएंगी... "

रिपोर्टर की बातों सुनकर संजय का मन खीझ उठा.. 

अरे यार जिस पर विवाद है... उसी पर बात नहीं हुई... और बावजूद इसके कहा ये जाता है कि दोनों ही देश बेहतर संबंध चाहते हैं... हद है यार... 

लेकिन संजय का दिमाग थोड़ा ठिठका... और वो खुद ब खुद बोल उठा..

हां  यार.. इसमें गलत ही क्या है... जब पर्व त्योहार पर पिताजी और चाचाजी मिल सकते हैं... बातचीत कर सकते हैं... एक-दूसरे के परिवारों का हालचाल पूछ सकते हैं.. लेकिन जब बात झगड़े को सुलझाने की आती है तो दोनों में से कोई भी ना तो पहल करता है.. और ना ही इसपर बातचीत ही करता है... तो फिर जब एक परिवार अपना झगड़ा नहीं सुलझा सकता तो बेचारे दो देशों के प्रधानमंत्री दोनों देशों के झगड़े को कैसे निपटाएंगे... कैसे सुलझाएंगे.. 

संजय का मन एक बार फिर पीएमओ से उठकर अपने गांव के छठ घाट पर पहुंच गया... उसे याद आ रहा था कि किस तरह बचपन में वो अपने भाई के साथ पटाखों के लिए लड़ने पर उतारू हो जाता था... उसे ज़रा भी बर्दाश्त नहीं होता कि वो अपने पटाखे में भाई को हिस्सा दे... वो सारे के सारे पटाखों को खुद ही उड़ाना चाहता था... लेकिन पिताजी के कहने पर मजबूरी में उसे अपने भाई को पटाखे देने ही पड़ते थे... संजय की सोच अपनी उड़ान भरती ही जा रही थी... कि तभी कानों में फिर से बॉस के ऑडियो की एंट्री हुई.. 

संजय बताओ यार चीनी प्रधानमंत्री के साथ बैठक भी हो गयी और निकला कुछ नहीं... अरे साले सब बेकार हैं.. बहुत दब्बू पीएम है या अपना... बताओ कुछ बोला ही नहीं.... अरे जो समस्याएं हैं... जिन पर विवाद हैं उन पर तो बात करनी ही चाहिए... विवादित मुद्दों पर बात नहीं करेंगे तो वो सुलझेंगे कैसे... साला कुछ नहीं हो सकता.. ये  चीनी फिर वहीं भाई-भाई का नारा देंगे... और फिर वही करेंगे जो 62 में किया था... यार क्या होगा इस देश का... समझ में नहीं आता... संजय तुम्हारा शो तो रेडी है ना.. यार छठ से बुलेटिन ओपन करना... दिल्ली और मुंबई में बिहारी हैं उनसे टीआरपी तो मिल जाएगी... "

संजय को लगा कि बॉस का मूड आज ठीक है... क्यों ना उन्हें अपनी मन की बात बता दी जाए... तो फौरन संजय ने बात छेड़ी... 

हां सर बिल्कुल सही कहा आपने... कि जबतक विवादों पर बात नहीं होगी.. परेशानियां बताईं नहीं जाएंगी.. तबतक विवाद सुलझेंगे नहीं... वैसे सर एक बात बताइए... ऑफिस में भी तो इतनी सारी प्रॉबलम्स हैं... ये बात मैनेजमेंट से लेकर आप भी जानते हैं...आप इतनी बड़ी बड़ी मीटिंग्स में जाते हैं... तो सर कभी हमारी समस्याओं को भी उठा दिया कीजिए...

इतना सुनना था की बॉस की बोली एकदम पलट गई... 

अरे यार संजय.. तुम भी क्या बात करते हो... अपनी नौकरी प्यारी नहीं है क्या मुझे... पागल हूं मैं जो ये सब बात मीटिंग में कहूंगा...

