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Saturday, September 03, 2011

तेरा बचपन, मेरा बचपन



उसका गिरना...

गिर के उठना...

मुस्कुराना... रोना...

रूठना... मनाना...

इन सबमें अपने आप को ढूंढता हूं...

उसके छिले हुए घुटने के दर्द में खुद को तलाशता हूं...

उसकी तोतली बोली... आधे अधूरे शब्दों की लड़ी...

गुस्सा...चीखना...चिल्लाना...

सब मुझे अपना ही लगता है...

मां की आंखों में मुझे सब दिखता है...

उसमें वो मेरा अक्स ढूढंती है...

मैं जानता हूं कि मेरा लड़कपन मुझे मिल नहीं सकता...

थोड़ा ही सही पर उसके खिलंदड़पने में अपना बचपन तलाशता हूं...


उसके बचपन में अपना बचपन देखता हूं... 

©Alok Ranjan