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Tuesday, November 30, 2010

TRP और टेंशन


दिन में टेंशन
रात में टेंशन
जागते हुए टेंशन
सोते हुए टेंशन

क्या बनाउं..
क्या दिखाउं...
क्या करूं
की टीआरपी आए...

टीआरीपी पागल बना देगी
टीआरपी बुड्ढा बना देगी
टीआरीपी दिमाग का दिवाला
निकाल देगी

टीवी का कौन सा दैत्य निकालूं
टीवी पर कौन सा विनाश फैलाउं
टीवी पर लोगों को कैसे डराउं


अब हर बुधवार खुद डरता हूं
टीआरीपी के टेंशन में रहता हूं
सर मेरा शो उपर..
सर उसका शो नीचे..
यही सुनता रहता हूं...


क्या करें इस टीआरपी का
क्या करें इस टीवी का
ये सुरसा है...
लेकिन हनुमान कहां से लाएं...

©Alok Ranjan

Saturday, November 13, 2010

ज़िंदगी और जंग

रिश्तों को टूटता देख रहा हूं
बंधन को बिखरता देख रहा हूं
काश मैं वक्त को रोक देता
सबकुछ हाथों से सरकता देख रहा हूं

हंसी भी थी
खुशी भी थी
मंज़िल भी थी
रास्ते भी थे
पर सब निकलता देख रहा हूं

वो कहते हैं कि सब ठीक होगा
वो कहते हैं कि बिगड़ी भी बन जाएगी
वो कहते हैं कि वक्त सब ठीक कर देगा
पर वो नहीं जानते की मैं वक्त को
फिसलता देख रहा हूं

©Alok Ranjan

Sunday, September 19, 2010

मदारी का डांडिया न्यूज़


आज फिर सोचा कुछ तो कहूं...काफी दिनों से चुप बैठा था... जो कहानी आप पढ़ने जा रहे हैं... उसके बारे में पहले ही घोषणा कर दूं.. कि इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से संबंध नहीं है... इसके सभी पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं... अगर कुछ भी समानता होती है तो उसे एक संयोग मात्र ही माना जाए...


मदारी का धंधा चल निकला था... रोज़ाना की कमाई करोड़ों में हो रही थी... मदारी अब अपने बिजनेस को और ज्यादा बढ़ाना चाहता था... लेकिन बिजनेस का कोई आइडिया नहीं मिल रहा था... उसने सोचा कि जमूरे से बात की जाए... जमूरा उसका बड़ा तेज़ है... सो उसने आवाज़ लगाई...

जमूरे
हां उस्ताद

जमूरे एक बिज़ेनस खोलना है
उस्ताद बिज़नेस खोलना है

बढ़िया वाला बिज़नेस
उस्ताद बढ़िया वाला बिज़नेस

हां जमूरे...
खुल जाएगा उस्ताद

जमूरे कोई आइडिया तो दे..
उस्ताद जमूरा आइडिया ज़रूर देगा

तो बता ना जमूरे क्या बिजनेस करें
उस्ताद न्यूज चैनल खोल लेते हैं

अबे क्या बता कर रहा है जमूरे
हां उस्ताद बड़ा चोखा धंधा है

क्या बात कर रहा है जमूरे
हां उस्ताद हिंदी न्यूज चैनल खोल लो

जमूरे लेकिन उसके लिए क्या करना होगा
कुछ नहीं उस्ताद बस इंटरनेट का कनेक्शन दुरूस्त करना होगा

वो क्यों जमूरे
उस्ताद डाउनलोडिंग स्पीड तेज़ चाहिए होगी

क्यों मज़ाक कर रहा है जमूरे
उस्ताद यू ट्यूब से डाउनलोडिंग तेज़ होगी तभी तो न्यूज़ ब्रेक करोगे ना उस्ताद

जमूरे मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है
उस्ताद यू ट्यूब से ही तो चैनल चलते हैं...

जमूरे वो तो ठीक है लेकिन ऐसा थोड़े ही होता है
उस्ताद अब तो ऐसा ही होता है

लेकिन जमूरे ये न्यूज चैनल चलाना अपने बस की बात नहीं है
क्या बात करते हो उस्ताद... चैनल तो कोई भी चला लेता है...