इतना कहकर बॉस तो चले गए.. लेकिन संजय हैरान सा खड़ा था... कि अभी-अभी तो बॉस अपने ही देश के पीएम को दब्बू करार दे रहे थे... देश के भविष्य के बारे में सोच रहे थे... लेकिन जब बात अपने ऑफिस के भविष्य की दूसरी समस्याओं पर गई.. तो बंदा एकदम से पलट पड़ा... संजय के दिमाग में गांव के छठ घाट पर अपने चाचा और पिताजी की मुलाकात से लेकर... दिल्ली के प्रधानमंत्री ऑफिस में भारत और चीन के प्रधानमंत्रियों की मुलाकात की बातें घूम गईं.. संजय के मुंह से बरबस ही निकल पड़ा.. 

हां भई.. बात तो सोलह आने सच है.. अपनी नौकरी जो बचानी है... चाहे बाकी लोग भांड़ में जाएं... हर किसी को अपनी ही बचानी होती है... दूसरे से उसे क्या मतलब है...  बेचारे चीन और हमारे देश के प्रधानमंत्री भी यही सोचते होंगे कि .. अरे नौकरी बचा ली जाए... समस्याएं और परेशानियां तो वहीं रहेंगी जहां हैं... सालों पहले से चले आ रहे झगड़ों के चक्कर में अपना वर्तमान क्यों बर्बाद किया जाए... 

संजय चुपचाप पीसीआर (प्रोडक्शन कंट्रोल रूम) की ओर बढ़ चला... शो के ऑन एयर जाने का टाइम हो गया था.... आखिर उसे भी तो अपनी नौकरी बचानी थी... 

Thursday, June 07, 2012

एक तलाश



सौजन्य : मानसी शर्मा



स्वयं से यह प्रश्न करती  हूँ 
कौन हूँ मैं 
आग में जलती हुई  
क्यों मौन हूँ मैं ??

बंद घर में घुटती साँस हूँ  या 
या उर में ठंडक का एहसास हूँ मैं ??

दिवार पर टंगी कोई म्यार  हूँ या 
सृष्टि  का खोया हुआ मान हूँ मैं ??

सागर तल में पड़ा कोई पाशाण  हूँ या 
मृत भावनाओ को ढोती  इन्सान हूँ मैं ??

जीवन यज्ञ  में जलती हुए होम हूँ या 
प्रेम-प्रतीक विराट व्योम हूँ मैं ??

प्यास को मिटाती हुई वारि हूँ मैं या 
जगत की जननी नारी हूँ मैं ??

बिस्तर पर पड़ी एक लाश हूँ या 
अर्धांगिनी का अधिकार हूँ मैं ??

हार हूँ या जीत हूँ या 
जीती हुए मैं हार हूँ ??

प्रश्नो का जवाब खोजती या 
हर प्रश्न का जवाब हूँ मैं ??

आखिर कौन हूँ मैं ??

लेखक रेडियो प्रोड्यूसर रह चुकी हैं, देश के कई जाने-माने एफएम स्टेशन्स में काम कर चुकी हैं, बेहद क्रिएटिव हैं, बेहद सरलता से और नपे तुले शब्दों में बड़ी-बड़ी बातें कहने में उस्ताद हैं, कैसी है मानसी की ये कविता इस पर अपनी राय ज़रूर दें.

Thursday, May 31, 2012

हैलो भैया बोल रहे हैं !

बहुत दिनों से सोच रहा था कि कहानी लिखूं... प्लॉट तो कई थे पर आमिर खान के शो सत्यमेव जयते को देखने के बाद बहुत दिनों से सोच की गहराइयों में दफ्न पड़े इस प्लॉट को बाहर निकाला... कोशिश की है लिखने की... लेकिन मेरे साथ-साथ मेरे दोस्तों को भी लगता है कि इस कहानी में कई सवाल अनसुलझे हैं... आखिर तक जाते जाते कहानी टूटती जा रही है... मैं इस पर एक शॉर्ट फिल्म बनाने की सोच रहा हूं... मैं चाहता हूं... इस कहानी में सुधार के लिए आप लोग मुझे सहयोग दें... आपको जहां भी लगता है कि इस कहानी में ये कमी है.. या यहां पर ये होना चाहिए था... प्लीज़ शेयर करें.... शॉर्ट फिल्म बनाने में बेहद मदद मिलेगी... हो सकता है आपके विचारों... आपके सुधारों के साथ फिल्म की स्क्रिप्ट ज्यादा मज़बूत हो जाए... 


