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Friday, July 23, 2010

भगवान है तो शैतान भी है ! पार्ट - 3


मैं घर की तरफ दौड़ा....
' तुम लोगों ने ठीक नहीं किया... तुम लोग जानते नहीं मैं क्या कर सकता हूं... सब खत्म हो जाएगा... मैं नहीं चाहता कि मेरा घर बरबाद हो... लेकिन इसके जिम्मेदार तुम ही लोग हो... फकीर को क्यों बुलाया...'
गुड़िया की आवाज़ बिल्कुल किसी मर्द की तरह निकल रही थी... आवाज़ में गुर्राहट और उसे और ज्यादा डरावना बना रही थी... पूरा परिवार परेशान था...किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए... खैर चाचाजी ने हिम्मत की...
' देखिए आप जो भी हैं... अगर फकीर को ना बुलाते तो हमें कैसे पता चलता कि आप कौन हैं... '
' तुम मुझसे पूछ लेते...'
' लेकिन हमें थोड़े ही ना पता था'
' ये ठीक नहीं हुआ... ये ठीक नहीं हुआ'
इतना कहते ही गुड़िया बेहोश हो गयी... मुश्किल से 30 सेकेंड बाद उसने आंखें खोली...
' मां... सर में बहुत दर्द है...आप सब लोग यहां पर क्यों हैं...'
' कुछ नहीं बेटा...आप सोयीं हुई थी... और हम सब यहां पर बातें कर रहे थे... आप सो जाओ...'
मैंने चाचाजी की आंखों में दर्द देखा... आंसू बस छलकने ही वाले थे... वो वहां से फौरन चले गए... मैं उनका दर्द समझ सकता था... खैर... हम फौरन दादी के पास गए... पापा ने पूछा...
' मां...क्या कभी आपने अपने खानदान में सुना है कि किसी बच्चे की अकाल मृत्यु हो गयी हो.'
' नहीं तो...ऐसा तो कभी नहीं हुआ...मुझे याद तो नहीं आ रहा... लेकिन हां...मुझे याद आया'
दादी के इतना कहते ही सबके चेहरे पर हैरानगी के भाव आ गए... शायद मेरी तरह सब यही सोच रहे थे कि क्या सच में ऐसा होता है...
' बड़े दादाजी के खानदान में ऐसा हुआ था... उनके दादा जी के सबसे छोटे बेटे को किसी ने ज़हर देकर मार दिया था...लेकिन ये तो बहुत पुरानी बात है... तुम्हारी दादी ने एक बार इसके बारे में जिक्र किया था... '
पापा ने पूछा...
'क्या कभी पता चल पाया कि उन्हें किसने मारा था '
'नहीं लेकिन कहा जाता है किसी घरवाले का ही काम था '
खैर हम लोग दादी के कमरे से बाहर आ गए...सबकी हवाईयां उड़ी हुई थी... किसी को भी यकीन नहीं हो रहा था...कि जब मनुष्य मंगल पर कदम रखने की सोच रहा है.. तब ऐसा भी कुछ हो सकता है... मुझे तो सबसे ज्यादा हैरानी हो रही थी... किसी तरह रात कटी... अगले दिन फकीर फिर सुबह-सुबह आ गया...
कल जिस जगह पर गु़ड़िया को बिठाया गया था... वहीं पर उसे दुबारा लाया गया... फिर वही नज़ारा एक बार फिर देखने को मिला.. गुड़िया बेहद गुस्से में थी... आवाज़ में जबरदस्त गुर्राहट थी... फकीर के फिर आने से वो बेहद नाराज़ थी... लेकिन फकीर की बातों का उसपर गजब असर हुआ... उसके शरीर पर जिस किसी भी शक्ति का साया था... वो शांत हो गया... फकीर ने पूछा...
'बाबा... हम भी आपकी भलाई ही चाहते हैं... आपको क्या चाहिए '
'मुझे मुक्ति चाहिए...मुझे किसी भी तरह से मुक्त कर दो...मेरे पास दूसरा कोई रास्ता नहीं था... कई सालों से मैं ये कोशिश कर रहा था... लेकिन कोई भी मुझे देख और सुन नहीं पा रहा था '
'आपको मुक्ति कैसे मिलेगी ' फकीर ने पूछा..
'मंगलवार के दिन... गांव में जो माता का मंदिर है... वहां पर एक नीम का पेड़ृ है '
'हां.,.. बाबा है ' पापा ने कहा..
'वहां पर एक लाल लंगोट...एक बोतल शराब.. और मिठाई चढ़ा देना '
'ठीक है बाबा.. चढ़ा देंगे.. लेकिन क्या गारंटी है कि आप दोबारा इस बच्ची को परेशान नहीं करेंगे'
'फकीर मुझे फिर गुस्सा मत दिला...मैं तो इसी परिवार का हूं.. मैं अपने ही बच्चों को परेशान थोड़े ही ना करूंगा..ठीक है मैं चलता हूं... लेकिन अगले मंगलवार को ये हो जाना चाहिए'
'हो जाएगा बाबा...हो जाएगा'
गुड़िया फिर ठीक हो गयी... लेकिन हमेशा की तरह उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था... पूरे शरीर में भी दर्द था... उसे बिस्तर पर लिटा दिया गया... लेटते ही वो सो गयी...
फकीर ने कहा...
'चलिए उपर वाले की दया से कोई बड़ी मुसीबत नहीं थी... शुक्र मनाइए की घर की शक्ति थी..अगर कोई बाहरी होती तो बेहद मुश्किल होती..अब सब ठीक हो जाएगा...अब मेरा काम खत्म हुआ... मंगलवार को जो बाबा ने बताया है उसे पूरा कर दीजिए...फिर कुछ नहीं होगा'
'चलिए बाबा हमारी भी यही दुआ है कि सब ठीक हो जाए'
पापा ने फकीर को कुछ पैसे देने चाहे... लेकिन उन्होंने लेने से मना कर दिया.. अगले मंगलवार को हमने वही किया जो उन्होंने बताया था... इस घटना को करीब 10 साल बीत चुके हैं... गुड़िया बिल्कुल ठीक है... उसकी शादी को 4 साल हो चुके हैं... वो अपने परिवार के साथ मस्त है... फिर कभी उसे वैसी परेशानी नहीं हुई... लेकिन उस घटना ने पूरे परिवार के सोचने का नज़रिया बदल दिया... हम सब इन सब बातों का मज़ाक उड़ाते थे.. लेकिन अब ठीक उसी तरह यकीन करते है...जैसे भगवान पर... जिस तरह दुनिया पॉजीटिव और निगेटिव दोनों ही तरह की चीजें होती हैं... उसी तरह भगवान पर यकीन करने वालों को शैतान या फिर यूं कहें की दूसरी शक्तियों पर भी यकीन करना चाहिए...