सच में जमूरे उसके लिए किसी डिग्री की ज़रूरत नहीं है... पत्रकार ना भी हो तो चलेगा,...
क्या उस्ताद...किस दुनिया में हो... पत्रकारिता अब है क्या कहीं...

उस्ताद... सिर्फ चार-पांच बंदर पालने हैं... और चैनल शुरू...

जमूरे लगता है तूने सुबह-सुबह भांग चढ़ा ली है...
नहीं उस्ताद... दो बंदर एक साइड.. दो बंदर दूसरी साइड...
बस तुम चारों बंदरों से खेलते रहना... चैनल बिंदास चलता रहेगा...

फिर क्या था... अख़बार में विज्ञापन छपा..डांडिया न्यूज को चाहिए चपरासी से लेकर एडिटर इन चीफ...
हज़ारों एप्लीकेशन आ गयीं... मदारी तो फूले नहीं समा रहा था... उसे तो यकीन भी नहीं हो रहा था कि इतने सारे लोग उनके चैनल में काम करना चाहते हैं... खैर चैनल ज़ोर शोर से शुरू कर दिया गया... मदारी के पास पैसे की कमी नहीं थी... जिस बंदर ने जो भी सलाह दी... जो भी लाने को कहा... उससे दो ज्यादा ही मंगवा लिया... मदारी को लगा कि साला कहीं भी कमी नहीं होनी चाहिए... लेकिन मदारी को ये नहीं पता था... कि ये बंदर उसके सामने तो जी सर जी सर करते हैं.. लेकिन पीठ पीछे अपना ही काम बना रहे हैं... एक दिन मदारी को गुस्सा आ गया... उसने जमूरे को बुलाया...

जमूरे... साले तूने क्या किया...तू तो कह रहा था कि चैनल चलाना आसान है...
उस्ताद और नहीं तो क्या... आपने बंदरों को खुला छोड़ रखा है... जब तक आप कमांड नहीं करेंगे... बंदर थोड़े ही ना काबू में आएंगे...

ठीक है जमूरे.. अब मैं कल से ही न्यूजरूम में बैठूंगा... और देखता हूं बंदर कैसे अपनी मनमानी करते हैं...

बंदरों के होश उड़ गए.. अब तो उन्हें लगा कि अपना काम नहीं चलेगा... फौरन एक बंदर.. जो अपने आप को तीसमारखां समझता था... मदारी से सेटिंग करने लगा... मदारी को भी अच्छा लगता था.. कि वो जो करने को कहता है... ये वाला बंदर फौरन काम करवाने को हाज़िर हो जाता है... भले ही मदारी बाद में आकर पूछता भी नहीं था कि काम हुआ कि नहीं...

मदारी ने फौरन जनरल बॉडी मीटिंग बुलायी... और घोषणा कर दी कि ये वाला बंदर उनका ख़ास है... आज से उसकी ज़िम्मेदारियां बढ़ायी जाती है...

फिर क्या था... बंदर तो सांतवें आसमान पर था... अब तो पूरे न्यूजरूम पर उसका कब्ज़ा था... जो पुराने बंदर थे.. वो भी सब सटक लिए... करें भी तो क्या करें.. जब मदारी ने ही कमान दे दी तो भला वो क्या करते...

खैर बंदर अपने मनमुताबिक चैनल को चलाने लगा... जिन बंदरों से उसे खुन्नस थी... सबको उसने शंट कर दिया... बेचारे कामकाज़ी बंदर करते भी क्या... उन्हें तो बस काम करना आता था... सो चुपचाप काम करते रहे... लेकिन ये भी तो पाप का घड़ा कभी ना कभी तो भरना ही था... जिस मदारी के दम पर बंदर कूद रहा था... उस बंदर को ये मालूम ही नहीं था... कि मदारी किसी का सगा नहीं है... फिर वही हुआ जिसका डर था... मदारी खबरों से तो नहीं लेकिन बंदरों से खेलना तो जानता ही था... मदारी को इस खेल में मज़ा आने लगा... उसने सोचा चैनल जाए भाड़ में... ये नया खेल तो बहुते मज़ेदार है... दूसरे जो कामकाज़ी बंदर थे वो समझ चुके थे.. कि उन्हें अब फौरन नयी जगह ढूंढ लेनी चाहिए.. वो समझ चुके थे.. कि मदारी के वश में सिर्फ बंदरों के साथ खेलना है... चैनल चलाना नहीं.. बेचारा पुराना बंदर तो कहीं का ना रहा... ना तो उसे मदारी ही भाव दे रहा था... और ना ही उससे प्रताड़ित दूसरे बंदर ही उसे अपना मान रहे थे... खैर भगवान तो हर किसी की सुनते हैं... हो सकता है इतनी गलतियां करने के बाद बंदर को सदबुद्धि आ जाए... वैसे डांडिया न्यूज अभी भी डंडे के दम पर चल रहा है... मदारी सिर्फ अपने घर में ही चैनल को देखकर खुश हो रहा है... मदारी के दिमाग में एक नया ख्याल आया है... उसने फौरन जमूरे को आवाज़ लगायी...