(पहला दिन)

राजेश रोज़ की तरह ऑफिस जाने की तैयारी में था.. प्राइवेट कंपनी में काम करने वालों के लिए ये वक्त लड़ाई के किसी मैदान की तरह होता है... सबकुछ जल्दी... फ्रेश होना तो जल्दी होना... नाश्ता करना तो जल्दी करना.... तैयार होना तो जल्दी होना... यानि सबकुछ फटाफट... ऐसा लगता है मानो सुबह-सुबह लोकल ट्रेन सुपर फास्ट में तब्दील हो गई है... खैर राजेश बाथरूम की ओर बढ़ ही रहा था कि मोबाइल की घंटी बजी... राजेश के चेहरे पर गुस्से की झलक साफ नज़र आयी..

ओह हो.. इस वक्त कौन है कमबख्त... यार लोग समझते नहीं हैं कि ऑफिस जाने के वक्त टाइम कहां होता है... पता नहीं लोगों को इसी वक्त फोन करने की चूल क्यों लगी रहती है... स्क्रीन पर कोई अजनबी सा नंबर डिस्प्ले हो रहा था...

हैलो... कौन बोल रहा है...

उधर से किसी ने कुछ भी नहीं बोला... सिर्फ सांसों की आवाज़ें आ रहीं थी...

अरे भइया बोलोगे... या इसी तरह भोले बाबा बनकर सुनते रहोगे... टाइम नहीं है मेरे पास... जल्दी बोलो कौन है ?

दूसरी ओर से तब भी कोई नहीं बोला...

तब तक तो राजेश का पारा बाहर की गर्मी की हदों को तोड़ते हुए डबल हो चुका था... अबे कौन है साले... हरामखोर पक्का ये तुमलोगों की मार्केटिंग का कोई नया फंडा होगा... अरे भइया माफ करो...

फोन को कट करके वो सीधा बाथरूम में भागा... नहा धो कर जब राजेश तैयार हो गया तब उसकी नज़र फिर अपने मोबाइल पर पड़ी... मिस्ड कॉल में चार बार वही नंबर देखा.. राजेश ने सोचा शायद उसके किसी रिश्तेदार का फोन हो... उसने कॉल बैक किया... एक बार, दो बार.. तीन बार.. लेकिन किसी ने उठाया नहीं... खैर राजेश ऑफिस चला गया...

(दूसरा दिन)

अगले दिन सुबह फिर वही ऑफिस जाने की जल्दी... और ठीक उसी टाइम पर मोबाइल की घंटी का बजना... राजेश ने फोन उठाया..

अरे ये तो वही नंबर है... पता नहीं कौन है यार
हैलो..कौन बोल रहा है... अरे कुछ तो बोलो भाई..
हैलो...
हैलो...
अरे जब बोलना नहीं होता तो फोन क्यों करते हो भाई... आइंदा से फोन किया तो अच्छा नहीं होगा... राजेश ने फोन कट कर दिया...

(तीसरा दिन)

हैलो...
हैलो...
हैलो... बोलता क्यों नहीं बे...

(चौथा दिन)

हैलो...
हैलो...
हैलो... अरे गूंगा है क्या साले.. कुछ तो बोल.. हरामी की औलाद...

(पांचवा दिन)

हैलो...
हैलो...
हैलो... तेरी तो... बेहन........मादर......कुत्ते के बच्चे....सूअर... साले.. बोल कुछ तो बोल...