Sunday, July 11, 2010

भगवान है तो शैतान भी है ! पार्ट - 2

जैसे ही फकीर ने सीढ़ियों पर कदम रखा... गुड़िया वैसे ही आक्रामक हो गयी... अभी तक मैं यकीन नहीं कर पा रहा था कि ऐसा भी होता है... खैर फकीर भीतर आए...आतें ही उन्होंने मेरी तरफ देखा और कहा कि आप गुड़िया से ज़रा बचकर ही रहें...मैंने पूछा..
"बाबा.. जहां तक मुझे याद है मैंने गुड़िया को एक थप्पड़ मारना तो दूर... डांटा तक नहीं होगा.. "
" सुमेर बात वो नहीं है... कई बार हालात जो दिखते हैं वो होते नहीं हैं... जब ऐसी स्थिति होती है... तो तुम्हारे पूर्व जन्म की कई बातें भी उससे जुड़ी होती हैं..."
मैं चुप रहा ... लेकिन मुझे फकीर का ये लॉजिक समझ में नहीं आया...
"सुमेर..जो तुम जिस लॉजिक के बारे में सोच रहे हो ना... उसका जवाब थोड़ी ही देर में तुम्हे मिल जाएगा
" फकीर की बात सुनकर तो मेरे पैरों तले की ज़मीन ही खिसक गयी... क्या ये फकीर सामने वाले की मन की बात जान लेता है.. मेरी आंखों के सामने जो कुछ भी हो रहा था उस पर शायद किसी को भी उस पर यकीन ना आए... लेकिन वो हकीकत थी... फकीर ज़मीन पर बैठ गया... उसने चावल के आटे से कुछ घेरे बनाएं... घेरों के उपर उसने लकड़ी का एक बोर्ड रखा... फिर चाचा से बोला...