जमूरे...
हां उस्ताद

अरे इ चैनल चैनल खेलना तो बड़ा मज़ेदार है रे
हां उस्ताद.. मैंने पहले ही तो कहा था...

सुन जमूरे.. क्यों ना एक दो चैनल और खोल लें...
वाह उस्ताद..दिमाग हो तो आप जैसा... क्या दूर की कौड़ी सोची है आपने..

ठीक है जमूरे...
अख़बार में छपवा दे.. डांडिया न्यूज एक नया चैनल खोल रहा है... उसके लिए चपरासी से लेकर एडिटर इन चीफ चाहिए...

हो जाएगा उस्ताद...

Tuesday, August 10, 2010

दीज़ नाइट शिफ्ट पीपल !


नाइट में जगने वाले माने निशाचर जाति के प्राणी... यानि मीडिया की भाषा में कहें तो दीज़ नाइट शिफ्ट पीपल... कहने वाले ऐसा कहते हैं... लेकिन मीडिया में नाइट शिफ्ट का मतलब तो कुछ ऐसे भी निकलता है...
दोस्तों से शेखी बघारते हुए....

'हा हा हा बहुत उड़ रहे थे... भेज दिया ना नाइट शिफ्ट में '

दूसरे चैनल में किसी दोस्त को बताते हुए...
'अरे नाइट शिफ्ट में डंप कर दिया है उसे'

अपने सीनियर जिन्हें चैनल के भीतर लोगों के बारे में कम जानकारी है उन्हें बताते हुए...
'सर.. बिना काम का आदमी है.. इसलिए नाइट शिफ्ट में डाल रखा है'