(छठा दिन)

साढ़े आठ बजे... राजेश का वही रोज़ का अफरातफरी वाला आलम... राजेश की नज़र बार-बार मोबाइल की ओर जा रही थी... क्या आज भी फोन की घंटी बजेगी... अगर बजी.. तो आज फोन करने वाले की वो बैंड बजा देगा... छोड़ेगा नहीं.. आज तो बस आर या पार... मोबाइल बजा...

भोस.... के... अबे बोलने में फटती है क्या तेरी... बेहन...बोलता है कि नहीं तू...

उधर से आवाज़ आई...

आप भैया बोल रहे हो क्या ?
क..क...क...कौन ?
आप मेरे भैया बोल रहे हैं ना ?
राजेश उस मासूम आवाज़ को पहचान नहीं पाया... उसे अब अपनी बोली पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी... उसने तो सोचा भी नहीं था कि फोन की दूसरी तरफ कोई बच्चा भी हो सकता है... आवाज़ से तो 7 या 8 साल का लग रहा है.... या फिर उससे भी छोटा लग रहा है...

त...त...त...तुम कौन बोल रहे हो ?

आप मेरे भैया ही हो ना ? बोलो ना...

बच्चे की आवाज़ से लग रहा था.. कि वो किसी छोटे से बंद कमरे से आ रही है... वो बेहद डरा हुआ लग रहा था... उसकी आवाज़ कांप रही थी... ऐसा लग रहा था मानो अगर किसी ने उसे फोन पर बातें करते हुए देख लिया तो कहर टूट पड़ेगा... राजेश ने फिर कहा...

तुम कौन और कहां से बोल रहे हो ? इतने डरे हुए क्यों हो ? बोलो... कौन हो तुम.. और मुझे भैया क्यों कह रहे हो ?

मैं कल इसी वक्त फोन करूंगा... कोई आ रहा है... मैं आपसे ज्यादा देर बात नहीं कर सकता...

फोन कट चुका था... लेकिन राजेश के चेहरे पर हवाईयां उड़ रहीं थी... शायद अपराधबोध भी मन ही मन बढ़ रहा था.. कि पिछले कई दिनों से वो बेहद गंदे तरीके से फोन पर बात कर रहा था... खैर भारी मन से वो ऑफिस चला गया... दिनभर वो उसी बच्चे के बारे में सोचता रहा... कौन है... कहां पर है... वो उसे क्यों फोन करता है... वो चाहता क्या है... ना जाने कितने सवाल राजेश के दिलो-दिमाग में घुमड़ रहे थे... रात को जब घर पहुंचा तब भी उसकी हालत ऐसी ही थी... ऐसा लग रहा था कि जल्दी से वो उस बच्चे की आवाज़ सुन ले... वो उससे सारी बातें पूछ ले... ये सब सोचते-सोचते कब उसकी आंख लग गई पता ही नहीं चला...

(सातवां दिन)

रोज़ आठ बजे उठने वाले राजेश की नींद आज पहले खुल गई.. वो खुद हैरान था कि उसे क्या हो गया है... अभी तो सुबह के 7 बजे हैं... कभी उसकी नींद बिना अलार्म के खुली नहीं... आज ऐसा क्यों हुआ... उसे साढ़े आठ बजने का इंतज़ार होने लगा...

अरे यार आज तो वक्त ही नहीं कट रहा... कब बजेंगे ये साढ़े आठ.. आज तो बच्चे से पूरी डिटेल ले लूंगा.. शायद वो बच्चा किडनैप हो चुका है.. तभी तो डरा-डरा सा है... सहम कर बातें करता है...

साढ़े आठ बजे... एक-दो मिनट घड़ी का कांटा और आगे बढ़ा... फोन नहीं आया... राजेश अधीर हो उठा... फोन क्यों नहीं आ रहा... कहीं कुछ अनहोनी तो नहीं हो गई... तभी मोबाइल की घंटी बजी...

ह..ह...ह..हैलो

भइया मुझे बचा लो... मुझे यहां से निकाल लो...भैया... यहां पर लोग बहुत गंदे है... हर वक्त अंधेरा रहता है... मुझे बचा लो भैया... एक आप ही हो जो मुझे बचा सकता है... अपने छोटे भाई को बचा लो... प्लीज़ भैया...