"
गुड़िया को लेकर आइए... लेकिन ज़रा संभाल कर... इस वक्त वो पूरे घर से बेहद नाराज़ है
.."

गुड़िया
जब आयी तो उसकी आंखें सुर्ख लाल हो चुकी थी... उसकी आवाज़ में एक गुर्राहट थी...
"
मौलवी.. तुम फिर गए..उस दिन तो डर का भाग गए थे... आज कहां से ताकत मिल गयी तुम्हें
... "

"
आप जो भी हैं... पहले शांत हो जाइए... हम आपकी पूरी बात सुनेंगे... हम आपको कष्ट देने या फिर परेशान करने नहीं आएं हैं... हम आपकी परेशानी को दूर करने आएं हैं जो आप बिटिया के ज़रिए हम तक पहुंचाना चाहते हैं..."
"
तुझे कैसे पता कि हम परेशान हैं... हमें कोई परेशानी नहीं है... "
"
बाबा.. जब आपको कोई परेशानी नहीं है तो... आप अपने ही खानदान की बिटिया को क्यों परेशान कर रहे हैं..आखिर ये भी तो आपकी ही बच्ची है.. ज़रा सोचिए क्या होगा इसका भविष्य.."
फकीर
की बातें सुनकर गुड़िया एकटक उसे देखने लगी
... थोड़ी देर घूरने के बाद... उसने बोला
...
"
बात तो तुम्हारी ठीक है... लेकिन मैं क्या करता... कितने सालों से मैं इंतज़ार में था...कि ये इस उम्र में पहुंचे... क्योंकि यही एक है जो मुझे महसूस कर सकती है.. मुझे देख सकती है
.. "

फकीर
ने फिर किसी तरह बातों में फंसाने की कोशिश की
..
"
वो तो ठीक है... लेकिन ये इस खानदान की बेटी है... और आप तो ये जानते ही होंगे कि अगर बेटी में कुछ उंच नीच हो गयी... ये बातें बाहर पहुंच गयीं... तो क्या होगा... क्यों आप अपनी ही बच्ची की ज़िंदगी बरबाद कर रहे हैं
..."
"
तो क्या करू मैं... 100 साल हो गए... मैं अभी तक भटक रहा हूं... किसी ने मेरे बारे में सोचा कभी... जब मुझे मारा गया था.. तबके बाद किसी ने मेरे मोक्ष के लिए कुछ भी नहीं किया.. तो मैं क्यों किसी और की सोचूं
..."
"
तो आप ही बताइए क्या किया जाए...पूरा परिवार परेशान है
.. "
"
परिवार परेशान है.. क्या हुआ पापा.... क्या हुआ चाचाजी... क्या हुआ सुमेर भैया.. आप लोग इतना डरे हुए क्यों हैं... और मैं यहां पर क्यों बैठी हूं... ये फकीर बाबा यहां पर क्या कर रहे हैं
..."

फकीर
ने कहा
...
" कुछ
नहीं बिटिया... हम एक पूजा कर रहे हैं... उसमें आपकी ज़रूरत थी.. बस एक दिन की और पूजा बची है... वो हम जल्दी ही कर लेंगे... आज की पूजा खत्म हुई.. जाइए कुछ खा पी लीजिए...कल से आपने कुछ भी नहीं खाया है
.."

फकीर
की ये बातें सुनकर मेरा माथा एक फिर घूम गया... आखिर इसे कैसे पता है कि गुड़िया ने कल से कुछ भी नहीं खाया... खैर... फकीर उठ गया... वो बाहर निकलने लगा...पापा और मैं बाहर तक उसके साथ गए
...
"
शर्मा जी... बिटिया का ज़रा ध्यान रखिएगा... हो सकता है रात में कुछ और उत्पात मचाए.. हालांकि बातों से बहुत हद तक मैंने समझाने की कोशिश तो की है... संकेत तो अच्छे दिख रहे हैं... उपरवाले ने चाहा तो कल तक बिटिया को इस ब्रह्म पिशाच से छुटकारा मिल जाएगा
..."