मीडिया में जो काम करते हैं... वो इन लाइन्स को बेहद अच्छी जानते और समझते भी हैं... नाइट शिफ्ट के बारे में करीब-करीब सभी लोगों को कई सारी गलतफहमियां हैं... न्यूज चैनल्स में नाइट शिफ्ट का मतलब ही यही निकाला जाता है कि उसे सजा दी गयी है... लेकिन मैं यकीन के साथ कह सकता हूं... कि लोगों को अपने नज़रिए को बदलने की ज़रूरत है... नाइट शिफ्ट कई मायनों में खराब है... ये स्वास्थय पर असर डालती है... आपकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करती है... आप ठीक से खाते नहीं है... आप ठीक से इन्जॉय नहीं कर पाते... अपनी फैमिली के साथ कम वक्त दे पाते हैं... जब लोग सो रहे होते हैं तो आप जाग कर खबरों से जूझ रहे होते हैं... और जब पूरी दुनिया दिन के उजाले में व्यस्त रहती है... तो आप कमरे में घुप्प अंधेरा कर रात होने का अहसास करते हैं... खासकर उन लोगों के लिए नाइट ज्यादा परेशान करने वाली होती है जिनकी नई नई शादी हुई रहती है... लेकिन सौ खराबियों के बाद भी नाइट शिफ्ट का अपना एक अलग ही रूप रंग है.. रात का अंधेरा भले ही काला हो... लेकिन कुछ चीज़ें ऐसी हैं.. जो नाइट शिफ्ट को मज़ेदार बनाती हैं... जो लोग ये कहते हैं कि नाइट में काम ही क्या होता है... उन लोगों को मैं बता दूं... अमूमन सुबह से लेकर रात तक जो खबरें चलती हैं... वो सिर्फ फॉलोअप होती हैं... सुबह से जो खबर आती है दिन से रात तक सिर्फ उसे फॉलो किया जाता है... यानि आप सिर्फ फॉलोअर होते हैं... जबकि नाइट शिफ्ट में खबरें क्रिएट होती हैं..जिनके दम पर अगला पूरा दिन निकलता है...इसलिए ये कहना की नाइट में काम ही क्या है गलत है... नाइट शिफ्ट में काम करने वाले शांत दिमाग से काम करते हैं... खबरों को समझने में मेहनत नहीं करनी पड़ती...क्योंकि दिन में काम करने वालों के पास तो वक्त ही नहीं रहता ज्यादा सोचने का... काम आप अपने हिसाब से करते हैं... आप काम के साथ-साथ गपशप भी करते हैं... हंसी मज़ाक भी करते हैं... लोग कम होते हैं.. इसलिए नाइट शिफ्ट एक परिवार की तरह हो जाता है... (दिन के लोग शायद अलग-अलग टीम की तरह काम करते हैं) दिन में लोगों को शायद ही ये पता चलता होगा कि उनके बुलेटिन में क्या जा रहा है... कौन कौन सी खबरें गयीं हैं... कौन कौन से शो गए हैं... (सिर्फ रनडाउन वाले को छोड़कर) क्योंकि उनके पास वक्त की बेहद कमी होती है... और शिफ्ट खत्म होने के बाद किसे खबर रहती है खबरों की... खैर.. बात नाइट शिफ्ट की हो रही है... नाइट में काम के साथ-साथ जितनी मस्ती होती है उसे बाकी लोग शायद ही समझ पाएं... क्योंकि अमूमन लोग नाइट माने सज़ा ही जानते हैं... नाइट का मज़ा वो क्या खाक लेंगे.. जो नाइट में जाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं... या फिर अपने आप को बुद्धिजीवी समझकर नाइट शिफ्ट में जाने से कतराते हैं... नाइट का असली मज़ा तो उसका कद्रदान ही उठाता है... लोग जब सुनते हैं कि नाइट शिफ्ट लगी है.. तो चेहरे पर एक मुस्कुराहट आती है... फिर पूछते हैं... यार नींद तो पूरी हो ही जाती होगी... अब अमां उन्हें कौन समझाए कि अगर नींद ली तो नाइट शिफ्ट का मज़ा आपने खो दिया... हां पावर नैप ज़रूर लीजिए... क्योंकि 5-7 मिनट की पावर नैप.. आपको अगले 2 घंटे के लिए चार्ज कर देती है... करीब 4 महीने नाइट शिफ्ट की... और शायद ही ये महसूस हुआ कि यार ये शिफ्ट गंदी है... नाइट शिफ्ट के गज़ब के फायदे हैं... आपका फोन का बिल सीधे आधे पर आ जाता है... क्योंकि जब आप जाग रहे होते हैं तो पूरी दुनिया सो रही होती है... और जब पूरी दुनिया जाग रही होती है तो आप सो रहे होते हैं... दिनभर आप अपने घर के भी काम कर सकते हैं... सारे सरकारी काम कर सकते हैं... आपके पेट्रोल का बिल भी कम हो जाता है... क्योंकि ऑफिस आने-जाने का जो वक्त है... उस वक्त सड़कें खाली ही मिलती हैं... और हां... रात में नौकरी करने के बाद.. दिन में नयी नौकरी भी ढूंढ सकते हैं... ज़रा पूछिए तो दिनवालों से... कि क्या उन्हें नौकरी करते हुए इतनी सारी सुविधाएं मिलती हैं... तो अगली बार अगर आपकी नाइट लगती है तो इसे सजा नहीं... बल्कि मजे के तौर पर लें... क्योंकि यहां पर काम के साथ-साथ मानसिक शांति भी मिलती है...

Friday, August 06, 2010

यही दुनिया है....


यही दुनिया है
यही दुनिया की रीत है
हंस कर बोलते हैं सभी सामने
पीठ पीछे लगते हैं गला दबाने
राम जाने ये कैसी प्रीत है...
यही दुनिया है..
यही दुनिया की रीत है...

दोस्तों में कैसे ढूंढे दुश्मन...
समझ नहीं आता है...
दुश्मन भी कभी-कभी दुआ दे देते हैं
पर ना जाने क्यों यकीन नहीं आता है
यही दुनिया है...
यही दुनिया की रीत है...