तुम्हारा नाम क्या है ? कहां पर हो ? कौन लोग हैं ? क्या तुम्हें किडनैप किया गया है ? क्या तुम्हें अपने मां-बाप का फोन नंबर पता है ?

लेकिन तबतक फोन कट चुका था, बच्चे की दर्द भरी आवाज़ की सिर्फ गूंज भर राजेश के कानों में रह गई थी... राजेश बेचैन हो चुका था

(आठवां दिन)

राजेश सोच रहा था... कि वो पुलिस को जाकर पूरी बात बता देगा.... वो पुलिस की मदद से लड़के को ढूंढने की कोशिश करेगा... आज फोन आने पर वो कुछ और जानकारी लेगा... जिससे कुछ तो पता चले... बच्चे की आवाज़ में उसे अपनापन नज़र आने लगा था... शायद मां-बाप का इकलौता बच्चा होने की वजह से राजेश अपने आप को अब बच्चे का बड़ा भाई मानने लगा था... उसे लग रहा था कि वो बच्चा उसी का छोटा भाई है... साढ़े आठ बज चुके थे... मोबाइल की घंटी बस बजने ही वाली थी... उसने फोन हाथ में ले लिया... लेकिन घंटी नहीं बजी... उसने कॉल बैक किया.. लेकिन वही हुआ तो हमेशा होता था... फोन स्विच्ड ऑफ था...

(नौवां दिन)

फोन नहीं आया

(दसवां दिन)

मोबाइल की घंटी नहीं बजी

(ग्यारहवां दिन)

फोन बजा.... राजेश ने आव ना देखा ताव.. उठाते ही बोला...

अरे दो दिनों से फोन क्यों नहीं किया ? तू कहां पर है ? मैं तुझे बचा लूंगा.. फिक्र मत कर... मैं ही हूं तेरा बड़ा भाई.. मैं तेरा भैया ही बोल रहा हूं..

दूसरी ओर से आवाज़ आई...

अरे राजेश.. बेटा क्या हुआ... कल ही तो तुझे फोन किया था... और ये किसे बचाने की बात कर रहा है ?

मम्मा... अरे... मुझे लगा कि वो है... ओह हो... नहीं-नहीं मम्मी कुछ भी नहीं... मम्मा देर हो रही है.. मैं आपको बाद में फोन करता हूं... ऑफिस टाइम पर पहुंचना है. इतना कहकर राजेश ने फोन काट दिया..

(बारहवां दिन)

सुबह-सुबह 6 बजे राजेश की नींद खुल गई... वजह थी मोबाइल की घंटी...नींद में ही उसने फोन उठाया...

हैलो...
मिस्टर राजेश..
हां.. बोल रहा हूं...
क्या आप त्रिलोकपुरी पुलिस स्टेशन आ सकते हैं ?
पुलिस स्टेशन...राजेश की आंखों से नींद एकाएक गायब हो गई... आप कौन बोल रहे हैं ?
जी मैं इंस्पेक्टर संजय तोमर बोल रहा हूं... जितनी जल्दी हो सकता है आप यहां पहुंचिए... बेहद ज़रूरी काम है

राजेश फटाफट फ्रेश होकर त्रिलोकपुरी थाने पहुंचा... इंस्पेक्टर संजय ने उसे बिठाया और एक कागज़ पर लिखे नंबर को उसकी ओर बढ़ाया...

राजेश जी.. क्या आप इस नंबर को पहचानते हैं
राजेश ने जवाब दिया.. हां.. ये तो मेरा नंबर है..
अच्छा.. क्या आप इस नंबर को पहचानते हैं.. इंस्पेक्टर ने दूसरा कागज़ का टुकड़ा उसकी ओर खिसकाया...

नंबर देखते ही.. राजेश पहले तो चौंका.. हैरान हुआ... फिर किसी अनहोनी की आशंका से उसका जी कांप उठा...

