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Monday, December 15, 2008

कोई तो सुनो मेरी !


मोड़ पे देखा है वह बूढ़ा-सा इक पेड़ कभी?
मेरा वाकिफ है, बहुत सालों से मैं उसे जानता हूं
जब मैं छोटा था तो इक आम उड़ाने के लिए
परली दीवार से कंधे पर चढ़ा था उसके
जाने दुखती हुई किसा शाख से जा पांव लगा
धाड़ से फेंक दिया था मुझे नीचे उसने
मैंने खुन्नस में बहुत फेंके थे पत्थर उस पर
मेरी शादी पे मुझे याद है शाखें देकर
मेरी वेदी का हवन गर्म किया था उसने
और जब हामला थी 'बीबा' तो दोपहर में हर दिन
मेरी बीवी की तरफ कैरियां फेंकी थीं इसी ने
वक्त के साथ सभी फूल, सभी पत्ते गए
तब भी जल जाता था जब मुन्ने से कहती 'बीबा'
'हां उसी पेड़ से आया है तू , पेड़ का फल है'
अब भी जल जाता हूं, जब मोड़ गुजरते में कभी
खांसकर कहता है, 'क्यों सर के सभी बाल गए?'
सुबह से काट रहे हैं वह कमेटी वाले
मोड़ तक जाने की हिम्मत नहीं होती मुझको
" ये कविता मेरी लिखी हुई नहीं है... मेरे किसी मित्र ने मेल भेजा था... जिस आम के पेड़ की चर्चा यहां पर की गयी है वो सिर्फ एक प्रतिबिंब है हमारे समाज का... आम के इस पेड़ के जैसी हज़ारों ऐसी ज़िंदगियां हैं जो रोज़ घुटती हैं... कटती हैं ... खत्म हो जाती हैं... जीवन की एक बहुत बड़ी सच्चाई इन चंद लाइनों में छिपी हुई है"