अब तो उपरवाले तेरा ही सहारा है
अब तो सब जग हारा है
चाहता हूं खुद से खड़ा हो जाउं
अपनी राह खुद बनाउं
मंजिल भी अपनी हो
साथ चलने वाले भी अपने हो
तभी अपनी जीत है
यही दुनिया है...
यही दुनिया की रीत है...

©Alok Ranjan

Friday, July 23, 2010

भगवान है तो शैतान भी है ! पार्ट - 3


मैं घर की तरफ दौड़ा....
' तुम लोगों ने ठीक नहीं किया... तुम लोग जानते नहीं मैं क्या कर सकता हूं... सब खत्म हो जाएगा... मैं नहीं चाहता कि मेरा घर बरबाद हो... लेकिन इसके जिम्मेदार तुम ही लोग हो... फकीर को क्यों बुलाया...'
गुड़िया की आवाज़ बिल्कुल किसी मर्द की तरह निकल रही थी... आवाज़ में गुर्राहट और उसे और ज्यादा डरावना बना रही थी... पूरा परिवार परेशान था...किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए... खैर चाचाजी ने हिम्मत की...
' देखिए आप जो भी हैं... अगर फकीर को ना बुलाते तो हमें कैसे पता चलता कि आप कौन हैं... '
' तुम मुझसे पूछ लेते...'
' लेकिन हमें थोड़े ही ना पता था'
' ये ठीक नहीं हुआ... ये ठीक नहीं हुआ'
इतना कहते ही गुड़िया बेहोश हो गयी... मुश्किल से 30 सेकेंड बाद उसने आंखें खोली...
' मां... सर में बहुत दर्द है...आप सब लोग यहां पर क्यों हैं...'
' कुछ नहीं बेटा...आप सोयीं हुई थी... और हम सब यहां पर बातें कर रहे थे... आप सो जाओ...'
मैंने चाचाजी की आंखों में दर्द देखा... आंसू बस छलकने ही वाले थे... वो वहां से फौरन चले गए... मैं उनका दर्द समझ सकता था... खैर... हम फौरन दादी के पास गए... पापा ने पूछा...
' मां...क्या कभी आपने अपने खानदान में सुना है कि किसी बच्चे की अकाल मृत्यु हो गयी हो.'
' नहीं तो...ऐसा तो कभी नहीं हुआ...मुझे याद तो नहीं आ रहा... लेकिन हां...मुझे याद आया'
दादी के इतना कहते ही सबके चेहरे पर हैरानगी के भाव आ गए... शायद मेरी तरह सब यही सोच रहे थे कि क्या सच में ऐसा होता है...
' बड़े दादाजी के खानदान में ऐसा हुआ था... उनके दादा जी के सबसे छोटे बेटे को किसी ने ज़हर देकर मार दिया था...लेकिन ये तो बहुत पुरानी बात है... तुम्हारी दादी ने एक बार इसके बारे में जिक्र किया था... '
पापा ने पूछा...
'क्या कभी पता चल पाया कि उन्हें किसने मारा था '
'नहीं लेकिन कहा जाता है किसी घरवाले का ही काम था '
खैर हम लोग दादी के कमरे से बाहर आ गए...सबकी हवाईयां उड़ी हुई थी... किसी को भी यकीन नहीं हो रहा था...कि जब मनुष्य मंगल पर कदम रखने की सोच रहा है.. तब ऐसा भी कुछ हो सकता है... मुझे तो सबसे ज्यादा हैरानी हो रही थी... किसी तरह रात कटी... अगले दिन फकीर फिर सुबह-सुबह आ गया...
कल जिस जगह पर गु़ड़िया को बिठाया गया था... वहीं पर उसे दुबारा लाया गया... फिर वही नज़ारा एक बार फिर देखने को मिला.. गुड़िया बेहद गुस्से में थी... आवाज़ में जबरदस्त गुर्राहट थी... फकीर के फिर आने से वो बेहद नाराज़ थी... लेकिन फकीर की बातों का उसपर गजब असर हुआ... उसके शरीर पर जिस किसी भी शक्ति का साया था... वो शांत हो गया... फकीर ने पूछा...
'बाबा... हम भी आपकी भलाई ही चाहते हैं... आपको क्या चाहिए '
'मुझे मुक्ति चाहिए...मुझे किसी भी तरह से मुक्त कर दो...मेरे पास दूसरा कोई रास्ता नहीं था... कई सालों से मैं ये कोशिश कर रहा था... लेकिन कोई भी मुझे देख और सुन नहीं पा रहा था '
'आपको मुक्ति कैसे मिलेगी ' फकीर ने पूछा..
'मंगलवार के दिन... गांव में जो माता का मंदिर है... वहां पर एक नीम का पेड़ृ है '
'हां.,.. बाबा है ' पापा ने कहा..
'वहां पर एक लाल लंगोट...एक बोतल शराब.. और मिठाई चढ़ा देना '
'ठीक है बाबा.. चढ़ा देंगे.. लेकिन क्या गारंटी है कि आप दोबारा इस बच्ची को परेशान नहीं करेंगे'
'फकीर मुझे फिर गुस्सा मत दिला...मैं तो इसी परिवार का हूं.. मैं अपने ही बच्चों को परेशान थोड़े ही ना करूंगा..ठीक है मैं चलता हूं... लेकिन अगले मंगलवार को ये हो जाना चाहिए'
'हो जाएगा बाबा...हो जाएगा'
गुड़िया फिर ठीक हो गयी... लेकिन हमेशा की तरह उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था... पूरे शरीर में भी दर्द था... उसे बिस्तर पर लिटा दिया गया... लेटते ही वो सो गयी...
फकीर ने कहा...
'चलिए उपर वाले की दया से कोई बड़ी मुसीबत नहीं थी... शुक्र मनाइए की घर की शक्ति थी..अगर कोई बाहरी होती तो बेहद मुश्किल होती..अब सब ठीक हो जाएगा...अब मेरा काम खत्म हुआ... मंगलवार को जो बाबा ने बताया है उसे पूरा कर दीजिए...फिर कुछ नहीं होगा'
'चलिए बाबा हमारी भी यही दुआ है कि सब ठीक हो जाए'
पापा ने फकीर को कुछ पैसे देने चाहे... लेकिन उन्होंने लेने से मना कर दिया.. अगले मंगलवार को हमने वही किया जो उन्होंने बताया था... इस घटना को करीब 10 साल बीत चुके हैं... गुड़िया बिल्कुल ठीक है... उसकी शादी को 4 साल हो चुके हैं... वो अपने परिवार के साथ मस्त है... फिर कभी उसे वैसी परेशानी नहीं हुई... लेकिन उस घटना ने पूरे परिवार के सोचने का नज़रिया बदल दिया... हम सब इन सब बातों का मज़ाक उड़ाते थे.. लेकिन अब ठीक उसी तरह यकीन करते है...जैसे भगवान पर... जिस तरह दुनिया पॉजीटिव और निगेटिव दोनों ही तरह की चीजें होती हैं... उसी तरह भगवान पर यकीन करने वालों को शैतान या फिर यूं कहें की दूसरी शक्तियों पर भी यकीन करना चाहिए...