जी हां... ये तो वही नंबर है.. रोज़ इस नंबर से मुझे फोन आता है.... साढ़े आठ बजे सुबह के करीब... ये तो उस बच्चे का नंबर है... रोज़ फोन करता है... इंस्पेक्टर साहब.. क्या आप लोगों को ये बच्चा मिल गया... मुझसे बचाने को कहता था... लगता था किसी ने इसका अपहरण कर लिया था...

राजेश जी.. हमें इस बच्चे की लाश मिली है... किसी ने इसे मारकर फैंक दिया था... बच्चे की लाश भी आपके ही मोहल्ले से मिली है... साथ में मोबाइल फोन भी मिला है... जिसमें आपका नंबर हमें मिला... छानबीन कर हमने पहले ही पता लगा लिया था कि ये नंबर किसका है...

राजेश के चेहरे पर हवाइयां उड़ रहीं थी... काटो तो खून नहीं था... उसे इंस्पेक्टर की बातों पर यकीन नहीं हो रहा था... अरे ऐसा कैसे हो सकता है....

राजेश जी... क्या आप ऐसे किसी बच्चे को जानते थे... इंस्पेक्टर ने फोटो दिखाते हुए राजेश से पूछा...

फोटो देखकर राजेश को लगा कि मासूम सा बच्चा नींद में हैं... वो सो रहा है... चेहरे पर ज़ख्मों के निशान थे... कपड़े भी फटे हुए थे... और हाथ में मोबाइल फोन था...

कांपती हुई आवाज़ में राजेश ने इंकार किया...

ठीक है राजेश जी... हम आपको पूछताछ के लिए बुलाते रहेंगे... केस के सिलसिले में आपको थोड़ी बहुत पऱेशानियां होंगी... लेकिन हम आशा करते हैं कि आप हमारी मदद ज़रूर करेंगे...

राजेश का दिमाग घूम रहा था... वो बड़े भारी मन से घर लौटा... ऑफिस जाने की इच्छा नहीं हुई... वो चुपचाप घर में पड़ा रहा... थाने से लौटने के बाद वो घर से बाहर ही नहीं निकला... बार-बार उस बच्चे का चेहरा आंखों के आगे घूम रहा था... और सोच रहा था.. काश वो पहले ही पुलिस के पास चला जाता...तो शायद बच्चे की जान बच जाती... लेकिन इतने मासूम बच्चे से किसकी दुश्मनी हो सकती है ? कौन होगा वो जिसने बच्चे की जान ली होगी ? किसी को इस मासूम से क्यों खतरा होगा ? कभी वो मोबाइल को देखता... तो कभी बच्चे की फोटो के बारे में सोचता... सोचते-सोचते उसे कब नींद लगी पता भी नहीं चला...

(तेरहवां दिन)

राजेश की नींद हमेशा की तरह अपने वक्त पर खुल गई... सबसे पहले नज़र मोबाइल पर पड़ी... लगा अभी घंटी बजेगी और बच्चा उसे भैया कहकर बुलाएगा... लेकिन अब ये बीती बात हो चुकी थी... राजेश जानता था कि ठीक साढ़े आठ बजे फोन नहीं आएगा... फोन पर उसे बच्चे की वो आवाज़ कभी सुनाई नहीं देगी... वो उठा बाहर गया... न्यूज़ पेपर उठाया... अखबार के फ्रंट पेज पर वही फोटो छपी थी... जो उसने कल पुलिस स्टेशन में देखी थी... खबर की हेडिंग थी... चाइल्ड सेक्स के बड़े रैकेट का भंडाफोड़... बच्चे की लाश मिलने के बाद हुआ खुलासा.... मामले में कई सफेदपोशों के शामिल होने का शक...

राजेश के हाथ कांपने लगे... न्यूज़ पेपर उसे मनों भारी लगने लगा... ऐसा लगा जैसे उसके शरीर में जान ही नहीं बची...