मुझसे जुड़ें

Saturday, September 03, 2011

काठी पे घोड़ा


मेरे परम प्रिय मित्र हैं.. मोहित मिश्रा... किसी ने ये फोटो दिखाकर बोला.. कि क्या आप इस पर एक कहानी लिख सकते हैं...उसके बाद मोहित के की-बोर्ड से जो कुछ भी निकला.. वो गज़ब था... आप भी पढ़ें.. और इस पर अपना कमेंट ज़रूर दें...



8 साल बाद पहली बार वो छुट्टी पर जा रही थी। जबसे बिज़नस शुरू किया जैसे भूल ही गई थी कि छुट्टी भी होती है। वो तो स्टाफ ज़िद न करता तो इस बार भी जन्मदिन बाकी दिनों की तरह गुज़रता। लेकिन उसे छुट्टी पर जाना पड़ा। संदेश के बाद उसके पास सिर्फ इंजीनियरिंग की डिग्री और थोड़े पैसे बचे थे। संदेश जब तक थे तब तक उसे इन दोनों की ज़रूरत नहीं रह गई थी। लेकिन उनके बाद इन दोनों ने ही उसे किसी तरह संभाला था। जिमेट्री बॉक्स का छोटा सा कारखाना बड़ी फैक्ट्री बन गया था। और हर डिब्बे में बच्चों के लिए छोटा सा तोहफा रखना बच्चों में उसकी शोहरत। बिना बताए तोहफे देना संदेश ने ही सिखाया था। उनके बाद वो किसी से तोहफे नहीं लेती। ये छुट्टी भी तोहफे की तरह थी शायद इसीलिए उसे अच्छी नहीं लग रही थी। लेकिन कभी कभी बॉस को भी हारना ज़रूरी होता है। बड़े से घर में अकेली थी। कई साल बाद दुछत्ती पर उसने बारिश की आवाज़ सुनी। वरना दफ्तर में अपने केबिन से बारिश सिर्फ दिखाई देती थी सुनाई नहीं... बारिश उसे छत पर बुला रही थी... दुछत्ती में बारिश की आवाज़ से कुछ ज़्यादा भी था... एक बक्सा... जिसे वक्त ने धूल से ढक दिया था। उसकी नज़र डब्बे पर पड़ी तो जैसे किसी ने उठा कर आठ साल पीछे फेंक दिया था। क्या ये रेडियो चलता होगा। तब एफएम नहीं आया था। तो क्या आकाशवाणी पर अब भी गाने आते हैं। पूरा डब्बा ही जैसे उसके साथ जाने के लिए कह रहा था। बड़े से कमरे में छोटा सा डब्बा... जैसे अपने हाथों से वो आठ साल उठा कर लाई थी। रेडियो का तार लगाया तो जैसे यादों का दरिया उसमें से बहने लगा। ...थोड़ा सा बादल, थोड़ा सा पानी... और एक कहानी...। हल्की सी मुस्कुरा कर जैसे वो कह रही हो कि उसकी दोनों आंखों की एक कहानी ज़िंदा है... हल्की सी नज़र घुमाई तो एक काली सफेद फोटो पर नज़र पड़ी.. अचानक अकेले घर में जैसे भीड़ लग गई। “ देखना गुड़िया ही होगी... लेकिन तुम्हारे जैसी नहीं मेरे जैसी दिखेगी...” संदेश ने कहा तो आठ साल पहले था लेकिन जैसे आज वो उसे दोहरा रहा था। “ ऐसा कैसे... मैं तुम्हारे जैसा दिखने ही नहीं दूंगा...” चहक कर उसने जवाब दिया... “ये फोटो देखो... मैं ऐसा लकड़ी का घोड़ा लाउंगा, बड़े बाज़ार से खरीद लाते हैं... बाद में भी तो लाना है... आज ही ले आते हैं... फिर कर से तुम्हारा चलना फिरना बंद और तुम सिर्फ आराम करना... मोटी ताज़ी गुड़िया चाहिए....” दोनों हंसने लगे... शाम को गाड़ी से बड़े बाज़ार से आते हुए संदेश ने अचानक आए साइकिल वाले को तो बचा लिया। लेकिन बस वाला इतना हुनरमंद नहीं था। गाड़ी काट कर किसी तरह उसे तो बचा लिया गया... लेकिन संदेश और वो जो आने वाला था... कभी नहीं आया... परियों सी याद अचानक राक्षस बन गईं... रेडियो पर गाना बज रहा था...”लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा...

तेरा बचपन, मेरा बचपन



उसका गिरना...

गिर के उठना...

मुस्कुराना... रोना...

रूठना... मनाना...

इन सबमें अपने आप को ढूंढता हूं...

उसके छिले हुए घुटने के दर्द में खुद को तलाशता हूं...

उसकी तोतली बोली... आधे अधूरे शब्दों की लड़ी...

गुस्सा...चीखना...चिल्लाना...

सब मुझे अपना ही लगता है...

मां की आंखों में मुझे सब दिखता है...

उसमें वो मेरा अक्स ढूढंती है...

मैं जानता हूं कि मेरा लड़कपन मुझे मिल नहीं सकता...

थोड़ा ही सही पर उसके खिलंदड़पने में अपना बचपन तलाशता हूं...


उसके बचपन में अपना बचपन देखता हूं... 

©Alok Ranjan