Sunday, July 11, 2010

भगवान है तो शैतान भी है ! पार्ट - 2

जैसे ही फकीर ने सीढ़ियों पर कदम रखा... गुड़िया वैसे ही आक्रामक हो गयी... अभी तक मैं यकीन नहीं कर पा रहा था कि ऐसा भी होता है... खैर फकीर भीतर आए...आतें ही उन्होंने मेरी तरफ देखा और कहा कि आप गुड़िया से ज़रा बचकर ही रहें...मैंने पूछा..
"बाबा.. जहां तक मुझे याद है मैंने गुड़िया को एक थप्पड़ मारना तो दूर... डांटा तक नहीं होगा.. "
" सुमेर बात वो नहीं है... कई बार हालात जो दिखते हैं वो होते नहीं हैं... जब ऐसी स्थिति होती है... तो तुम्हारे पूर्व जन्म की कई बातें भी उससे जुड़ी होती हैं..."
मैं चुप रहा ... लेकिन मुझे फकीर का ये लॉजिक समझ में नहीं आया...
"सुमेर..जो तुम जिस लॉजिक के बारे में सोच रहे हो ना... उसका जवाब थोड़ी ही देर में तुम्हे मिल जाएगा
" फकीर की बात सुनकर तो मेरे पैरों तले की ज़मीन ही खिसक गयी... क्या ये फकीर सामने वाले की मन की बात जान लेता है.. मेरी आंखों के सामने जो कुछ भी हो रहा था उस पर शायद किसी को भी उस पर यकीन ना आए... लेकिन वो हकीकत थी... फकीर ज़मीन पर बैठ गया... उसने चावल के आटे से कुछ घेरे बनाएं... घेरों के उपर उसने लकड़ी का एक बोर्ड रखा... फिर चाचा से बोला...