"
ब्रह्ण पिशाच.." पापा चौंक उठे
...

"
हां ..शर्मा जी.. ब्रह्म पिशाच... ये जो भी हैं आपके घर-खानदान के ही हैं... आप ज़रा अपनी माता जी से पूछिएगा.. कि क्या आपके खानदान में पिछले 100 सालों में किसी बच्चे की अकाल मृत्यु हुई थी... शायद आपकी दादी ने आपकी मां को इस बारे में कुछ बताया हो...अगर कुछ भी बात होती है तो ये कल के लिए फायदेमंद होगी... अच्छा मैं चलता हूं
.."

"
सुमेर.. बाबा को छोड़ आओ
..."

"
अरे नहीं नहीं.. मैं चला जाउंगा... कई जगहों पर जाना है... आप बस बिटिया को संभालिएगा... आप जाइए... सुमेर एक काम कर दो.. बस मुझे एक पान खिला दो
.."

मैं
समझ गया कि... वो मुझसे कुछ बात करना चाहता है
...

"
जी अच्छा.. चलिए
.."

पापा
के चेहरे पर आए भावों को मैंने देखा.. वो परेशान से अंदर चले गए
...

"
सुमेर तुम्हे क्या लगता है.. कि जो कुछ भी हो रहा है वो एक ड्रामा है
..."

"
जी.. मैं... मैं....मैं.. नहीं
... "

"
सुमेर तुम्हारे दिमाग में इस वक्त जो भी चल रहा है.. वो सब मुझे पता है... क्या तुम भगवान में यकीन रखते हो
..."

"
हां रखता हूं..."
"
तो उसी तरह तु्म्हें शैतान में भी यकीन रखना पड़ेगा... शुक्र मनाओ की गुड़िया पर जिस शैतान का साया है वो बाहरी नहीं है... नहीं तो अबतक तो ना जाने क्या-क्या हो गया होता
..."

"
बाबा... गु़ड़िया ठीक तो हो जाएगी ना
..."

"
सुमरे अगर कोई बाहरी साया होता तो...उससे सख्ती से भी पेश सकता था... लेकिन ये शक्ति घर के भीतर की है... ज्यादा सख्ती नहीं कर सकते.. क्योंकि ताकत में वो हमसे कई गुना ज्यादा है... फिलहाल तो आज दिन और रात भर कुछ और खोजना है... जिससे इस ब्रह्म पिशाच पर काबू पाया जा सके
"

"
ये ब्रह्म पिशाच होते क्या हैं
.."

"
जब किसी बच्चे को जब वो बेहद छोटा होता है.. तभी मार दिया जाए... तो वो ब्रह्म पिशाच बन जाता है.."

" अच्छा.. लेकिन जहां तक मुझे पता है... मैंने अपने खानदान में किसी भी बच्चे की मौत के बारे में तो नहीं सुना.."

"
नहीं... ऐसा ज़रूर हुआ है.. तुम्हारी दादी को ज़रूर पता होगा... पूछना उनसे
..."

"
और हां.. गुड़िया के बहुत ज्यादा करीब मत जाना... तुम पर खतरा हो सकता है... पता नहीं क्यों मैंने ये महसूस किया है कि वो तुम्हें ज्यादा पसंद नहीं करते हैं.. इसलिए ख्याल रखना
.."

"
जी बाबा
..."

"
ठीक है घर जाओ... सब ठीक हो जाएगा.. उपरवाले ने चाहा तो कल के बाद फिर कभी परेशानी नहीं आएगी
..."

"
बाबा पान तो खा लीजिए..."
"
नहीं .. मुझे तो सिर्फ तुमसे बात करनी थी...जाओ घर जाओ
."

वो
चले गए... और मैं मन में हज़ारों सवालों के साथ घर की ओर लौट पड़ा... दरवाज़े से जैसे ही घुसा... कानों में कई सारी आवाज़ें सुनाई दे गयीं... मैं समझ गया... अंदर एक बार फिर गुड़िया काबू से बाहर हो रही है