"
गुड़िया को लेकर आइए... लेकिन ज़रा संभाल कर... इस वक्त वो पूरे घर से बेहद नाराज़ है
.."

गुड़िया
जब आयी तो उसकी आंखें सुर्ख लाल हो चुकी थी... उसकी आवाज़ में एक गुर्राहट थी...
"
मौलवी.. तुम फिर गए..उस दिन तो डर का भाग गए थे... आज कहां से ताकत मिल गयी तुम्हें
... "

"
आप जो भी हैं... पहले शांत हो जाइए... हम आपकी पूरी बात सुनेंगे... हम आपको कष्ट देने या फिर परेशान करने नहीं आएं हैं... हम आपकी परेशानी को दूर करने आएं हैं जो आप बिटिया के ज़रिए हम तक पहुंचाना चाहते हैं..."
"
तुझे कैसे पता कि हम परेशान हैं... हमें कोई परेशानी नहीं है... "
"
बाबा.. जब आपको कोई परेशानी नहीं है तो... आप अपने ही खानदान की बिटिया को क्यों परेशान कर रहे हैं..आखिर ये भी तो आपकी ही बच्ची है.. ज़रा सोचिए क्या होगा इसका भविष्य.."
फकीर
की बातें सुनकर गुड़िया एकटक उसे देखने लगी
... थोड़ी देर घूरने के बाद... उसने बोला
...
"
बात तो तुम्हारी ठीक है... लेकिन मैं क्या करता... कितने सालों से मैं इंतज़ार में था...कि ये इस उम्र में पहुंचे... क्योंकि यही एक है जो मुझे महसूस कर सकती है.. मुझे देख सकती है
.. "

फकीर
ने फिर किसी तरह बातों में फंसाने की कोशिश की
..
"
वो तो ठीक है... लेकिन ये इस खानदान की बेटी है... और आप तो ये जानते ही होंगे कि अगर बेटी में कुछ उंच नीच हो गयी... ये बातें बाहर पहुंच गयीं... तो क्या होगा... क्यों आप अपनी ही बच्ची की ज़िंदगी बरबाद कर रहे हैं
..."
"
तो क्या करू मैं... 100 साल हो गए... मैं अभी तक भटक रहा हूं... किसी ने मेरे बारे में सोचा कभी... जब मुझे मारा गया था.. तबके बाद किसी ने मेरे मोक्ष के लिए कुछ भी नहीं किया.. तो मैं क्यों किसी और की सोचूं
..."
"
तो आप ही बताइए क्या किया जाए...पूरा परिवार परेशान है
.. "
"
परिवार परेशान है.. क्या हुआ पापा.... क्या हुआ चाचाजी... क्या हुआ सुमेर भैया.. आप लोग इतना डरे हुए क्यों हैं... और मैं यहां पर क्यों बैठी हूं... ये फकीर बाबा यहां पर क्या कर रहे हैं
..."

फकीर
ने कहा
...
" कुछ
नहीं बिटिया... हम एक पूजा कर रहे हैं... उसमें आपकी ज़रूरत थी.. बस एक दिन की और पूजा बची है... वो हम जल्दी ही कर लेंगे... आज की पूजा खत्म हुई.. जाइए कुछ खा पी लीजिए...कल से आपने कुछ भी नहीं खाया है
.."

फकीर
की ये बातें सुनकर मेरा माथा एक फिर घूम गया... आखिर इसे कैसे पता है कि गुड़िया ने कल से कुछ भी नहीं खाया... खैर... फकीर उठ गया... वो बाहर निकलने लगा...पापा और मैं बाहर तक उसके साथ गए
...
"
शर्मा जी... बिटिया का ज़रा ध्यान रखिएगा... हो सकता है रात में कुछ और उत्पात मचाए.. हालांकि बातों से बहुत हद तक मैंने समझाने की कोशिश तो की है... संकेत तो अच्छे दिख रहे हैं... उपरवाले ने चाहा तो कल तक बिटिया को इस ब्रह्म पिशाच से छुटकारा मिल जाएगा
..."

"
ब्रह्ण पिशाच.." पापा चौंक उठे
...

"
हां ..शर्मा जी.. ब्रह्म पिशाच... ये जो भी हैं आपके घर-खानदान के ही हैं... आप ज़रा अपनी माता जी से पूछिएगा.. कि क्या आपके खानदान में पिछले 100 सालों में किसी बच्चे की अकाल मृत्यु हुई थी... शायद आपकी दादी ने आपकी मां को इस बारे में कुछ बताया हो...अगर कुछ भी बात होती है तो ये कल के लिए फायदेमंद होगी... अच्छा मैं चलता हूं
.."

"
सुमेर.. बाबा को छोड़ आओ
..."

"
अरे नहीं नहीं.. मैं चला जाउंगा... कई जगहों पर जाना है... आप बस बिटिया को संभालिएगा... आप जाइए... सुमेर एक काम कर दो.. बस मुझे एक पान खिला दो
.."

मैं
समझ गया कि... वो मुझसे कुछ बात करना चाहता है
...

"
जी अच्छा.. चलिए
.."

पापा
के चेहरे पर आए भावों को मैंने देखा.. वो परेशान से अंदर चले गए
...

"
सुमेर तुम्हे क्या लगता है.. कि जो कुछ भी हो रहा है वो एक ड्रामा है
..."

"
जी.. मैं... मैं....मैं.. नहीं
... "

"
सुमेर तुम्हारे दिमाग में इस वक्त जो भी चल रहा है.. वो सब मुझे पता है... क्या तुम भगवान में यकीन रखते हो
..."

"
हां रखता हूं..."
"
तो उसी तरह तु्म्हें शैतान में भी यकीन रखना पड़ेगा... शुक्र मनाओ की गुड़िया पर जिस शैतान का साया है वो बाहरी नहीं है... नहीं तो अबतक तो ना जाने क्या-क्या हो गया होता
..."

"
बाबा... गु़ड़िया ठीक तो हो जाएगी ना
..."

"
सुमरे अगर कोई बाहरी साया होता तो...उससे सख्ती से भी पेश सकता था... लेकिन ये शक्ति घर के भीतर की है... ज्यादा सख्ती नहीं कर सकते.. क्योंकि ताकत में वो हमसे कई गुना ज्यादा है... फिलहाल तो आज दिन और रात भर कुछ और खोजना है... जिससे इस ब्रह्म पिशाच पर काबू पाया जा सके
"

"
ये ब्रह्म पिशाच होते क्या हैं
.."

"
जब किसी बच्चे को जब वो बेहद छोटा होता है.. तभी मार दिया जाए... तो वो ब्रह्म पिशाच बन जाता है.."

" अच्छा.. लेकिन जहां तक मुझे पता है... मैंने अपने खानदान में किसी भी बच्चे की मौत के बारे में तो नहीं सुना.."

"
नहीं... ऐसा ज़रूर हुआ है.. तुम्हारी दादी को ज़रूर पता होगा... पूछना उनसे
..."

"
और हां.. गुड़िया के बहुत ज्यादा करीब मत जाना... तुम पर खतरा हो सकता है... पता नहीं क्यों मैंने ये महसूस किया है कि वो तुम्हें ज्यादा पसंद नहीं करते हैं.. इसलिए ख्याल रखना
.."

"
जी बाबा
..."

"
ठीक है घर जाओ... सब ठीक हो जाएगा.. उपरवाले ने चाहा तो कल के बाद फिर कभी परेशानी नहीं आएगी
..."

"
बाबा पान तो खा लीजिए..."
"
नहीं .. मुझे तो सिर्फ तुमसे बात करनी थी...जाओ घर जाओ
."

वो
चले गए... और मैं मन में हज़ारों सवालों के साथ घर की ओर लौट पड़ा... दरवाज़े से जैसे ही घुसा... कानों में कई सारी आवाज़ें सुनाई दे गयीं... मैं समझ गया... अंदर एक बार फिर गुड़िया काबू से बाहर हो रही है